Shrapit kahaniyan [part 71]

बाबा ब्रह्मानंद जी ,को अपने ध्यान में ,दो आकृतियां नजर आ रही थीं किंतु समझ नहीं पा रहे थे , यह दो  आकृतियां किसकी हैं ?जो एक जैसी दिखाई दे रही हैं। चिंतित बाबा, मंदिर के' गर्भ गृह' में जाते हैं , वहां उस मंदिर से संबंधित कुछ प्राचीन पुस्तकें भी थीं , उन्हें देखने लगे ,किंतु ठीक से जवाब नहीं मिल पा रहा था। दिमाग पर बहुत जोर दिया ,एक आकृति स्पष्ट दिखाई दे रही है दूसरी थोड़ी धुंधली , तभी उन्हें दिखता है ,जैसे नरसंहार हो रहा है। कुछ तो अनिष्ट होने वाला है , पुस्तक पढ़कर अपना ध्यान लगाने का प्रयास करने लगे। पुस्तक इसीलिए पढ़ रहे थे ,कि कोई काम की चीज मिल जाए।

 उधर कुंभर्क  और शेफाली, प्रतिदिन उस मायाजाल में मिलते हैं, कुंभर्क  ने तो अपने विषय में बताना चाहा किंतु जब उसे पता चला ,कि शेफाली को तो उसके विषय में, उसके स्वयं से भी  अधिक जानकारी है। तब उसे आश्चर्य होता है , वह भी शेफाली के विषय में जानना चाहता है। शैफाली ने बिना किसी 'लाग -लपेट' के , कुंभर्क  को अपने पिछले जन्म की कहानी सुना दी। उस कहानी को सुनकर और भी परेशान हो गया। जो अघोरी नहीं चाहता था वह शेफाली ने कर दिया।शेफाली कहती है -यदि हमारे इस जन्म पर कोई कहानी बने ,तो उसका शीर्षक क्या होगा ?

तुम ही बतलाओ ! क्या हो सकता है ?


तब शेफाली बोली -''शैतान और हसीना ''कहकर हंसने लगी। 

तब कुंभर्क ने भी कई नाम सुझाये ,कुछ देर इसी तरह की नोकझोंक के पश्चात , कुंभर्क  शेफाली से बोला अपने बाबा से कोई ऐसा उपाय पूछो ! जिससे हम मिल सकें। 

मुझे लगता है ,इसका तो एक सही उपाय यही है कि' हम अपने कर्म सही करें ', तुमने पिछले जन्म में भी कहा नहीं माना और अपने कर्म नहीं ठीक किए इस कारण ,' इस जन्म में तुम आधे शैतान और आधे इंसान बन गए''।अच्छा एक बात बताओ !

पूछो !

जब तुम शैतानी रूप में होते हो तब तुम्हारे विचार क्या इसी तरह के रहते हैं ,या बदल जाते हैं। 

परेशान होते हुए ,कुंभर्क बोला -यही तो मुश्किल है ,उस वक्त मुझे इंसान नहीं ,सिर्फ अघोरी ही सही और ठीक नजर आता है। 

मन ही मन शेफाली सोच रही थी -इसमें ये कर भी क्या सकता है ?तब कुंभर्क से बोली - ईश्वर ने जब हमें मिलाया  है तो अवश्य ही कुछ सोचा होगा , अभी हम इस पल को जी लेते हैं ,कहते हुए , उस मायाजाल में घूमने लगी। तभी शेफाली ने कुंभर्क को बुलाया-जल्दी आओ यहां आओ !

कुंभर्क  आश्चर्य से उसे देख रहा था ,इसने  यहां ऐसी क्या चीज देख ली ?जो चिल्ला रही है, कुंभर्क  उसके करीब गया। उसने देखा, शेफाली जिस स्थान पर खड़ी है ,वहां एक बहुत बड़ा कुएँ जैसा गड्ढा बना हुआ है और उसमें से सीढ़ियां होती हुई ,नीचे की तरफ जा रही हैं। उस स्थान को देखकर ,स्वयं कुंभर्क  को भी बहुत आश्चर्य हुआ , वह  सोच रहा था, मैंने तो यह नकली मायाजाल बनाया था , तब इसमें यह नया ''मायाजाल'' कहां से आया? यह सीढ़ियां कहां से आ गई ? क्या तुम इनके विषय में कुछ जानते हो ?शेफाली  ने प्रश्न किया। 

मैं ,इस  के विषय में कुछ नहीं जानता ,यह कहां से आ गई ? या हम किस जगह पर हैं ? मुझे तो ऐसा लगता है जैसे मायाजाल के अंदर ही एक मायाजाल और किसी ने बना दिया है ,हमें भटकाने के लिए। 

चलो, हम इन सीढ़ियों से नीचे चल कर देखते हैं , कहते हुए , शेफाली उन बर्फ़ की सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी , उसके पीछे कुंभर्क  भी था। शेफाली आगे बढ़ती जा रही थी , लगभग उसने सौ से अधिक सीढ़ियां पार की होंगी किंतु सीढ़ियां अभी भी समाप्त नहीं हुई। 

अब हमें वापस चलना चाहिए कुंभर्क  बोला -पता नहीं ,यह सीढ़ियां कहां तक जा रही हैं ?

अब तक इतनी मेहनत की है ,तो थोड़ा और सही ,देख कर ही जाएंगे आखिर इन सीढ़ियों के नीचे जाने का राज क्या है ? 

अभी वह कुछ और नीचे ही उतरे थे तभी उन्हें , कुछ घर दिखाई दिए , उन्हें देखकर दोनों आश्चर्यचकित रह गए , इतनी बर्फ की मोटी तहों  के नीचे ,कुछ घर या फिर पूरा गांव्...... तभी शेफाली को बाबा की वह कहानी याद आई ,जब उन्होंने बताया था -कि चंडलिका के' श्राप' के कारण पूरा गांव जमीन में समा गया था। वह खुशी से बोली- हो सकता है ,यह वही गांव हो , कहते हुए आगे बढ़ गई। आगे बढ़कर ,उसने देखा उस गांव में  घर थे वहां पर इंसान भी थे ,जो निर्जीव पुतलों  की तरह खड़े थे। शेफाली आश्चर्य से बोली -हो ना हो यह वही गांव है , वो  किसी भी स्थान को छुए बगैर आगे बढ़ी , तभी उसने एक बड़ा सा सिंहासन देखा , जिस पर एक व्यक्ति उन्हीं की तरह का  बैठा हुआ था। उसने सोचा ,ये इनका राजा होगा ,इन्हें किसी  तरह से जिंदा किया जा सकता है। तभी उसे बाबा की बातें स्मरण हो आई ,इनके दिल कहीं सुरक्षित स्थान पर होंगे। कहाँ होने चाहिए ? आस -पास खोज रही थी ,तभी एकाएक वो , कुंभर्क  से बोली -चलो ,हम  वापस चलते हैं। 

कुंभर्क  ने पूछा -तुम क्या ढूंढ रही थीं ? 

कुछ नहीं ,

जो शेफाली को ढूंढना था वह ढूंढ चुकी थी किंतु कुंभर्क  को बताना उचित नहीं समझा। वहां पड़ी चीजों से उसने एक निशान बना दिया ताकि उस स्थान को है भूल ना सके और कुंभर्क  के साथ वहां से वापस आ गई।


कुंभर्क  को ,उसकी हरकतों से लग रहा था जैसे वह उससे कुछ छुपा रही है किंतु उसने भी जानने का प्रयास नहीं किया। वह सोचता है ,यदि मैं यह सूचना अघोरी को दे देता हूं , वह खुश हो जाएगा किंतु शेफाली रुष्ट हो जाएगी। अब समय आ गया है ,मुझे इसे अपने साथ ले जाना होगा। 

अभी वह यह सब सोच ही रहा था, तभी शेफाली बोली-अब समय आ गया है मुझे तुम्हारे अघोरी से मिलना ही होगा किंतु कब मिलना है ?यह मैं तय करूंगी। शेफाली की इतनी बात पर ही कुंभर्क , प्रसन्न हो गया। 

कुंभर्क  से विदा लेकर ,शेफाली सीधे बाबा के पास गई ,बाबा !बाबा ! पुकारते हुए मंदिर में गई। उसकी आवाज सुनकर चिंतित मुद्रा में बाबा मंदिर के गर्भ गृह से बाहर निकले। उन्हें देखकर शेफाली के चेहरे पर जो खुशी थी, वह एकदम गायब  हो गई और वो बोली -बाबा !आप इतने  चिंतित  क्यों हैं ?

अभी मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूं , प्रकृति क्या चाहती है ? क्या चीज ऐसी है ?जो हमसे छुपी हुई है , भविष्य का कुछ अनदेखा सा पहलू  नजर आता है किंतु स्पष्ट नहीं हो रहा। तुम बताओ ! तुम्हारे चेहरे की प्रसन्नता का क्या कारण था ?

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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