लुका -छिपी का,खेल है खेलता !
जब तनिक ,सुकून है, मिलता,
ना जाने कब ?गायब हो जाता,
अभी पकड़ा , तभी पकड़ा......
पंछी सा वो, फ़ुर्र हो जाता !
कभी लगता है, यहीं कहीं है।
कभी लगता , कहीं नहीं है।
मान-मनोबल खूब कराता।
अपनी हुकूमत ही है, चाहता।
चिंताओं का पहरा है ,रहता।
असंतोष का डेरा है ,रहता।
सुकून को न....... आने देता।
मानव जीवन ,मनमर्जी का ,
विकारों ,की कैद में रहता।
इंसा सुकून की तलाश में,रहता।
ताउम्र ये खेल है, चलता रहता।
