पूजा ने ,अपने रहने के लिए अलग कमरा लिया हुआ था, वह स्वतंत्र रूप से अकेली रह रही थी। वैसे वह' मेडिकल कॉलेज' की छात्रा थी। अक्सर अपने दोस्त' चंपक' से मिलती रहती थी, चंपक से मिलने में किसी भी प्रकार की असुविधा न हो इसलिए उसने अपना छात्रावास ही छोड़ दिया। और चंपक भी कभी -कभार उससे मिलने ,उसके घर आ जाता था। उस दिन जो चंपक आया , उनकी दोस्ती के मध्य के सारे बंधन टूट गए , औपचारिकताएं समाप्त हुईं। अब उनकी दोस्ती, दोस्ती न रह गई, दोस्ती से बढ़कर भी एक और मजबूत रिश्ता बन गया था ।
पूजा तो पहले से ही चंपक से 'प्रेम 'करती थी, किंतु इस विषय में चंपक अभी पूरी तरह से ,किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाया था। अब दोनों काफी करीब आ गए थे। स्वतंत्रता से अपना जीवन जी रहे थे। जब भी, एक दूसरे की कमी महसूस होती तो चंपक मिलने आ जाता, दोनों का प्रेम परवान चढ़ रहा था। दुनिया समाज के नियमों को तोड़ ,वे अपने' पवित्र प्रेम' की गंगा में गोते लगा रहे थे। हालाँकि उनका यह रिश्ता समाज की नजर में 'अपवित्र 'हो सकता है। बिना विवाह के प्रेम के बंधन में बंधे थे। मन के' पवित्र प्रेम 'को किसी बंधन की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही थी।
किन्तु वे यह नहीं जानते थे ,सामाजिक दृष्टि से उनका ये प्रेम पवित्र नहीं,' अपवित्र' है।' हवस' मात्र है ,जब तक अपने बड़ों का आशीर्वाद और देवों के सामने फेरे होकर, उस रिश्ते को विवाह जैसे पवित्र बंधन में न बांधा जायेगा । तब तक वह रिश्ता 'अपवित्र' ही मन जायेगा किन्तु आजकल के बच्चे दो -चार अक्षर क्या पढ़ लेते हैं ?उन्हें लगता है ,जो वे कर रहे हैं ,वह ही सही है ,इसके लिए वे समाज की मान्यताओं को भी झुठला देना चाहते हैं किन्तु ये नहीं जानते ,समाज में रहने के भी कुछ नियम होते हैं और ये नियम बनाये ही इसीलिए जाते हैं ताकि किसी भी रिश्ते का दुरूपयोग न हो। ये जीवन और भविष्य दोनों को ही सुरक्षित करता है। पूजा डॉक्टरी की पढ़ाई तो कर रही थी, किंतु सामाजिक शिक्षा से अनभिज्ञ थी। उसके लिए तो चंपक ही सब कुछ था, बाकी उसे किसी बात से सरोकार नहीं था। अपनी जगह उसका 'प्रेम पवित्र 'था, इसलिए उसे किसी बात की परवाह नहीं थी। अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई के पश्चात ,वह चंपक के साथ अपने जीवन यापन के सपने देख रही थी। इसमें बुराई भी नहीं थी।
भोला मन ! जीवन की गहराइयों को कहां समझ पाता है ? अभी उसने जीवन देखा ही कितना है ? स्कूल से कॉलेज तक आई है, क्या जिंदगी इतनी सरल है ?' यदि यह जिंदगी इतनी सरल होती, तो अच्छे-अच्छे इ सको सोचकर रोते नहीं, किसी किसी को तो यह ''खून के आंसू रुला देती है'' बड़े-बड़े लेखक ,कवि इस जिंदगी के रहस्य को समझने में ही चले गए।'' आज तक इसका रहस्य कोई नहीं जान पाया। तब पूजा तो एक छोटी बच्ची की तरह ही है।
माता-पिता बहुत बड़े पारखी भी होते हैं ,उन्होंने जीवन देखा होता है। आजकल हमारा चंपक ना जाने कहां खोया रहता है? उसकी मम्मी ने अपने पति से कहा। अचानक न जाने कहां चला जाता है ? कहीं यह अकेलापन तो महसूस नहीं कर रहा।
ऐसा क्यों कह रही हो ? अभी इसकी उम्र ही क्या है ? यह उम्र तो दोस्तों के साथ घूमने फिरने की है। हो सकता है ,पढ़ाई का दबाव ज्यादा हो !
मुझे तो ये पढ़ाई का दबाव नहीं लग रहा, बल्कि अब खर्च भी कुछ ज्यादा ही करने लगा है , कुछ बात तो अवश्य है। मैं, वही नहीं समझ पा रही हूं।
तुम स्वयं ही, अपने बेटे से बात क्यों नहीं कर लेतीं ?
हां ,सोच तो रही हूं।
चंपक आज मुझे मंदिर जाना है ,तैयार होते हुए पूजा ने अभी थोड़ी देर पहले आये चंपक से कहा - चलो! दोनों ही साथ में जाएंगे और भगवान का आशीर्वाद भी ले लेंगे।
क्यों ?आज कुछ विशेष बात है।
तुम न जाने कौन सी दुनिया में खोए रहते हो ? हालांकि मैं डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही हूं किंतु मैं आस्तिक हूं तुम्हारी तरह नास्तिक नहीं, जिसे यह भी मालूम नहीं है, आज 'शिवरात्रि 'है। क्यों ?क्या तुम्हारे घर में यह त्यौहार नहीं मनाया जा रहा है ?
जो भी करती हैं , मम्मी ही करती रहती हैं , इन चीजों पर मैं विशेष ध्यान नहीं देता।
तो देना चाहिए , घर गृहस्थी में, पूजा- पाठ भी करना होता है। मैंने सब सीख लिया है, बड़े आत्मविश्वास के साथ पूजा बोली।
