अरुंधति ठाकुर, पूजा पाठ में व्यस्त थीं , ईश्वर से बस यही प्रार्थना कर रही थीं - कि परिवार में खुशहाली रहे और उनके बेटे का भविष्य उज्जवल हो। आज उन्होंने व्रत रखा है, पति को तो व्यापार से समय ही नहीं मिलता है। बेटे से साथ चलने के लिए कहा था, किंतु न जाने कहां चला गया ? रामदीन को लेकर ही, वह मंदिर में आ गई ं। किसी बात को लेकर, बैठ नहीं जातीं। यदि किसी के पास उनके साथ जाने का समय नहीं है , तो इस बात को लेकर वह परेशान नहीं होतीं, साथ में जो भी चल देता है ,उसे लेकर अपना कार्य पूर्ण कर देतीं हैं। अभी वे मंदिर की परिक्रमा कर ही रही थीं , तभी उन्हें ऐसा लगा -जैसे उनका बेटा उनके सामने खड़ा है। उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ, मन ही मन खुश होते हुए सोचने लगीं -उस समय तो चला गया था, किंतु जब अपनी मां का ख्याल आया होगा तो मुझसे मिलने सीधे मंदिर ही आ गया। इस बात से अति प्रसन्न होती हैं ।
चंपक एक वृक्ष की छाया के नीचे खड़ा था, और इधर-उधर देख रहा था ,उन्हें लग रहा था -शायद ,वह उन्हें ही ढूंढ रहा है। अभी तक चंपक ने अपनी मां को नहीं देखा था, वह नहीं जानता था कि माँ भी इस मंदिर में आएंगी।
किंतु अरुंधति तो बहुत ही प्रसन्न थी क्योंकि आज उनका बेटा उनके लिए मंदिर तक चला आया। अपनी परिक्रमा पूर्ण करके ,वह अपने बेटे से मिलने के लिए उतावली हो रही थीं। रामदीन को बुलाया-और उसे पूजा का समस्त सामान उठाकर लाने के लिए कहा और वह मंदिर की सीढ़ियों से उतरकर चंपक से मिलने जाने लगीं। तभी उन्होंने देखा -एक बहुत ही खूबसूरत लड़की, पूजा की थाली लिए ,चंपक की तरफ बढ़ रही थी। उसे देखकर वह वहीं ठिठककर रह गईं और मन ही मन सोचने लगीं -क्या चंपक मेरे लिए आया है या फिर इस लड़की के साथ आया है ? उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था, ऐसा नहीं हो सकता मुझे लगता है,शायद उनके समझने में ,कोई गलतफहमी हो गई होगी। तभी वह लड़की उसके क़रीब आकर, चंपक के हाथ में पूजा की थाली देती है और उससे कुछ कह कर, वहां से चली जाती है। कुछ देर पश्चात, वह आती है और दोनों साथ में ,मंदिर से बाहर निकल जाते हैं।
यह देखकर उन्हें दुख होता है, कि मैंने बेटे से मंदिर जाने के लिए कहा था किंतु उसने मेरा कहना नहीं माना ,साथ ही, उनके मन में कई विचार और कई प्रश्न भी उमड़ उठते हैं-आखिर यह लड़की कौन है? जिसके साथ वह आया है। इससे, इसका क्या रिश्ता है ? इस लड़की से आज तक इसने हमें क्यों नहीं मिलवाया ? आखिर यह कौन हो सकती है ? चंपक के व्यवहार को देखकर तो वह पहले से ही, चिंतित थीं । उन्हें लग रहा था ,अवश्य ही कोई बात है। आज उसका उन्हें जवाब भी मिल गया। हो सकता है, इसके बदले हुए व्यवहार का कारण भी ,यही लड़की ही हो।
रामदीन को साथ लेकर वे वापस अपने घर आ गईं , इस बात के विषय में उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा। वह स्वयं ही नहीं समझ पा रही थीं इस बात को लेकर मुझे प्रसन्न होना चाहिए या फिर परेशान ! हैरत में तो वह पहले से ही थीं। उनके सभी सवालों का जवाब अब चंपक ही दे सकता है। उन्होंने इस बात का आभास रामदीन को भी, नहीं होने दिया। रामदीन भी ,चंपक को नहीं देख पाया। दिन भर उसकी प्रतीक्षा में रहीं। शाम के समय, चंपक ने घर में प्रवेश किया।
चंपक आजकल कहां व्यस्त रहते हो ? दोपहर में खाना भी नहीं खाया, अपना तनिक भी ख्याल नहीं रखते हो। आज सारा दिन कहां थे ?
मम्मी !आप भी न जाने कितने प्रश्न करती हैं ?
तुम माँ नहीं हो न...... तुम उस एहसास को समझ ही नहीं सकते, जिसके बेटे ने दिनभर खाना नहीं खाया उस मां को तो पूछना ही पड़ेगा न ! धैर्य से काम लेते हुए ठाकुर अरुंधति बोलीं।
आप मेरी फिक्र मत कीजिए ! मैं दोस्तों के साथ खा लेता हूं।
कभी तुमने अपने उन दोस्तों से हमें नहीं मिलवाया, कौन से दोस्त हैं ,कभी उन्हें बुलवाओ !
कुछ ज्यादा नहीं है,
कोई बात नहीं, जितने भी हैं, उन्हें परसों अपने जन्मदिन की पार्टी में अवश्य बुलाना। क्या तुम्हें यह भी स्मरण है या नहीं कि परसों तुम्हारा जन्मदिन है।
चंपक ने तारीख, का हिसाब लगाया और बोला-आप सही कह रही हैं, मैं तो भूल ही गया था।
ऐसे कैसे दोस्त हैं ,जिन्होंने तुम्हारा जन्मदिन तुमसे ही भुलवा दिया। उनका इशारा, पूजा की तरफ ही था, वह चाह रही थीं कि स्वयं चंपक ही, पूजा का परिचय उनसे करवाये किंतु चंपक ने एक भी शब्द पूजा के विषय में अपनी मम्मी से नहीं कहा।
मैं एक बात पूछना चाहती हूं,
जी पूछिए ! तुम्हारी पढ़ाई तो ठीक चल रही है।
हां सब ठीक है, लापरवाही से चंपक बोला और अपने कमरे में चला गया।
