Sazishen [part 40]

शिवरात्रि पर चंपक, पूजा के साथ था, उसके साथ मंदिर में भी गया था किंतु उसके पश्चात, न जाने, उसे क्या हुआ ? वह आया ही नहीं, पूजा सोच रही थी -शायद ,अपनी पढ़ाई में व्यस्त होगा। हो सकता है, परिवार में कुछ काम आ गया हो। उसे चंपक पर पूर्ण विश्वास था, इसलिए चंपक के विषय में कुछ गलत सोच ही नहीं सकती थी किंतु आज उसकी प्रतीक्षा में है। सोच रही है ,कम से कम, आज तो वह आ जाए। वह अपनी खुशी उससे बांट लेना चाहती है, किंतु चंपक न जाने क्यों आ ही नहीं रहा है ? क्यूँ न मैं ,उसके घर फोन कर लूं ? पूजा ने सोचा- फोन पर तब भी नहीं बता पाऊंगी , मैं उसके चेहरे के भाव भी तो पढ़ना चाहती हूं ,यह सोचकर मन ही मन मुस्कुरा दी। वह भी सुनकर दंग रह जाएगा, न जाने उसकी क्या प्रतिक्रिया होगा ?उस नाजायज संबंध में भी वह खुशियां ढूंढ रही थी।


 उसने एक बार भी नहीं सोचा ,इसका परिणाम क्या हो सकता है ? पंद्रह  दिन  हो गए किंतु चंपक नहीं आया। उसे ऐसा क्या कार्य आ गया ? इंतजार बढ़ने के साथ-साथ उसकी चिंता भी बढ़ने लगी, आखिर चंपक क्यों नहीं आ रहा है ? अब इतनी प्रतीक्षा नहीं होती, आज मैं उसके घर फोन करके ही, जानकारी लूंगी। आखिर वह कहां व्यस्त हो  गया है ? क्या उसे अब मेरी याद नहीं सताती ?अनेक सवाल उसके मन में उठते, एक तो पढ़ाई, ऊपर से चंपक का व्यवहार , न  जाने क्यों ? आजकल मन भी कुछ ठीक नहीं रहता। स्वास्थ्य गिरा- गिरा सा रहता है , यही वजह होगी। आखिर वह भी तो डॉक्टर बनने वाली है, इतना तो वह समझ ही सकती है। 

हेलो ! उधर  से अरुंधति ठाकुर ने फोन उठाया -आप कौन बोल रही हैं ? 

जी मैं, पूजा ! क्या चंपक वहां है ?

पूजा कौन ? अरुंधति ठाकुर के इस तरह के प्रश्नों को सुनकर पूजा थोड़ी घबरा गई क्योंकि इससे पहले जब भी उसने फोन किया था। तब स्वयं चंपक ने  ही उठाया था। अभी भी इसी उम्मीद के साथ उसने यह फोन किया था किंतु चंपक का स्वर सुनाई नहीं दिया। जी मैं ,उसके कॉलेज में पढ़ती हूं। आप कौन बोल रही हैं ?

मैं उसकी मां बोल रही हूं , तुम्हें उससे क्या काम है ? उन्होंने कठोरता से पूछा। 

उससे कुछ नोट्स लेने थे, घबराते हुए पूजा ने बहाना बनाया। 

नोटस ही लेने हैं या फिर उसके साथ मंदिर भी जाना है, उन्होंने अंदाजे  से हवा में तीर छोड़ा , जो सही निशाने पर लगा। 

जी, यह आप क्या कह रही हैं ?

वही कह रही हूं जो तुम समझ रही हो। 

चंपक से दूर रहने में ही तुम्हारी भलाई है , यही तुम्हारे लिए बेहतर होगा। 

यह आप क्या कह रही हैं ?

अभी तो तुम्हें बताया, क्या तुम्हें एक बार में बात, समझ में नहीं आती क्रोधित होते हुए अरुंधति ठाकुर बोलीं। तुम जो कोई भी हो, जो तुम सोच रही हो ,वह नहीं हो पाएगा, तुम्हारा उससे दूर रहना ही ठीक है। 

आप एक बार चंपक से बात करवा दीजिए। 

क्यों ,बात करनी है ? वह यहां नहीं है, और अब दोबारा यहां पर फोन मत करना। कहते हुए उन्होंने फोन रख दिया। 

 उनके ऐसे शब्दों को सुनकर पूजा बुरी तरह घबरा गई और रोने लगी। ऐसा मैंने क्या कर दिया ? क्या ऐसा कुछ हुआ है? जिसके कारण चंपक नहीं आ रहा है। जब वह मिलेगा, तभी सारी बातें स्पष्ट होगीं । मजबूरी में मुझे उसके कॉलेज जाना ही होगा। अब तबीयत भी थोड़ी ठीक नहीं रहती। वह अपने घर जाने की सोच रही थी , तभी विचार आया -यदि घरवालों ने पूछा - मेरी तबीयत कैसे बिगड़ी, तो मैं क्या जवाब दूंगी? डॉक्टर को बुलाएंगे, उन्हें सब पता चल जाएगा। उसे लग रहा था, इस संसार में इस समय वह अकेली पड़ गई है , उसके साथ कोई खड़ा नजर नहीं आ रहा था । चंपक भी, प्रतिदिन आता था किंतु वह भी कई दिनों से नहीं आ रहा इस शहर में ,वही तो उसका सहारा था ,किंतु उससे पहले चंपक से मिलना चाहती थी। एक ही शहर में रहते हुए ,जो चंपक उसके इतने करीब था अचानक ही ,इतना अजनबी सा कैसे हो गया ? 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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