प्रातः काल का समय है ,चिड़ियों की चहचहाहट से, प्रभा का ध्यान भंग हुआ , उसने अपनी खिड़की का पर्दा हटाया और बाहर झांककर देखा, कुछ अंधेरा तो है ,किंतु पंछियों के जागने का समय हो गया है। घड़ी में समय देखा, साढ़े चार बज चुके हैं। जम्हाई लेते हुए, सुबोध से कहती है - तुम्हारी कहानी इतनी रोचक थी , रात्रि कैसे बीत गई ?पता ही नहीं चला। मैं तो जैसे उस में ही खो गई थी , कहानी सुनकर बहुत अच्छा लगा और दुख भी हुआ। उस अघोरी के कारण ,शेफाली को उसका प्यार दूसरे जन्म में भी नहीं मिल सका। अगले जन्म में तो ,वह शैतान ही बन गया ,तब कैसे मिलन होता ? किंतु 'कुंभार्क ' को तो उसके शापित जीवन से मुक्ति मिल ही गई ,बेचारी शेफाली को श्राप और मिल गया। अब सुबोध भी जम्हाई ले रहा था। मैं तुम्हारे लिए चाय बना कर लाती हूं ,कहते हुए ,प्रभा बाहर निकल गई। सुबोध भी परेशान था , ऑफिस जाना होगा या फिर छुट्टी ले लूँ। तभी प्रभा चाय लेकर आ गई किंतु अभी भी उसका मन ,उसी कहानी में अटका हुआ था ,वो सुबोध से बोली -मैं तो शेफाली को कोई' भूत 'या 'आत्मा 'समझ रही थी , वह तो 'शापित ' निकली। चाय का घूंट भरते हुए , बोली -एक बात समझ में नहीं आई ,जब वह' शापित 'थी ,और किसी को दिख नहीं सकती थी ,तब वह ''दीपशिखा '' को किस तरह से दिख रही थी ? दीपशिखा उसे कैसे देख सकती थी ?
सुबोध, खिड़की के पास खड़ा होकर चाय पी रहा था और बोला -जब शेफाली' बाबा ब्रह्मानंद जी 'के पास गई , तो बहुत रो रही थी , उसे शापित होने का दुख नहीं था , उसे कुंभर्क के जाने का दुख था , उसने कुंभर्क के विश्वास को तोड़ा ,इस बात का दुख था। उसकी क्रोध से लाल आंखें देखकर वह समझ गई थी कि वह उस पर कभी विश्वास नहीं कर पाएगा। साधारण मानव की तरह ,उसके साथ अपना जीवन व्यतीत नहीं कर सकती थी , इतने लोगों की तो उसने जान बचा ली किंतु अपने लिए कुछ ना कर सकी। तब उसने रोते हुए ,बाबा से इस समस्या का हल पूछा था। वह कह रही थी -'' बाबा जब तक मैं, दस ''प्रेमी जोड़ी ''नहीं बना देती , या उन्हें मिलवा देती तब तक मेरा' श्राप 'समाप्त नहीं होगा। मैं कब तक इस तरह भटकती रहूंगी ?''
तब बाबा ने उसे आश्वस्त किया और बोले -तुम्हें कुंभर्क ने श्राप दिया है, किंतु मेरा आशीर्वाद अभी बाकी है। कहते हुए ,बाबा ने उसके सर पर हाथ रखा और बोले -तुम जब, जिस इंसान को दिखना चाहोगी ,दिख सकती हो, यह मेरा आशीर्वाद है। तुम्हारा श्राप पूर्ण होते ही, तुम इस दुनिया में नहीं रहोगी। तब शुभ घड़ी में शुभ मुहूर्त पर, तुम दोनों का जन्म होगा ,और तुम दोनों का मिलन भी होगा। तब से वह शेफाली इसी तरह से भटक रही थी ,जब उसने मुझे दीपशिखा को मेरी ओर आकर्षित होते हुए देखा ,तो उसने सोचा -क्यों ना मैं इन दोनों को मिलवा दूं।
ओह ! तो यह कारण था, उसका दीपशिखा को ही दिखना , इसीलिए उसने अपनी कहानी को नाटक के रूप में और तुम्हें उसमें नायक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए कहा , ताकि तुम दोनों करीब आओ ! प्रभा ने उनकी मंशा समझते हुए कहा। तब तुमने दीपशिखा के नाटक में भाग लिया या नहीं , प्रभा ने पूछा।
नहीं, क्योंकि मुझे उसके साथ किसी भी प्रकार की' सकारात्मकता' का एहसास नहीं होता था। मैंने उससे पहले ही इंकार कर दिया था किंतु वह तो जैसे जिद पर अड़ी थी।
इसका अर्थ है, शेफाली को एक प्रेमी जोड़ा नहीं मिला , न जाने वह कितने जोड़े बना चुकी होगी ?या बनाने का प्रयत्न कर रही होगी। इस बात का कैसे पता चलेगा ? प्रभा ने पूछा।
यह तो मैं भी नहीं जानता ,वह कितने जोड़े बना चुकी ,या बना रही थी ?किंतु मेरे साथ ,दीपशिखा का जोड़ा नहीं बन सकता था और दीपशिखा मुझे आकर्षित करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद कुछ भी अपनाने को तैयार थी। यदि शेफाली मुझे दिखती तो शायद मैं उसकी कुछ मदद कर पाता किंतु वह दीपशिखा को ही दिखती थी।
तभी जैसे प्रभा को विचार आया , बोली -शेफाली मुक्ति के लिए , एक बहुत बढ़िया उपाय ,मेरे मन में आया है , यदि वह मुक्त हो चुकी है ,तो सही है वरना हम उसकी मदद करेंगे। प्रभा ने खुश होते हुए ,सुबोध को बताया।
हम भला उसकी कैसे मदद कर सकते हैं ?ना ही कभी हमसे उसने मदद मांगी है ,सुबोध को प्रभा की बात कुछ बेतुकी सी लगी।
यदि शेफाली नाम की हस्ती है और वह अभी भी , इस जीवन को जी रही है, तब हम उसकी सहायता अवश्य करेंगे ,विश्वास के साथ प्रभा ने कहा, तुम्हारी इस कहानी में ही मुझे ,उसकी समस्या का हल मिल गया था।
क्या हल ? सुबोध ने उत्सुकता से पूछा।
वह तो मैं तुम्हें समय आने पर ही बताऊंगी , उससे पहले अब तुम थोड़ा आराम कर लो !सो लो! और मैं भी थोड़े से घर के काम निपटा लेती हूं। सुबोध सोने का प्रयास करता है, तब प्रभा भी घड़ी में समय देखती है , मन ही मन बुदबुदाती है -अभी चंदा के आने में समय है, क्यों ना ,मैं भी थोड़ी देर आराम कर लूँ।सोचते हुए ,वहीं सुबोध के समीप लेट गयी ,दोनों रातभर के जगे थे ,तुरंत ही नींद आ गयी।
भाभी ,भाभी...... प्रभा के कानों में ,चम्पा की आवाज गूंज रही थी ,वो सपने में ऐसा महसूस कर रही थी ,जैसे उसे चम्पा आवाज लगा रही है ,धीरे -धीरे उसे एहसास होने लगा ,कि सच में ही ,कोई उसे पुकार रहा है ,तब उसने अपनी आँखें खोली ,उसके सामने चम्पा खड़ी उसे पुकार रही है।
प्रभा की आँखें खुलते ही ,वो बोली -क्या बात है ?भाभी !जो आज उठने में इतनी देरी हो गयी , आपकी तबीयत तो ठीक है।
अलसाते हुए , प्रभा ने, चंपा से समय पूछा -अभी कितने बजे हैं ?
साढ़े आठ , बज गए हैं , क्या ,आज नाश्ता नहीं बनाना है ?
चंपा के इतना कहते ही , सुधा में तो जैसे बिजली भर गई और वह बेहद फुर्ती से उठी -क्या ?इतना समय हो गया , तभी अपने बराबर बिस्तर पर देखा, वहां सुबोध नहीं था, इसका अर्थ है ,सुबोध ,मुझसे पहले उठ गया। सोचकर प्रभा ने भी अपना बिस्तर छोड़ दिया और किचन की ओर चल दी।
''शापित कहानियों ''का सिलसिला अभी यहीं पर समाप्त नहीं हुआ है , यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा , बस आप लोग, अपना सहयोग और समीक्षा देते रहिए।

