Rasiya [ part145]

हालांकि शिल्पा ने, चतुर को पैसे देने में, अपनी विवशता जाहिर की थी, कि वह उसे समय पर पैसे नहीं दे पाएगी किंतु फिर भी उसने, सारी रात सोचा और निर्णय लिया ,वो चतुर को पैसे देगी। अपनी बात को रखने के लिए पैसों का इंतजाम किया और चतुर के सामने पैसे लाकर रख दिए। उन पैसों को देखकर चतुर प्रसन्न हो गया और बोला -मैं जानता था ,''आप अवश्य ही कोई न कोई प्रबंध कर ही लेंगीं।''

 वह तो बाद की बात है ,पहले अब आप, सभी अध्यापिकाओं को, उनका वेतन देने की तैयारी कीजिए ! बेचारी ! हर कोई किसी न किसी परेशानी में यहां नौकरी करने आती हैं । शिल्पा ने अन्य अध्यापिकाओं के प्रति अपनी सहानुभूति जतलाते हुए कहा। 


आप सही कह रही हैं -मैं अभी तैयारी करता हूं ,कुछ पैसे मेरे पास भी पड़े हुए हैं , आज सब का वेतन दे ही देंगे। 

बात जबान की है, मैंने उन अध्यापिकाओं को जबान दी थी,'' कि आज उनका वेतन मिल जाएगा'' इसीलिए मुझे परेशानी हो रही थी और इसीलिए मैंने पैसों का इंतजाम भी किया। 

आपके पतिदेव पूछेंगे, तो आप क्या करेंगीं  ?चतुर ने ,शिल्पा से जानना चाहा। 

जबकि जब देखी जाएगी, अभी तो आप उन अध्यापिकाओं के वेतन का प्रबंध कीजिए, कह कर शिल्पा बड़े गर्व के साथ कक्ष से बाहर आ गयी। उसके चेहरे पर दर्प था। उसने ये सब लापरवाही दिखलाते हुए चतुर के सामने कह तो दिया किन्तु अंदर ही अंदर घबरा भी रही थी ,यदि प्रवीण ने उससे पैसे  मांगे ,तब वो क्या करेगी ? किन्तु बाहर से जतला रही थी ,जैसे उसने ऐसे समय में चतुर की सहायता करते हुए, कितना बड़ा कार्य कर दिया है। शायद वो चतुर की नजरों में और चढ़ना चाहती थी। 

तभी बीच राह में उसे दो अध्यापिकाएं आती दिखलाई दीं,उन्हें देखकर शिल्पा बोली -जैसे कि आप सब जानती हैं ,हमने आज ही आपको वेतन देने का वायदा किया था ,आज सभी को उनका वेतन मिल जायेगा। 

मिलना भी चाहिए ,इसके लिए ही तो हम लोग ,अपना घर छोड़कर ,घर के सभी काम छोड़कर समय निकालकर यहाँ आते हैं ,ताकि हमें दो पैसों की आमदनी हो, और हम अपने पति के साथ मिलकर उस घर को अच्छे से चलाने में, उनका सहयोग कर सकें ,कपिला ने जबाब दिया। 

शिल्पा तो जतलाना चाहती थी ,वो उन्हें समय पर वेतन देकर, उन पर एहसान कर रही है किन्तु कपिला ऐसा नहीं समझती थी ,कपिला का ऐसा जबाब सुनकर, शिल्पा को, अच्छा नहीं लगा, वो चुपचाप वहां से आगे बढ़ गयी। कपिला के शब्द ,उसे तीर की तरह जाकर लगे।

कपिला को शिल्पा कतई अच्छी नहीं लगती थी ,अपने साथ वाली से बोली -पता नहीं ,ये बात हमें बताकर ये क्या साबित करना चाहती थी ? अरे ! जब हम लोग ,यहाँ काम कर रहे हैं ,तब वेतन तो मिलना ही है। ये काम, सिरदर्दी इस विद्यालय के संस्थापक चतुर सर की है। पता नहीं ,ये अपने को क्या समझती है ?

चतुर उस कक्ष की खिड़की से शिल्पा को जाते हुए देखकर मुस्कुरा रहा था। शिल्पा सोच रही थी ,मेरे इस सहयोग से चतुर पर मेरा अधिक प्रभाव पड़ेगा और जब अध्यापिकाओं को पता चलेगा ,कि इस कार्य में मेरा महत्वपूर्ण योगदान रहा ,तब उनके मन में मेरे लिए सम्मान बढ़ जायेगा किन्तु कपिला का जबाब सुनकर वो सोचने पर मजबूर हो गयी। 

क्या ये सब करके मैंने अच्छा किया ,जब स्कूल आई थी ,तब मन बेहद प्रसन्न था किन्तु अब खिन्न सा हो गया है ।  इस व्यवहार के कारण , क्या मैं अपने पति का सहयोग नहीं कर रही ?उसके अंदर से ही ,आवाज आई -नहीं ! तुम भी तो यहाँ नौकरी करने ही तो आई हो ,या फिर इस इंसान का विद्यालय  चलाने का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व लेने आई हो। चतुर की नजरों में चढ़ने के लिए ,तुमने वो पैसे भी ,इसे दे दिए ,जिन पर प्रवीण का अधिकार था। 

प्रवीण का अधिकार तो तुम पर भी बनता है ,तुमने क्या किया ? अपने आपको ही, उसके हवाले कर दिया ,तुमने एक बार भी नहीं सोचा -'तुम ये क्या करने जा रही हो ? तुम इसकी चिकनी -चुपड़ी बातों से ठगी गयी हो। नहीं ,ऐसा नहीं है ,शिल्पा बोल उठी -मैडम ! केेसा नहीं है ?एक बच्चे ने कक्षा में से उठकर पूछा। 

कुछ नहीं ,शिल्पा जैसे सोते से जागी ,तभी पीछे से एक बच्चा दबी आवाज में बोला -लगता है ,मैडम कोई सपना देख रहीं थीं ,उसकी बात सुनकर ,कुछ बच्चे हंस दिए। 

चुप रहिये ! शिल्पा ने डांटा। 

अभी दो दिन ही बीते थे, कि शिल्पा के पति ने, शिल्पा से कहा -मुझे तीस हज़ार रुपयों की जरूरत है , तुम्हारे पास कितने पैसे हैं ? अपने पति के इस तरह पूछे जाने पर शिल्पा का चेहरा उतर गया और बोली -क्या आपको, अभी पैसों की जरूरत है ?

क्या मतलब ? पैसों की जरूरत है ,तभी तो पूछ रहा हूं ,मुझे किसी को देने हैं।  तुमसे, मैंने पहले ही कहा था -कि पैसों की आवश्यकता पड़ सकती है ,क्या तुमने कुछ खरीदारी कर ली या कहीं खर्च कर दिए। 

दरअसल ऐसा है, हिचकिचाते हुए, शिल्पा बोली - मेरी एक सहेली को पैसों की बहुत जरूरत आन पड़ी थी, इसीलिए मैंने कुछ दिनों के लिए उसे पैसे उधार दे दिए। 

यह क्या लापरवाही है ? क्या तुम नहीं जानती थीं , कि मुझे भी पैसे लेने पड़ सकते हैं ,प्रवीण झुंझला गया।  ढ़ाई लाख तो रक्खे हैं किन्तु अबकि बार माल ज़्यादा मंगवा लिया था ,तो पैसों की जरूरत पड़ेगी ही पड़ेगी , काम भी थोड़ा मंदा चल रहा है, इसलिए कुछ पैसे मुझे उस माल वाले को देने होंगे। तुम्हें पहले मेरी जरूरत  का ध्यान रखना चाहिए था या अपनी सहेली की जरूरत का , नाराज होते हुए प्रवीण ने बोला - अब मैं क्या करूंगा ? तुम्हारी कितनी लापरवाही है ?मैं निश्चिन्त था, कि पैसे घर में हैं इसीलिए किसी से मांगे भी नहीं। इतना तो तुम घर खर्च से भी बचा लेतीं थीं और अब तो कमा रही हो। तब भी घर में पैसे नही..... जबकि तुमसे मैंने पहले ही कहा था। प्रवीण बड़बड़ाये जा रहा था। 

तब शिल्पा बोली - आज तक तो कभी पैसों की आवश्यकता नहीं पड़ी किन्तु अब...अचानक ! जरा ठहरो ! मैं अपनी सहेली से बात करके बताती हूं ,कि वह मेरे पैसे कब दे रही है ?

कहते हुए  वो ,चतुर को फोन लगाती है -किन्तु चतुर  ने फोन नहीं उठाया ,वो थोड़ा सतर्क भी थी ,कहीं प्रवीण को पता चल गया तो घर में भूकंप आने से कोई नहीं रोक सकता। किन्तु चतुर फोन उठा ही नहीं रहा था। अब तो शिल्पा को घबराहट होने लगी। तब अंदर आकर प्रवीण से बोली -पता नहीं क्यों ?वो फोन नहीं उठा रही है। 

अब क्यों फोन उठाने लगी ?अब तो उसे पैसे मिल गए। 

प्रवीण के मुख से ये सुनकर शिल्पा सिहर उठी ,कहीं मैं भावुकता में छली तो नहीं गयी। तब बोली -कल उसके घर जाकर ही पूछ लूंगी। 

तुमने अपनी किस सहेली को पैसे दिए ,मुझे बताओ !मैं कल उसके घर जाकर उससे बात कर लेता हूँ। कुछ सोचकर बोला -एक मिनट ! तुम्हारी ऐसी कौन सी सहेली है ? जिसे मैं नहीं जानता हूँ। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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