Jail [part 103]

 अमृता की जिंदगी में इतना बड़ा हादसा हो गया, वह अपने गम को अपने में समेटे , अकेले ही उससे जूझ रही थी। जब कभी मन उदास हताश होता है ,तब इंसान अपनों का सहारा ढूंढता है, किंतु उसका सहारा कौन है ? मां नहीं पिता नहीं और अब तो पति भी नहीं। उस सारे दर्द को उसे अपने आप में समेट लेना है ,जो रह-रहकर उभर आता है। यही तो जिंदगी है , उसकी मैनेजर 'दृष्टि 'ने देखा , अमृता  बहुत ही परेशान थी, वह उसका सहारा बन जाना चाहती थी इसलिए उससे कुछ नहीं कहा , एक औरत होने के नाते उसके दर्द को समझ सकती थी , थोड़ी परेशान से होते हुए उसने बताया कि उससे मिलने के लिए'' खन्ना साहब'' आए थे।'' खन्ना साहब '' का नाम सुनते ही ,अमृता में तो जैसे बिजली भर गई और वह फुर्ती से तैयार होकर खाने की मेज पर आ गई। दृष्टि अचंभित हो रही थी, बड़े लोगों के दर्द भी कैसे हैं ? इनके पास तो अपने दर्द के लिए भी समय नहीं है , वो  सोच रही थी- शायद, अमृता को अपने दर्द से उबरने में अभी समय लगेगा किंतु हुआ ,उसकी सोच के विपरीत !


अभी थोड़ी देर पहले जिस अमृता को उसने देखा था, वह अमृता ही नहीं, ये अमृता उस अमृता को शायद, उसी बिस्तर पर छोड़ आई। दृष्टि को इस तरह देखकर ,अमृता ने मंगू ताई से उसके लिए भी खाना लगाने के लिए कहा। 

नहीं मैडम ! मैं बाद में खा लूंगी। 

अमृता मुस्कुराते हुए बोली -आज मेरे साथ भी खा लो ! दृष्टि भी, एक कुर्सी पर बैठकर चुपचाप खाना खाने लगी। क्या सोच रही हो? तुम यही सोच रही होंगी  , यह मैडम भी  कैसी हैं ? इनके जीवन में इतना बड़ा हादसा हो गया और इन्होंने किस तरह से अपने को संभाल लिया है ? संभालना पड़ता है, कौन हैं ? हमारा , जो हमें संभालेगा ! कोई तो दिखे, जिस पर हम अपनी जिम्मेदारी सौंप सकें ,कोई नहीं ! यह जीवन है ,इसे तो जीना ही है , और जीने के लिए कमाना भी पड़ता है, अपनी उसी व्यस्तता में ,हम अपना गम भी भुला देते हैं। यह जीवन भी तो एक रंगमंच ही है , मेरा और यश का भी एक क़िरदार था , जो हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गया , हमारा अभिनय शीघ्र ही समाप्त भी हो गया ,बस हमारे किरदार यही तक थे। हमने अपना अपना किरदार निभाया और अपने- अपने स्थान पर वापस आ गए , मैं फिल्मों में काम करती हूं , उसमें भी अभिनय ही  तो करना पड़ता है। वहाँ  हम झूठी जिंदगी को जी कर अभिनय करते हैं , बस अंतर इतना है, असल जिंदगी में हम' झूठा अभिनय 'करते हैं। झूठी मुस्कान, झूठे रिश्ते, हम इतना झूठ जी लेते हैं, कि वही हमें सच लगने लगता है। 

अभी तक मैं, एक झूठ की जिंदगी तो जी रही थी, जिसमें मेरा कोई अपना नहीं था, वो रिश्ता जो मैंने बनाया था, वह भी मेरा अपना नहीं था , पराई चीज को अपना समझ बैठी , गलती हो गई, इंसान हूं, भावुक हो जाती  हूँ। ख़ैर  उसी बात को तो दिल से लगाकर तो नहीं  बैठ सकती , उसे लिए बैठी रही ,तो मुझे कोई खिलाने नहीं आएगा, फिर मुस्कुरा कर बोली- तुम्हारी महीने की पगार का इंतजाम भी तो करना है, इसीलिए आगे भी बढ़ना है। 

सच में ,हम लोग अपनी  परिस्थितियों से जूझते हैं, किंतु हमारे अपने, हमारे साथ तो खड़े होते हैं , इनके साथ तो अपना कोई भी नहीं, फिर भी हमारे लिए सोच रही  हैं, देखा जाए ,तो कितने पैसे वाली हैं ? कितने ठाठ से रहती हैं? आदमी को ईर्ष्या  होने लगे किंतु इनका दुख दर्द बांटने वाला कोई नहीं, इनकी समस्याएं भी इतनी बड़ी है, जिन्हें समझने वाला कोई नहीं। यही सब सोचकर दृष्टि के मन में, अमृता के प्रति सहानुभूति और आदर बढ़ गया। 

अगले दिन, अमृता विकास खन्ना  से मिलने गई , उससे बोली - मेरी मैनेजर ने बताया ,कि आप मुझसे मिलने आए थे , जब मुझे पता चला, तो  मैंने उसे डांटा भी था , कि तूने मुझे बताया क्यों नहीं ?मैंने सोचा ,आज मैं  मिल लेती हूँ। 

खन्ना के तो ,जैसे आज तेवर ही बदले हुए थे ,रात की शायद अभी तक उतरी नहीं थी ,अमृता को देखकर बोला -क्या बात है ?तुम तो दिन ब दिन निखरती जा रही हो। 

उसकी बात सुनकर ,अमृता शर्माकर बोली -क्या ? सर ! आप को ऐसे ही लग रहा है ,मैं पहले जैसी ही हूँ। 

नहीं ,हमारी नजरों से देखो !तो पता चलेगा ,वैसे मैंने सुना है ,तुम्हारा वो पति...... जिसके कारण तुमने फ़िल्मों में काम करने से इंकार कर दिया ,अब तुम्हारी ज़िंदगी से जा चुका है। 

यश का स्मरण  होते ही ,अमृता का मन कड़वाहट से भर गया ,हर किसी के सामने अपना दुखता तो नहीं रो सकती ,आजकल तो  सहानुभूति की आड़ में  भी ,लाभ उठाना चाहते हैं ,इसीलिए किसी के सामने कमजोर नहीं पड़ना चाहती  है ,किसी को भी आजकल, किसी से, कोई सच्ची हमदर्दी नहीं होती ,उस हमदर्दी की आड़ में भी ,स्वार्थ छिपा रहता है ,जो समय आने पर निकल आता है। ये सब छोड़िये, सर ! ये तो ज़िंदगी है ,दुःख -सुख ,अच्छा -बुरा तो लगा ही रहता है। मेरे लिए  कोई फ़िल्म है ,क्या ?इतनी देर से खन्ना उसे ताड़े जा रहा था ,अमृता एक औरत होने के नाते ,इन नजरों को समझती थी ,अमृता ने दुबारा उसे पुकारा -सर..... 

वो चौंका और बोला -हाँ, तो मैं कह रहा था ,अब तो तुम्हें काम करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। 

जी सर. ! मैं तैयार हूँ। 

बहुत अच्छे ! मुझे तुमसे इसी जबाब की उम्मीद थी ,कहानी सुन लेना और अपना जबाब दे देना ,कहकर वो बोला -अब तो तुम नितांत अकेली रह गयी हो ! तुम्हारी रातें कैसे कटेंगी ?

जैसे सबकि कटती हैं ,कहकर उठ खड़ी हुई और बोली -अभी मैं ,चलती हूँ ,कहानी सुनकर आपको फोन करती हूं ,मुझे लगता है ,मैं कुछ जल्दी आ गयी कहकर वो बाहर निकल आई। बाहर आकर उसने एक गहरी साँस ली ,वहाँ बैठे, उसका दम घुट रहा था। मन ही मन कहती है - कोई अकेली ,परेशान देखी  नहीं कि लार टपकने लगती है। 


गाड़ी में बैठकर ,बाहर घूमने निकल पड़ती है ,मैडम !कहाँ जाना है ?

 कहीं नहीं ! बस, तुम गाड़ी चलते रहो ! उसने ड्राइवर से कहा।  वो गाड़ी में बैठी ,खिड़की के शीशों में से बाहर आते -जाते लोगों को देख रही है। सभी को कुछ न कुछ काम है ,सभी के दिन की शुरुआत ,एक अच्छी सोच से होती है ,उन्हें आज के  दिन का ,अपना' टास्क 'जो पूर्ण करना है ,एक उद्देश्य लेकर निकलते  हैं ,यही ज़िंदगी के छोटे -छोटे हिस्से मिलाकर ही, एक सम्पूर्ण सत्तर या अस्सी बरस की ज़िंदगी बन जाती है। वैसे देखा जाये तो...... सभी का उद्देश्य खाना -कमाना ही है ,किन्तु कुछ ऐसे भी हैं ,जो कार्य तो कुछ और करते हैं ,किन्तु उनके सपने कुछ और होते हैं, किन्तु पेट की आग बुझाने के लिए ,कभी -कभी सपनों से समझौता करना पड़ जाता है। क्योकि सपनों से पेट नहीं भरता ,कहने को तो ये शहर भी ''सपनों की दुनिया ''कहलाता है। सच ही तो है ,ये सपनों की ही दुनिया है ,वो सपने जो बेबसी ,धोखे ,चालाकी ,मजबूरी ,भूख के कारण कभी पूर्ण नहीं होते। बस सपने बनकर ही रह जाते हैं ,सोचा था ,काश ! मेरा भी अपना परिवार होता ,जिसके लिए अपना सबकुछ न्योछावर करती ,अपना प्यार उस परिवार को देती। उसके लिए सुबह उठती ,मेरे जीवन का भी ,एक उद्देश्य होता ,जिस तरह ये लोग भी ,एक योजना के तहत ,अपने -अपने कार्यों में संलग्न हो जाते हैं। मेरे जीवन का क्या उद्देश्य है ? मुझे किसके लिए जीना है ? मन में कहीं सूनापन ,आंखौं में ख़ामोशी लिए उन, आते -जाते लोगों को देखे जा रही थी। एकाएक वो सभी ,किसी परछाई की तरह नजर आने लगे। उस दर्द का बहाव बाहर आने लगा था जिसके कारण दुनिया ठीक से नजर नहीं आ रही थी। तभी अमृता बोली -वापस चलो !   



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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