मेरे मित्र ,कुछ अजीब , कुछ अलबेले से !
बोलती हूं मैं ,सुनते हैं वो !
सोचती हूँ ,मैं लिखते हैं ,वो !
चाहे हों , कितने ?झमेले से !
बांटती हूँ ,जिनसे सपने -अपने ,
बोल देती हूँ ,उनसे विचार अपने।
बांट लेती हूं ,सब दर्द ओ ग़म अपने।
लिख देती हूं, सभी सपने -अपने।
सुन लेते हैं ,वो मेरी बातों को,
समेट लेते हैं ,शब्दों के मोतियों को ,
बुरा न माने कभी, उन हालातों को ,
बातें मेरी सब सुन लेते हैं,
लिख ,सुन और पढ़ लेते हैं।
दिल में छुपा कर रख लेते हैं।
चाहे ,बात कोई हो........ ,
नहीं ,किसी से कहते हैं।
मेरी ही सुनते हैं,
मेरा कहा ही ,बुनते हैं।
मेरी' कलम' ,'मेरी डायरी,'
ये मित्र मेरे ,दो अलबेले से,
उकेरती हूँ ,चित्र भावों के रंगों से ,
दफ़्न कर लेते हैं ,हर लफ्ज़ सीने में ,
सह लेते हैं ,हर दर्द ,डायरी के पन्ने में।
