Haunted [part 29]

सभी मित्रों ने अपनी -अपनी पसंद की शिक्षा ग्रहण की, तब वे, आपस में एक दूसरे को अपने अनुभव  बता रहे थे, कि आज हमने क्या सीखा ? सभी खुश थे। तभी अफ़रोज  की दृष्टि एक तरफ गई और वह उधर ही ध्यान देने लगा। एक ऊंचे से मिट्टी के ढेर पर ,सभी बातचीत कर रहे थे। तभी अफरोज़ बोला -देखो ! ज़रा डेविड सर कहां जा रहे हैं ? बच्चों ने उसके कहने पर उधर देखा, डेविड छुपता -छुपाता ,चुपचाप  जा रहा था। 

 टॉम बोला -अवश्य ही कोई बात है , जो इस तरह छुपते - छुपाते जा रहे हैं। 

बच्चे चुपचाप उसके पीछे हो लिए , वो  इधर उधर देख रहा था , अचानक उसके पंख निकल आए और वह उड़ने लगा। बच्चे यह देखकर हैरत में पड़ गए , इतना बड़ा आदमी भी उड़ सकता है , किंतु यह किधर जा रहे हैं? यह जिज्ञासा अभी भी उनके मन में बनी हुई थी। आगे क्या करना है? अभी बच्चे सोच ही रहे थे। डेविड  पिशाच गायब हो गया , बच्चों ने इधर-उधर देखा किंतु वह कहीं दिखाई नहीं दिया।


 

कुछ बात तो अवश्य है, सूरज बोला। अब तो कहीं दिखाई भी नहीं दे रहे ,चलो ! अब वापस चलते हैं , जैसे ही वह वापस लौटने के लिए घूमे, उनके सामने डेविड  था , बच्चे बुरी तरह डर गए, अंधेरे में भी डेविड की आंखें चमक रही थीं।

 डेविड बोला -क्या कर रहे हो ?

ऐसे ही हम बातचीत करते हुए घूम रहे थे, बच्चे अपना बचाव करते हुए बोले। भोजन का समय हो गया अपने विद्यालय की ओर प्रस्थान करो ,डेविड ने उन्हें वापस भेज दिया।

 बच्चे चुपचाप आगे बढ़ गए , कुछ दूरी पर जाकर निम्मी रहस्यमई अंदाज में बोली -कुछ तो गड़बड़ है , पता लगाना होगा। 

तू कब से जासूस बन गई ? रोहित ने पूछा। 

आज से और अभी से , तुम लोगों को भी मेरा साथ देना होगा, धमकाते हुए से  उसने उन पर अधिकार जतलाया। अभी बच्चे कुछ दूर ही गए थे तभी उन्हें एक बाजार दिखाई दिया।

 रोहित बोला -इस समय कौन सा बाजार लगता है ? 

आओ ! चल कर देखते हैं।

उधर अपने बेटे से दूर होकर ,डिकोस्टा अकेला हो गया था, किन्तु जिन्नि ने उसे एक भूतनी  कामिनी से मिलवा दिया ,बातों ही बातों में दोनों की दोस्ती हो गयी। दोनों अकेले भी थे। डिकोस्टा अपनी नई दोस्त कामिनी के साथ, समय व्यतीत करता है , बाद में उसे पता चलता है ,कामिनी के एक प्यारी सी बेटी भी है , डिकोस्टा ने जिसे अपना बेटा समझा ,वह तो स्कूल में आ गया , अब वह अकेला था , असल में देखा जाए तो कामिनी  बहुत डरावनी लगती थी, किंतु डिकोस्टा के सामने सुंदर बनने का प्रयास करती थी। डिकोस्टा को उसकी यह अदा बड़ी पसंद आई। डिकोस्टा को अकेलेपन का साथी मिल गया। तब उसने कामिनी से पूछा -क्या मैं भी इस तरह की कला कर सकता हूं , उसके लिए तो यह सब एक चमत्कारी या कला जैसा ही था। 

कामिनी बोली -हां हां क्यों नहीं ?बस एक मंत्र बोलना होगा।'' वस्त्र बदलम ,रूप बदलम।''

डिकोस्टा ने , इस मंत्र का अभ्यास आरंभ कर दिया ,कभी वो डरावना बन जाता ,कभी जोकर जैसा लगने लगता उसके इस तरह के रूपों को देखकर कामिनी हंसती रहती। तभी कामिनी की बेटी अपना भयंकर रूप लेकर आई। उसका यह रूप देख कर, डिकोस्टा अचंभित रह गया। यह इस तरह कहां से आ रही है? उसने कामिनी से पूछा। 

ये अपनी दादी को सबक सीखाने गयी थी , जिस पोती को वो मारना चाहती थी नहीं ,मार दिया अपने शब्दों को ठीक करते हुए बोली ,अब वही पोती उसके लिए'' जी का जंजाल ''बन जाएगी ,उसे हम दोनों माँ -बेटी चैन से जीने नहीं देंगे। कहते हुए ,दोनों माँ -बेटी के चेहरे खूंखार हो उठे ,उनके अंदर बदले की भावना धधक रही थी। 

डिकोस्टा बोला -मैं जानता हूं तुम्हारी सास तुम्हारी गुनहगार है, तुम्हें उससे अपना बदला लेने का अधिकार है किंतु तुम इस मासूम बच्ची को क्यों उसमें घसीट रही हो ?

कामिनी क्रोध से बोली-वह इस बच्ची की भी तो गुनहगार है, उसने इसे इस धरती पर आने ही नहीं दिया उससे पहले ही मार दिया।यदि ये पैदा हो गयी होती ,तो आज किसी स्कूल की रौनक होती ,अपना '' मानव जीवन ''संवार रही होती और आज उस बुढ़िया के कारण , इस कुएं की भूतनी बनकर रह गयी। उसने इतना भी नहीं किया ,कि उसे अपने किये पर पछतावा होता और हमारी आत्मा की शांति के लिए 'हवन 'ही करा देती ,किन्तु उसे न ही अपनी गलती का एहसास था और न ही उसने हमारा ''अंतिम संस्कार'' होने दिया। अब उसका  चोर मन ही उसे रुलाएगा ,वो गिड़गिड़ायेगी ,पछताएगी किन्तु अब उसकी कोई क्षमा नहीं।  

तभी उसकी बच्ची बोली -वह हम दोनों की ही गुनाहगार है ,हमें उससे बदला लेना है ,हम उसे चैन से नहीं रहने देंगे। कहते हुए -दोनों ,डरावने अंदाज में हंसने लगीं। 



डिकोस्टा ने समझाना चाहा, किंतु वह आज भी बदले की भावना में ही जी रही हैं , जब तक उनका बदला पूरा नहीं हो जाता उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। कामिनी डिकोस्टा से बोली-हम भूतों के साथ यही तो परेशानी है , अगर हमें किसी से बदला लेना है ,तब हमारे शब्दकोश में उन्हें क्षमा  करने का कोई शब्द नहीं है , जब तक हम बदला नहीं ले लेतीं ,तब तक हमें शांति नहीं मिलेगी। हमारी आत्मा इसी तरह भटकती रहेगी। यह' भूत लोक ' का नियम है , अपनी आत्मा की मुक्ति के लिए बदला तो लेना ही होगा।

 उनका दृढ़ निश्चय देखकर डिकोस्टा ने कुछ नहीं कहा, कुछ समय पश्चात बोला -अगर कुछ भी बाधा या परेशानी आती है तो मैं आप लोगों की सहायता करने के लिए तैयार हूं। डिकोस्टा उसी कुंए के नजदीक पेड़ पर रहने लगता है। ताकि उन दोनों मां बेटियों का साथ ही बना रहे और वह अकेला भी ना रहे। कामिनी  को अपने ससुराल वालों पर गुस्सा तो था ,बदला अपनी जगह ,किन्तु दोस्ती और दोस्ती के साथ -साथ ,अपनेपन और प्रेम के अंकुर ,कामिनी के अंदर फूटने लगे थे। डिकोस्टा को भी कामिनी पसंद थी ,दोनों ही आत्माएं एक -दूसरे को समझने लगीं थीं और अपने कुछ हसीन पल एक दूसरे के साथ व्यतीत करने में ,सुकून महसूस करते। 

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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