शेफाली को छोड़कर जब, कुंभर्क वापस आया तो उसे अघोरी के कोप का भाजन बनना पड़ा। अघोरी क्रोध से ''आग बबूला हो रहा था।'' जब वह गुफा में घुसा, तब उसने देखा की पूजा की सभी सामग्रियां ,तितर-बितर बिखरी हुई हैं। अघोरी क्रोध में उस गुफा में चक्कर लगा रहा था शायद वह कुंभर्क के इंतजार में ही था क्योंकि उसे देखते ही ,लगभग चीखते हुए ,वह उससे बोला -जब मैंने तुमसे कहा था- कि तुम तुम्हें उस लड़की को यहां लाना है ,तब तुम उसे लेकर क्यों नहीं आए?
कुंभर्क भी, शायद इस प्रश्न के लिए तैयार था , उसने कहा -कि कोई भी लड़की, किसी भी अजनबी के साथ इस तरह नहीं जाएगी, मुझे सबसे पहले उससे थोड़ी दोस्ती तो कर लेने दीजिए , तभी तो उसे बहला-फुसलाकर यहां लेकर आऊंगा , किंतु एक बात समझ में नहीं आई, जब उसे मैंने सम्मोहित कर दिया था , तब अचानक उसका सम्मोहन कैसे टूटा ?
इस प्रश्न को सुनकर अघोरी ,इधर-उधर देखने लगा, क्योंकि यह सम्मोहन उसी ने तोड़ा था, कुंभर्क को उसके विषय में या उसके पिछले जन्म के विषय में कुछ भी जानकारी लेने देना नहीं चाहता था। सम्मोहन में न जाने शेफाली, उससे क्या -क्या कहे जा रही थी ? इसीलिए उसे उसका सम्मोहन तोड़ना पड़ा किंतु कुंभर्क के सामने अनभिज्ञता जाहिर करते हुए बोला -इसमें मैं ,क्या कह सकता हूं ? इस बात की जानकारी तो ,तुम्हें होनी चाहिए तुम वहां पर थे।
मेरे लिए आश्चर्य की बात है, जब मैं वही पर था ,तो कोई भी आसपास नहीं था किंतु न जाने ,उसका सम्मोहन कैसे टूटा ? खैर जो भी हुआ ,मेरे लिए अच्छा ही हुआ , उसकी तरफ मैंने मित्रता का हाथ बढ़ाया और उसने स्वीकार भी कर लिया।
मन ही मन अघोरी सोच रहा था -यही तो मैं नहीं चाहता था। प्रत्यक्ष बोला -तुम्हारा जन्म इसलिए ही हुआ है तुम्हें काली शक्तियों को वापस लाना है ,इस पृथ्वी पर बसाना है ,,किंतु तुमने मेरा कहा क्यों नहीं माना ? वो फिर से क्रोधित हो उठा। सम्मोहन टूटे या ना टूटे तुम्हें उसे यहां लाना था ,उससे अपनी सिद्धियां पूर्ण करनी थीं। कुंभर्क जानता था ,कि यह अघोरी शेफाली के माध्यम से , उसकी दैवीय शक्तियों के माध्यम से, नरक के द्वार को खुलवाना चाह रहा था। उसका कार्य अभी पूर्ण नहीं हुआ था इसलिए वह परेशान था , अघोरी शीघ्र अति शीघ्र अपना कार्य कर लेना चाहता था।
तब कुंभर्क ने उसे आश्वस्त किया, कुछ दिनों की ही बात है, मैं उस लड़की को सम्मोहन से नहीं वरन बहला-फुसलाकर ,इस तरह से लाऊंगा कि वह स्वयं हमारा यह कार्य करने के लिए तैयार हो जाएगी।
तुम नहीं जानते हो ,वह ब्रह्मानंद क्या-क्या चालें खेल रहा है ? मैंने भी कोई'' कच्ची गोलियां नहीं खेली है'', उसकी चाल तो कामयाब नहीं होने दूंगा ,अघोरी ने मन ही मन सोचा। इस लड़की के माध्यम से वो , मुझे हराना चाहता है किंतु मैं इसी लड़की के माध्यम से ,अब अपनी काली शक्तियों को आजाद करूंगा। अब कुंभर्क पर क्रोधित होने से कोई लाभ भी नहीं था , इसीलिए उसने कुंभर्क को शांत स्वर में समझाया - हमारा यह कार्य शीघ्र अति शीघ्र होना चाहिए, उस लड़की को जैसे भी चाहे ,बहला-फुसलाकर इधर लेकर आओ ! इतने वर्षों से मैंने इंतजार किया अब और इंतजार नहीं कर सकता।
तब कुंभर्क ने उसे, फिर समझाया, कि वह उन्हीं के कार्य में लगा हुआ है, अब कुंभर्क अपने वो वस्त्र उतारता है , जो अघोरी ने उसे उस वक्त के लिए दिए थे , जिस वक्त वह शेफाली के साथ होगा, दैवीय शक्तियों का उस पर प्रभाव कम होगा , किंतु उसके हृदय के पास अभी भी थोड़ी जलन उसे हो रही थी ,क्योंकि शेफाली उसके गले जो लगी थी। उसने अघोरी से प्रश्न किया - उस लड़की में ऐसी क्या शक्ति है ? जो इतनी सुरक्षा के बाद भी , मेरा अनिष्ट कर रही है। मन ही मन सोच रहा था यदि मैं उसे प्यार भी करता हूं ,तब भी ,हम कभी शायद मिल नहीं पाएंगे।
रात्रि के समय, अघोरी अपनी हवन क्रिया करता है ,साथ में कुंभर्क भी था किंतु आज उसका मन उस हवन क्रिया में नहीं था। उसे रह रह कर शेफाली का स्मरण हो रहा था , उसका साथ उसे कितना सुकून दे रहा था ? कुंभर्क का मन विचलित था , उसके ध्यान को भंग करने के लिए, अघोरी ने एक दूसरी क्रिया की, तभी उसने अपने झोले से एक खोपड़ी निकाली , उसको जमीन पर टिकाया , उसको लाल सिंदूर का तिलक भी लगाया, उसके आगे अगरबत्ती जलाई और मंत्र पढ़ने लगा। जिससे कुंभर्क के मन में ईर्ष्या ,क्रोध और प्रतिशोध की भावना बलवती होने लगे । तब अघोरी बोला - कोई भी स्त्री या पुरुष मिले उसे लेकर आओ!हमें उसकी बलि इस खोपड़ी को देनी है। इससे हमें और भी शक्तियां प्राप्त होंगी, अघोरी की बात सुनकर, कुंभर्क छलांग लगाते हुए ,बाहर निकल गया।
बाबा ब्रह्मानंद सोच रहे थे -कहीं ना कहीं , कुछ ना कुछ, बात मेरे से छुटी हुई है , कुछ समझ नहीं आ रहा मैं कहां गलत हूं ? मेरी विद्या कह रही है -कुछ ना कुछ अनिष्ट होने वाला है।
चारों तरफ, बर्फ से ढकी वादियां, जिस ठंड में लोग निकलना नहीं चाहते,अपने गर्म बिस्तरों में गर्माहट करने का प्रयास करते हैं। उस ठंड में 'कुंभर्क' किसी मनुष्य की तलाश में निकल चुका था। उसे ज्यादा दूर जाना नहीं पड़ा, एक गरीब महिला जो ठंड से कांप रही थी उसे लेकर कुंभर्क अपनी गुफा में आ गया। कुंभर्क का शैतानी रूप देखकर और ठंड के कारण ,वह महिला पहले ही बेहोश हो चुकी थी। तब हवन की अग्नि से उस महिला के अंदर , थोड़ी गर्माहट आई। । खोपड़ी के कहने पर ,अघोरी ने उस महिला को मदिरा पिलाई। बहुत सारी मदिरा पीने पर ,वह उन्मत्त हो गई। तब अघोरी ने उसे खोपड़ी के सामने'' हवन कुंड '' के पास बैठाया। उसे पता नहीं था ,तेरे साथ क्या होने वाला है ,या क्या हो रहा है ? अघोरी ने उसको लाल तिलक लगाया, उसके गले में फूलों की माला डाली , सामने बैठा कर, मंत्र उच्चारण करने लगा। यहां पर बलि दी जाने की तैयारी चल रही थी।
उधर ब्रह्मानंद जी , अपनी ''आत्मिक शक्ति ''को जागृत कर रहे थे। तभी उन्हें कुछ अस्पष्ट से अनुभव हुए , और झटके से उनकी आंखें खुल गई, चिंतित स्वर में मन ही मन बुदबुदाये यह क्या था ? क्या मुझे कोई इशारा दिया जा रहा था। सोचते हुए ,मंदिर के तहखाने में चले गए। कुछ ढूंढने का प्रयास करने लगे।

