अंधरे में अचानक वो साया, मोहिनी के क़रीब आया और उसे वही चमड़े वाली डायरी दी ,जो 'सभा कक्ष '' से चोरी हुई थी और वो मोहिनी से कह ही रहा था -'कि जो तुम ढूंढ़ रहे हो ,वो इस डायरी में नहीं है।' तभी 'गोल कक्ष 'के दूसरे द्वार से रत्न प्रताप ,विक्रम और भानु प्रवेश करते हैं और रत्न प्रताप उससे कहते हैं -तो तुम जिन्दा हो !
"हाँ, रत्न प्रताप ! तुम्हारा अधूरा अतीत तुम्हारे सामने खड़ा है। साये की आवाज़ 'गोल कक्ष 'की ठंडी दीवारों से टकराकर वापस लौटी। "...तुम्हारा अधूरा अतीत आज तुम्हारे सामने खड़ा है।"
रत्न प्रताप कुछ क्षण तक बिल्कुल स्थिर खड़े रहे ,उनकी आँखें उस चेहरे को पहचानने की कोशिश कर रही थीं, जिसे वर्षों पहले उन्होंने अपनी यादों में दफना दिया था।
भानु और विक्रम अभी भी उनके पीछे खड़े थे। भानु ने,रत्न प्रताप की ओर देखा और उनसे पूछा -"क्या आप इसे जानते हैं?"
रत्न प्रताप ने, कोई उत्तर नहीं दिया ,उनकी नज़र केवल उस व्यक्ति के हाथों में,उस चमड़े की डायरी पर थी ,जो अभी भी उसके हाथों में थी ,फिर उन्होंने धीमे स्वर में किन्तु गुस्से से कहा—"तुम्हें मर जाना चाहिए था।"
साया हल्का-सा मुस्कुराया और बोला -"यह बात तुमने, पच्चीस साल पहले भी कही थी।"
रत्न प्रताप का चेहरा कठोर हो गया और बोले -"तब मुझे लगा था, कि तुम मर चुके हो।"
"और तुम्हें क्या लगता है? साये ने एक कदम आगे बढ़ाया "कि इन पच्चीस वर्षों में मैंने, तुम्हें भूला दिया ?कमरे का तापमान जैसे अचानक और गिर गया।
मोहिनी ,उनके पीछे खड़ी सब कुछ सुन रही थी।वह कुछ समझ नहीं पा रही थी ,लेकिन एक बात स्पष्ट थी—यह व्यक्ति रत्न प्रताप के अतीत का हिस्सा था और वह अतीत...सिर्फ़ कोई पुरानी पारिवारिक कहानी नहीं थी ,उसका संबंध मोहिनी से भी था।
भानु ने आगे बढ़कर पूछा -"तुम हो कौन?"
साये की नज़र पहली बार भानु पर पड़ी,कुछ सेकंड तक वह उसे देखता रहा ,फिर उसके होंठों पर एक अजीब मुस्कान आई और धीरे से बोला -"तुम्हारी आँखें...बिल्कुल उसके जैसी हैं।"
भानु की भौंहें सिकुड़ गईं जिज्ञासावश उसने पूछा -"किसके जैसी?"
साये ने कोई उत्तर नहीं दिया बल्कि उसने रत्न प्रताप की ओर देखा और उससे पूछा -"तुमने इसे कभी कुछ बताया नहीं?"
रत्न प्रताप ने कठोर आवाज़ में कहा—"इसका नाम भी मत लेना।"
भानु का धैर्य टूट गया ,और बोला -"बस.... बहुत हुआ "उसने दोनों के बीच आकर कहा—"अब कोई आधी बात नहीं होगी।"मैं जानना चाहता हूँ ,कि मेरे परिवार के साथ क्या हुआ था ?"
मोहिनी का इन सबसे क्या संबंध है ? इस सबके बीच क्यों है?"और यह आदमी मुझे देखकर ऐसे क्यों बोल रहा है ,जैसे वह मुझे पहले से जानता हो?"
उसके इतना कहते ही ,वहां सन्नाटा छा गया। रत्न प्रताप ने आँखें बंद कर लीं और फिर उन्होंने धीरे से कहा—"क्योंकि"...वह तुम्हें नहीं ,"उन्होंने साये की ओर देखा..तुम्हारे खून को पहचानता है।"
भानु के चेहरे पर अनेक भाव आने जाने लगे।
मोहिनी ने भी, अनायास उसकी ओर देखा।
साया धीरे-धीरे आगे आया ,उसने डायरी गोल पत्थर के चबूतरे पर रख दी और बोला -आज भी तुम वही कर रहे हो, रत्न प्रताप !"सच को छिपा रहे हो ,लेकिन इस बार...उसने भानु की ओर देखा और बोला - सच तुम्हारे हाथ से निकल चुका है।"
विक्रम अचानक बोल पड़े—"वो डायरी हमें दो !"
साये की आँखें उनकी ओर घूमीं ,"तुम अब भी वैसे ही हो, विक्रम ! विक्रम का चेहरा सख्त हो गया और पूछा -"क्या तुम मुझे जानते हो?"
"तुम्हें?"साये ने हल्की हँसी हँसी ,मैंने तुम्हें उस रात रोते हुए देखा था..जिस रात हवेली में आग लगी थी। विक्रम का चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।
रत्न प्रताप ने तुरंत कहा—"बस करो !"
लेकिन मोहिनी ने यह बात पकड़ ली ,हवेली में आग ! कौन-सी आग? ये आग कब लगी और उसमें कौन था ?
अचानक 'गोल कक्ष 'की दीवार पर चमकता नक्शा बदल गया ,लाल बिंदु तेजी से उनकी ओर बढ़ रहे थे।''रक्षक मंडल ''अब कुछ ही दूरी पर था।
उस साये ने, नक्शे पर नज़र डाली और बोला -"हमारे पास ज़्यादा समय नहीं है ,उसने डायरी उठाई और बोला -"अगर यह उनके हाथ लगी.....तो सिर्फ़ मोहिनी ही नहीं ,उसने भानु की ओर देखा और उससे बोला ...तुम भी मरोगे।"
भानु ने बिना डरे कहा—"धमकी दे रहे हो?"
"नहीं "साया का स्वर शांत था ,चेतावनी दे रहा हूँ।"
फिर उसने मोहिनी की ओर देखकर कहा -और तुम्हें आज रात एक फैसला करना होगा।"
मोहिनी ने पूछा - कैसा फैसला?"
तुम भानु पर भरोसा करोगी, फिर वह एक पल रुका ,या उस सच पर ,जिसे तुमने अभी तक देखा भी नहीं है।"
मोहिनी ने अपनी आँखें सिकोड़ते हुए कहा -"मुझे पहेलियाँ पसंद नहीं।
साया मुस्कुराया और बोला - फिर यह हवेली तुम्हारे लिए बहुत कठिन जगह है।उसी क्षण...गोल कक्ष के बाहर से भारी कदमों की आवाज़ आई ,ठक... ठक... ठक...
रत्न प्रताप ने तुरंत तलवार निकाल ली ,विक्रम ने ,भानु को पीछे किया।अजनबी ने मोहिनी को अपने पास खींच लिया और बुदबुदाया -"वे आ गए ,अगले ही पल...दरवाज़े के बाहर से आवाज़ आई—"रत्न प्रताप !"यह रक्षक मंडल के नेता की आवाज़ थी -"दरवाज़ा खोलो !"रत्न प्रताप ने कोई उत्तर नहीं दिया।नेता ने फिर कहा—"तुम जानते हो, कि तीसरी सुरंग में जाना नियमों के विरुद्ध है।"
रत्न प्रताप ने ऊँची आवाज़ में जवाब दिया—और तुम जानते हो कि आज नियमों से बड़ी चीज़ दाँव पर लगी है।"
बाहर से हल्की हँसी सुनाई दी ,तुम अभी भी नहीं समझे...नियम तुम्हारे लिए नहीं बनाए गए थे ,वे उसके लिए बनाए गए थे।"
रत्न प्रताप की आँखें मोहिनी पर टिक गईं। मोहिनी ने सब देख लिया। उसका दिल और तेज़ धड़कने लगा ,उसके मन में प्रश्न उठा "उसके लिए..."यह शब्द किसके लिए था? उसके लिए? भानु के लिए या फिर किसी तीसरे व्यक्ति के लिए ?
साया अचानक मोहिनी के पास आया ,उसने अपनी जेब से एक छोटी-सी धातु की चाबी निकाली और मोहिनी से बोला -"इसे अपने पास रखो !"
मोहिनी ने चाबी लेने से पहले पूछा—मुझे, इसकी ज़रूरत क्यों पड़ेगी ?
"क्योंकि आज रात...उसकी आवाज़ बेहद धीमी हो गई।..तुम्हें अपनी ही हवेली में एक ऐसा दरवाज़ा खोलना पडेगा ...जिसे तुम्हारे लिए कभी बंद किया गया था।"मोहिनी ने, चाबी ले ली। जैसे ही उसकी उँगलियों ने उस चाबी को छुआ ,उसकी गर्दन के पीछे फिर से वही जलन महसूस होने लगी। उस दर्द के कारण उसकी आँखें स्वतः ही बंद हो गयीं।
इस बार...उसके सामने एक क्षण के लिए एक दृश्य उभरा -आग ! धुआँ ! एक रोती हुई ,छोटी बच्ची थी।कोई आदमी उसे अपनी बाँहों में उठाकर भाग रहा था और पीछे से किसी महिला की चीख उसे सुनाई दे रही थी—"उसे ले जाओ ! दृश्य उतनी ही तेजी से गायब हो गया ,भय और आश्चर्य से मोहिनी ने अपनी आँखें खोल दीं। इतने से दृश्य को देखकर उसकी सांसे उखड़ रही थीं ।
अजनबी ने उससे पूछा - क्या देखा?"
मोहिनी ने उसकी ओर देखा और बोल उठी -एक बच्ची...और आग !"
