शेफाली ,जब कुंभर्क से मिलती है, तब उस 'मायाजाल' में उसे एक स्थान ऐसा मिलता है ,जहां पर बहुत सारी सीढ़ियां थीं ,वो उसके अंदर चलती चली जाती है। कुंभर्क भी उसके साथ था , सीढ़ियों के अंत में , उन्हें एक गांव दिखलाई पड़ता है। शेफाली उस गांव में घूमती है और देखती है कि एक सिंहासन पर एक व्यक्ति बैठा हुआ है ,कुछ व्यक्ति कार्य करते हुए ,जैसे थे ,वैसे ही पुतले का रूप बन गए हैं। देखने से ऐसा लग रहा था कि जो जैसा कार्य कर रहा था वह वैसा ही खड़ा, पुतला बन गया था, जो बैठकर कार्य कर रहा था, वह बैठा ही रह गया। इतनी बर्फ के नीचे एक गांव , यह आश्चर्य कर देने वाली बात थी। तभी शेफाली को बाबा ब्रह्मानंद जी की बात स्मरण हो आती है ,और वहां पर कुछ ढूंढने लगती है। ढूंढते -ढूंढते जब काफी देर हो जाती है ,तब वह कुंभर्क से कहती है -चलो ,अब हम वापस चलते हैं।
कुंभर्क कुछ भी नहीं समझ पाया , वापस आकर कुंभर्क ने अघोरी को ,वहां की कोई भी बात बताना उचित नहीं समझा। किंतु शेफाली बाबा के पास गई और उसने संपूर्ण वार्तांत और गांव का चित्रण ,बाबा को सुनाया,जिसे सुनकर बाबा अचंभित रह गए और बोले -हो सकता है ,यह वही गांव हो ,जो कई हजारों वर्ष पहले , इस धरा में समा गया था ,कहते हैं , जहां से अवतार आया है।
तब शेफाली ने बाबा से पूछा -बाबा ! वहां सिंहासन पर एक आदमी बैठा था, वह कौन हो सकता है ?
बाबा ने कहा -ऐसा कैसे हो सकता है ?अवतार तो यहां हैं, वह सिंहासन अवतार का ही है। अचानक बाबा के मन में एक विचार कौंधा , और कुछ सोचने लगे, शेफाली से पूछा -क्या तुम्हें पक्का विश्वास है कि उस सिंहासन पर एक व्यक्ति बैठा था।
जी बाबा ! आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं ?
तभी बाबा कुछ सोचते हुए बोले -ऐसा कैसे हो सकता है ? क्या मेरी अंतर्दृष्टि इसी ओर इशारा कर रही थी ?
आप कैसी बात कर रहे हैं ?मैं कुछ समझी नहीं , शेफाली परेशान होते हुए बोली।
क्या ,तुम्हारे साथ कुंभर्क भी था ? बाबा ने प्रश्न किया।
जी बाबा ,वह मेरे साथ था। उसी के द्वारा रचाये गए ''माया जाल'', से तो मैं वहां तक पहुंची किंतु आपने कहा था ,कि उन लोगों के दिल वही कहीं छुपे हुए रखे हैं। उनके दिल उनके शरीर में डाल दिए जाएं तो जिंदा हो सकते हैं।
हां कहा तो था ,तुम्हें क्या कोई ऐसा स्थान मिला ?
मिला तो था,किंतु मैंने कुंभर्क के सामने, उस बात को व्यक्त नहीं किया , क्योंकि मैं उस पर विश्वास कर सकती हूं तब तक, जब तक कि वह इंसान है ,अपने शैतानी रूप में आएगा ,तब वह अघोरी का कहा ही मानेगा ,ऐसा मेरा यकीन है। इसलिए मैंने इस बात को उससे गुप्त रखा।
बाबा प्रसन्न होते हुए बोले -ये तुमने सही किया , क्या हम दोनों उस स्थान पर चल सकते हैं ?
बाबा वह रास्ता तो कुंभर्क ही खोलता है , अघोरी से अपनी और मेरी बातों को छुपाए रखने के लिए क्योंकि अघोरी की हर पल हम पर नजऱ रहती है। उसके पास एक ऐसी शक्ति है, जिससे वह मेरे जैसा और अपने जैसा , इंसान बना कर वहां बिठा देता है ताकि अघोरी को लगे ,हम वहीं हैं किंतु हम तो कुंभर्क के मायाजाल में होते हैं।
अति उत्तम ! तुम मेरे सभी प्रश्नों का जवाब लेकर आई हो, मैं तब से यही यूं ही परेशान हो रहा था, मेरी अंतर्दृष्टि में जो दो समान परछाइयां दिख रही थीं , यह उन्हीं का जवाब है।
बाबा !कुछ भी समझ नहीं आ रहा आप कहना क्या चाह रहे हैं।
अभी समझाता हूं ,पहले देखो ! जरा बाहर जाकर ,अवतार है या नहीं।
क्या उसको बुलाना है ? वह तो आपका विशेष व्यक्ति है।
नहीं ,वह मंदिर के अंदर तो कभी आता ही नहीं , ना ही मैंने ,कभी इस बात पर ध्यान दिया , किंतु आज जो मुझे संकेत मिले उसके आधार पर मैं ,कुछ परेशान था जिसका हल तुम निकाल कर लाई हो। कल जब तुम कुंभर्क के साथ उस मायाजाल में जाओगी ,तब मैं भी ,तुम्हारे साथ चलूंगा ,वहीं हमारे सभी प्रश्नों के जवाब मिल जाएंगे।
अघोरी, कुंभर्क से नाराज था , उससे कह रहा था -कितने दिन हो गए ? किंतु तुम अभी तक उस लड़की को यहां लेकर नहीं आए।
वह लड़की तो स्वयं ही ,आने यहां आने के लिए तैयार है , कुंभर्क ने अघोरी को खुशखबरी सुनाई, एक तरफ अघोरी अपनी योजना कामयाब होने के लिए ,बेसब्री से इंतजार कर रहा था।
दूसरी तरफ बाबा ब्रह्मानंद भी उसकी योजनाओं को असफल करने की तैयारी में जुटे हुए थे।
अगले दिन ,बाबा और शेफाली उस मायाजाल के रास्ते उस गांव में प्रवेश करते हैं और यह देखकर बाबा आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि अवतार तो स्वयं अपने सिंहासन पर विराजमान है फिर वह उनके पास जो अवतार है ,वह कौन है ? यह प्रश्न उनके मस्तिष्क में घूमता है , यही बात वह शेफाली से भी बताते हैं , तब शेफाली भी आश्चर्यचकित रह जाती है कि वह कौन है ? किंतु शेफाली ने जो उस दिन गांव में देखा था वह चीज अब बाबा को बताने का समय आ गया है। बाबा को एक कुएं के करीब ले जाती है और उस कुएं के पानी में झांकने के लिए कहती है। तब बाबा को ,एक परछाई दिखी जिस पर दिल बना हुआ था। बाबा समझ गए -कि यह मुझे यहां क्यों लेकर आई ? और कुंभर्क को बाहर ही क्यों छोड़ दिया ? कुंभर्क से झूठ बोला - कि बाबा उस गांव को देखना चाहते हैं , जबकि वह गांव वालों के दिल का स्थान ढूंढ कर ,बाबा को लेने के लिए आई थी।
ब्रह्मानंद जी ने उस परछाई को अपनी शक्ति के द्वारा बाहर निकाला। वह एक कमल का फूल था , जो कि अभी बंद था बाबा अपने मंत्र उच्चारण द्वारा उसे खोलने लगे ,जैसे-जैसे बाबा मंत्र पढ़ते जा रहे थे ,वैसे वैसे ही वह गांव जीवंत होता जा रहा था , कमल की पंखुड़ियां धीरे-धीरे,एक -एक करके खुलने लगी, और उनके अंदर से छोटे-छोटे दिल निकल कर हवा में उड़ने लगे, जब तक वह कमल पूरी तरह से नहीं खिल गया तब तक वो छोटे -छोटे दिल, इसी तरह हवा में लहराते रहे कमल पूरा खिल जाने के बाद , वे सभी दिल हवा में गायब हो गए। शेफाली चुपचाप बैठे हुए ,यह क्रिया देख रही थी उसे बहुत ही आश्चर्य होता जा रहा था ,कि क्या कोई गांव भी ऐसा निर्जीव प्राणियों जैसा भी हो सकता है और उनके दिल भी कहीं, अलग स्थान पर सुरक्षित भी हो सकते हैं। यह तो एक काल्पनिक लग रहा था ,जो सोच से भी ,परे ही हो सकता है लेकिन यह सब उसके सामने घटित हो रहा था। कुछ समय तक बाबा ,इसी प्रकार आंखें मूंदे बैठे रहे धीरे-धीरे उन मिट्टी के पुतलों में हलचल होने लगी।
तब अवतार ने अपने सिंहासन से उठकर , बाबा के चरण स्पर्श किए , उसे देखकर अब शेफाली के मन में प्रश्न उठे, यदि यह अवतार है ,तो फिर हमारे साथ कौन है ?जो हमारी सुरक्षा कर रहा है ,जिसने हमें उस जंगल से बचाया ,हमें उस अघोरी के लोगों से बचाया ,वह कौन था ? या है। बाबा ने कुछ बातें अवतार से की और शेफाली से बोले- हमें शीघ्र ही यहां से निकलना होगा वरना कुंभर्क यहां आ जाएगा उसको इस बात का पता नहीं चलना चाहिए ,कहते हुए ,वो तीव्र गति से बाहर की और प्रस्थान करते हैं।

