Haunted [part 30]

डिकोस्टा ,कामिनी का दुख - दर्द कम तो नहीं कर सकता था , किंतु सोचता था -कुछ ऐसा किया जाए, जिससे कि इसके मन को सुकून मिले। एक  दिन डिकोस्टा बोला -इस कुएँ को छोड़ कर , कहीं और चलते हैं। यहां से भी अलग इस दुनिया में ,बहुत सारी जगह हैं ,जहां पर हम अपना एक  आशियां बना सकते हैं। यहाँ रहोगी तो ,अपनी यादों के कारण परेशान ही रहोगी। 

उसकी बात सुनकर, कामिनी और परेशान उठी , और बोली -नहीं ,मैं नहीं जा सकती। अब यही कुआं ,मेरी दुनिया है। जहां पर मौत होती है ,उस स्थान को हम नहीं छोड़ सकते , हमारी कुछ सीमाएं हैं , हमें उससे बदला लेना है ,इसीलिए हम इस से बाहर निकलते हैं , उसके पश्चात यहीं के होकर रह जाते हैं। यही मेरा निर्जीव तन भी था जो अब  कंकाल में बदल चुका है। जब तक हमारा अंतिम संस्कार नहीं हो जाता, तब तक हम इसी कुएँ से बंधे  रहेंगे। ये भी कह सकते हैं ,यही हमें, उस औरत के धोखे की याद दिलाता रहेगा। 


उनकी बात सुनकर डिकोस्टा ने  एक गहरी सांस ली , और बोला-तब तो इन इंसानों को उनके कर्मों का हिसाब चुकाना ही होगा , किसी की सोच ,किसी के कर्मो का हिसाब ,आज यह दोनों मां -बेटियां चुका रही हैं। तभी कामिनी की बेटी ,दोनों हाथ पैरों से चलती हुई ,कुएं से बाहर आई , तेज गर्मी थी, घनी दुपहरी थी और वह उस दुपहरी में, अपने घर के पास चली गई , वह घर जिसने उसे कभी अपनाया ही नहीं, वह घर के अंदर नहीं जा सकती थी इसीलिए घर के बाहर जो पेड़ था उसी पर लटक गई। जैसे ही कामिनी की सास , किसी कार्य से घर से बाहर निकली, तभी अचानक न जाने कहां से बहुत सारा पानी आ गया और वह तेजी से फिसली , और सड़क पर धड़ाम से आ  गिरी। दादी की ऐसी हालत देखकर ,उसको सुकून मिला किन्तु उसकी दादी  सोच रही थी -आजकल अचानक मेरे साथ क्या होने लगा है ? कुछ भी ठीक नहीं हो रहा, परिवार के सदस्य बीमार रहने लगे हैं। अपने किए कर्म को तो वह भूल ही चुकी थी, और अपने उसी बेटे की दूसरी शादी करा दी थी , जिसके बच्चे होते हैं किंतु जिंदा नहीं बचते क्योंकि उसकी आने वाली नस्लों पर , कामिनी  की बेटी का 'शाप ' जो लग चुका था। 

कुछ समझ नहीं आ रहा था, यह सब क्या हो रहा है ? ना ही घर में बरकत रही , ना ही घर के लोग स्वस्थ हैं , तब कामिनी की  सास ने पंडित जी को बुलाया , पंडित जी ने देखा, बोले -कुछ ग्रह तो, चाल तो चल रही हैं , जो इस परिवार का अनिष्ट चाहती हैं। 

पंडित जी कुछ उपाय तो बतलाइए, घर में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है , वह परेशान होते हुए बोली। 

हां- हां वो तो ,मैं भी देख समझ रहा हूं , घर की उन्नति के लिए एक शांति हवन कर लीजिए और घर के लोगों की, इस घर की नजर भी उतार लीजिए ,कहते हुए -पंडित जी ने सामान लिखवा दिया। 

हवन तो हुआ और नजर भी उतरी किंतु ज्यादा कुछ खास लाभ नहीं हुआ। जो कर्म वह करके आई थी, वह तो उसने छुपाया हुआ था, जिसके कारण ही  सब हो रहा था उसका उपाय तो ,सोचा ही नहीं। दोनों मां- बेटी घर के अंदर तो नहीं जा पा रही थीं  किंतु उनकी  कुदृष्टि अवश्य वहां तक पहुंच रही थी , घर में शांति होती भी  कैसे ? वह जो दो आत्माएं कुएं में थीं , वह भी इसी घर की थीं ,उनकी आत्मा की शांति के लिए तो उसने कुछ भी नहीं किया , न ही उन्हें इस घर का सदस्य मान रही थी ,वह तो अपने कर्म करके भूल गई किंतु  जिनके साथ हुआ था ,वह अभी तक नहीं भूले। आये दिन ,हादसे होते ही रहते।

 उधर भूतों के स्कूल से बाहर ,भूतों  का मेला ,उन ''भूत बच्चों ''को नजर आया। तब निम्मी कहती है -आओ , दोस्तों !चलें , देखते हैं, इस मेले में क्या मिलता है ?

हम ऐसे कैसे जा सकते हैं ?हमने किसी से पूछा भी नहीं , देखा नहीं ,मोना चुड़ैल कितने गुस्से में रहती हैं ? वैसे ही वो हमसे खफा है ,हमें इधर देख लिया तो और नाराज होंगी ,अफ़रोज बोला -आज हमने जो भी अपनी कक्षा में सीखा है ,उसका अभ्यास भी तो करना है  

नहीं होंगी , तुमने सुना नहीं था, हमारे प्रधानाध्यापक ने क्या कहा था ? इनको जो सीखना है इनको सीखने दें , जो जानना चाहते हैं वह जानने दें ,कोई भी नियम या बाधा नहीं है, निम्मी ने कहा -क्या अभी भी इंसानी बच्चों की '' होमवर्क ''ही करना है। मैं तो खुश हो रही थी ,चलो ,भूत बनकर ,पढ़ना और' होमवर्क 'नहीं करना होगा।   

हाँ यार !ये तो सही कह रही है ,इतना काम मिलता था ,अपने विषय में सोचने का भी समय नहीं मिलता था। अपने मतलब की बात तुझे बड़ी याद रहती है ,  लड़कियों ने बाजार देखा नहीं, खरीदारी की लग जाती है ,चाहे वह भूत भी क्यों ना हो ?कहकर रोहित हंसने लगा। 

निम्मी मुंह फूलाते हुए बोली -तुझे ज्यादा पता है , तुम लोगों को तो जैसे किसी सामान की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है। 

तभी टॉम बोला -अब लड़ना बंद करो , सबसे पहले तो यह सोचो!  कि हमारे पास तो पैसे ही नहीं है खरीदोगे क्या ,कैसे खरीदोगे ?

हां ,यह बात तो सोचने की है , वैसे तो धन की आवश्यकता है या किसी को भी नहीं है ,हो सकता है, यहां पर खरीदारी का कोई अलग ही तरीका हो सूरज बोला। 

अब यही खड़े  रह कर बात करते रहोगे , यहां से चलकर भी देखोगे ,निम्मी उतावलापन से बोली। 

हां हां चलो ! कहते हुए ,वह लोग ,उस भूतों के मेले में ,जाते हैं। उन्होंने देखा -बहुत सारे भूत पहले से ही वहां  घूम रहे हैं। बच्चे देखते हैं ,वहाँ पर बहुत सी  अद्भुत चीजें हैं। वो देखते हुए आगे बढ़ रहे थे ,तभी एक बोला -ये लो !जादुई चश्मा !जादुई चश्मे का नाम सुनकर ,इसके अंदर केेसा जादू है ? क्या जादू करता है ?

तब वो बताता है ,इस चश्में से तुम लोग ,किसी भी चीज को गहराई से देख सकते हो ? 

उससे लेकर निम्मी ने चश्मा लगाया ,तब उसे सारे आर -पार नजर आने लगे ,जिन्हें देखकर वो हंसने लगी तभी उसने दूर किसी घर को  देखा तब उसे घर का सम्पूर्ण नजारा दिखने लगा ,निम्मी चहकते हुए बोली -हम यहाँ से किसी चीज पर भी, दृष्टि रख सकते हैं। 

इस तरह किसी भी चीज को देखने से क्या लाभ ?इससे कोई लाभ नहीं है ,चलो ! कुछ और देखते हैं ,तन्मय बोला। 

किन्तु निम्मी को वही सही लगा और बोली -नहीं ,मुझे यही लेना है ,मैं तो यही लूँगी कहते हुए उसने अपनी  आँखों पर वह चश्मा लगा लिया -तब उसने देखा ,कोई है ,जो छुपकर उन्हें देख रहा है ,चश्मा उतारकर देखा तो ,कुछ भी नहीं दिखा। उसका मन नहीं माना और उसने वो चश्मा ले ही लिया।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post