Shrapit kahaniyan [ part 80]

दीपशिखा की ,मादक नजरें , आज किसी ने शिकार की तलाश में थीं , सबसे बड़ा हथियार तो उसके पास उसकी सुंदरता ही थी। किंतु उस सुंदर चेहरे के पीछे , उसका जहरीला मन किसी को दिखाई नहीं देता था। उसके पीछे की सोच को कोई नहीं पढ़ पाता था , कॉलेज के लड़के भी गायब हो रहे थे किंतु कॉलेज से नहीं , इसीलिए किसी को शक भी नहीं हुआ , कि यह कार्य इसी कॉलेज से हो रहा है। कॉलेज के हर लड़के लड़की पर दो शैतानी निगाहें हमेशा नजर रखे हुए रहती हैं। कोई भी समझ नहीं पाता कि यह नजरें किसकी हैं ? हां इतना अवश्य था ,यदि दीपशिखा नजर भर देख ले तो ,अपने को धन्य समझने लगते थे , बस उसके इशारे भर की देर थी। पहली उसकी खूबसूरती दूसरी उसकी सम्मोहन शक्ति , किसी को कुछ पता नहीं चलता था , कब वह मौत के कगार पर पहुंच गया ? बस ,लाशें  नजर आ रही थीं , किसी की बगीचे में , किसी की खेतों मे , अपनी काली शक्तियों को बढ़ाने के लिए , वह जिसका चाहे जैसा इस्तेमाल करती थी। 


सुनो ! सुनो ! किसी ने पीछे से चिराग को आवाज़ दी।

 चिराग ने पीछे मुड़कर देखा , एक खूबसूरत लड़की वहां खड़ी थी और उसी की तरफ देख रही थी। उसे देखकर वह बोला -क्या आपने मुझे पुकारा ,

हां , मैं ही तुम्हें पुकार रही हूं , क्या आज तक आपने मुझे देखा नहीं ? मैं आपके ही कॉलेज में पढ़ती हूं , अपनी मादक अदाओं से बोली। 

नहीं, मैं कॉलेज में कम ही आता हूं। 

क्यों ? क्या पढ़ने में दिल नहीं लगता ?

नहीं ,ऐसी कोई बात नहीं है ,मेरी अपनी व्यक्तिगत समस्याएं हैं। 

ओह ! तभी तुम मुझे नहीं जानते , कॉलेज का हर लड़का मुझे जानता है अभिमान से बोली। 

ठीक है ,वह मुस्कुराया और आगे बढ़ गया। 

आपने  यह तो पूछा ही नहीं ,मैं आपको क्यों पुकार रही थी ?

चिराग़  चलते चलते रुक गया और बोला - कहिए ! क्यों पुकार रही थी ?

यह आप का तरीका बात करने का सही नहीं है , मैं कोई ऐसी- वैसी लड़की नहीं हूं  , अच्छे परिवार से अच्छे खानदान से हूँ , वह तो मैं इसलिए पूछ रही थी ,कई दिनों से मैं, कॉलेज नहीं आई तो शायद ,पढ़ाई में आप मेरी मदद कर दें ,बात बनाते हुए बोली।  

जी नहीं , मैं तो स्वयं ही कभी-कभी आता हूं , आप किसी और से पूछ सकती हैं। कहकर वह फिर से जाने लगा। 

फिर तो तुम्हें भी किसी के सहायता की जरूरत होगी , तुम्हारा भी काम छुटा हुआ होगा, किसी से नोट्स  लेने होंगे। क्यों न हम दोनों ही, मिलकर कार्य कर लेते हैं ? एक दूसरे को अच्छे से समझा भी सकते हैं। 

ठीक है ,देखता हूं , लंच टाइम में तुम मुझे बगीचे में मिलना ,कहकर वह चला गया।

रमा अपने घर में , डरी सहमी सी बैठी थी , मां ने कई बार उससे पूछा भी, किंतु उसने कुछ नहीं बताया , समझ नहीं आ रहा है ,इस लड़की को क्या हो गया है ? दो  दिन से कॉलेज भी नहीं गई है और घर में ही डरी सहमी सी बैठी रहती है ,ना ही किसी से कुछ कहती है ,ना ही किसी से कुछ बताती है , अपने पति से बातचीत करते हुए वह बोलीं।

 क्या ,तुमने इसे किसी डॉक्टर को दिखाया ? 

नहीं अभी तो नहीं गयी सोचती हूँ ,आज उसे लेकर किसी डॉक्टर के मिल ही आती हूँ। 

हाँ यही सही रहेगा ,पता तो चले ,आखिर ये ऐसी हरकत क्यों कर रही है ? 

तभी ,रमा की चीख उन्हें सुनाई देती है ,दोनों ही पति -पत्नी उसके कमरे की ओर दौड़ते हैं ,वो बुरी तरह घबराई हुई थी ,अपनी मम्मी को देखकर किसी बच्चे की तरह ,अपनी माँ के आँचल में छुप गयी।क्या हुआ ?तू चीखी क्यों ?

मम्मी मुझे ड़र लगा रहा है। 

किस बात का ड़र लगा है ?रमा ने कुछ नहीं बताया ,बस माँ के आंचल में छिपी काँपती  रही ,आखिर मेरी बच्ची को क्या हुआ है ?आखिर तू चीखी क्यों थी ?

वहाँ खिड़की में कोई था। 

बस इतनी सी बात ,तू तो मेरी बहादुर बच्ची है ,इतनी छोटी -छोटी बातों से ,तू कबसे डरने लगी ?उसको आश्वस्त करते हुए बोलीं ,चल मैं तेरे साथ इसी कमरे में हूँ। अब शेफाली को न ही पढ़ने की कोई फिक्र ,न ही परिवारवालों से तो जैसे उसे कोई सरोकार ही नहीं रहा गया था। वो जानती है ,कि ये लोग इसके जन्म के माता -पिता हैं ,इससे ज्यादा मेरा इनसे कोई संबंध नहीं। दीपशिखा पर नजर रखना, अब शेफाली को तो जैसे बस यही काम रह गया  था।ये भी न, कितनी शैतान हो गयी है ?पता ही नहीं चलता ,पल में कहाँ से कहाँ पहुंच जाती है ? 

दोपहर के खाने के समय वो ,बगीचे में थी ,वो बेसब्री से चिराग़ की प्रतीक्षा में थी ,दीपशिखा से मुलाकात के पश्चात ,वो शयद उस बात को भूल भी गया ,दीपशिखा उसकी प्रतीक्षा में थी। धीरे -धीरे उसका क्रोध बढ़ने लगा। अब तो उसे याद दिलाना ही होगा ,वो किसे नजरअंदाज कर रहा है ? चिराग़ कैंटीन में बैठा चाय पि रहा था ,तभी उसके कानों में ,कुछ स्वर गूंजने लगे ,पहले तो उसे लगा ,जैसे उसका कोई वहम है किन्तु इस वहम को ज्यादा देर तक न पाल सका ,आवाज बढ़ने लगी ,उसने साथवाले से पूछा -क्या तुमने कुछ सुना ?ऐसा लग रहा है ,जैसे कि कोई पुकार रहा है। 

नहीं ,मुझे तो कोई आवाज नहीं आ रही। 


किन्तु मुझे तो लग रहा है ,जैसे कोई कह रहा है ,आ जाओ !आ जाओ !

तुम ये क्या कह रहे हो ? कौन तुम्हें बुला रहा है ? कुछ भी वहम मत पालो ,चलो अपनी चाय पीओ !

दोस्त के कहने पर ,वो फिर से अपनी चाय में व्यस्त हो गया ,तभी उसे इस लगा ,जैसे उसके कान में ,बड़ा कीड़ा घुस गया है। वो अपना कान टेढ़ा करके झाड़ने लगा ,शायद कुछ निकल आये ,किन्तु उसे बड़ी अजीब सी ध्वनि उसे सुनाई दे रही थी , चिराग़ की हरकतों से उसका दोस्त भी परेशान होरहा था। कुछ समझ नहीं आ रहा ,अचानक इसके कान में क्या हो रहा है ? चिराग बार -बार अपने कान से ,किसी चीज को बाहर निकलने का प्रयास कर रहा था किन्तु वो कीड़ा निकलने के बजाय ,लग रहा था ,जैसे और अंदर को जा रहा है। चाय भी रखी रह गयी ,उधर दीपशिखा ,बगीचे में बैठी ,आँखें मूंदे न जाने क्या बुदबुदा रही थी ,उसके चेहरे पर भाव आ जा रहा थे। अब तो अन्य छात्रों  का ध्यान भी , चिराग की तरफ गया ,कोई उसके कान को देखने का प्रयास कर रहा था किन्तु कुछ नहीं दिखा ,चिराग़ दर्द से कराह उठा ,अब उसके कान में ,तेज चुभन होने लगी  एकदम से चीख उठा।  

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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