अमृता अब समझ चुकी थी,' यश' उसको चाहता ही नहीं वरन वो उसको धोखा दे रहा है। न जाने ,चोरी-छिपे कौन सा खेल, खेल रहा है ? उसकी दौलत के दम पर अपने बच्चों को पाल रहा है। अमृता ने अपनी कुछ दौलत उसके नाम कर दी थी, अब वह अपनी संपत्ति उसे वापस चाहती है,सामने से तो वो वापस देगा नहीं , इसीलिए उसने चतुराई से ,काम लिया। सबसे बड़ा धक्का तो उसे तब लगा था ,जब उसने कीर्ति को उसकी साली की बेटी के रूप में देखा। वह यह नहीं जानती थी- कि कीर्ति उसी की रिश्तेदार है। यह बात यश ने भी उससे छुपा कर रखी।अमृता अपने से हुए ,धोखे का कारण जानना चाहती थी ,इसीलिए उसने कीर्ति को किसी फ़िल्म में काम के बहाने से ,अपने घर बुलाया। वह जानना चाहती थी, कि जब यश के सामने कीर्ति आएगी ,तो यश की क्या, प्रतिक्रिया होगी ? किंतु वह भी चालाक था ,वो उस रात आया ही नहीं। अमृता ने कीर्ति को अपने घर में ही रख लिया और उसे घूमने फिरने का, फिल्मों का लालच दिया। कीर्ति तो जानती ही थी- कि यह घर उसके मौसा जी का है किंतु उसने यह अमृता को नहीं बताया।
जिंदगी भी क्या अजीब खेल खेलती है ? जो अमृता को चाहते थे -अमृता ने उन्हें नहीं चाहा , अमृता का दिल भी आया तो किस पर ? जो शायद ,उसे धोखा देने के लिए ही बना था। यश कीर्ति के सामने आने से बचता रहा , किंतु कहते हैं, न...... '' बकरे की अम्मा कब तक खैर मनायेगी ?'' एक दिन तो उसे आना ही पड़ा। कीर्ति को अपने सामने देखकर ,उससे अनजान बनने का प्रयास करता रहा। कीर्ति को भी शायद उसने इशारे से मना कर दिया था। अमृता से बोला -यह कौन है ?
क्या तुम इसे नहीं जानते ?अमृता ने प्रश्न किया। उसने हड़बड़ा कर अमृता की तरफ देखा , जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो , तभी अमृता बोली-अरे, यह वही तो लड़की है जिसने मेरे साथ धारावाहिक में काम किया था।
ओह !अच्छा कहते हुए ,यश ने अपने को संभाला।
लो !पहले जल्दी से इन कागजों पर हस्ताक्षर कर दो ! फिल्मों में काम करने के लिए कुछ औपचारिकताएं हैं, ये उन्हीं के कागज हैं।
यश खुशी में यह भी भूल गया , कि कीर्ति के कागजों पर वो क्यों अपने हस्ताक्षर करेगा ?उसे ध्यान ही नहीं रहा ,अमृता के सामने ,वो कीर्ति को जानता तक नहीं ,वरन खुश होकर बोला -लाओ ! तुम्हारे उन कागजों पर भी हस्ताक्षर कर देता हूं।
नहीं, वह तो अभी तुम्हें पढ़ने होंगे, उन पर बाद में साइन कर देना , किन्तु वह यह नहीं देख पाया कि इन्हीं कागजों के बीच में वह कागज भी हैं ,जो अमृता की संपत्ति को उससे वापस दिलवा सकते हैं।
आज अमृता बहुत खुश थी,चार महीनों के इंतजार के पश्चात ,आज वो अपने उद्देश्य में कामयाब हो ही गयी, क्योंकि साथ ही उनमें तलाक के कागज भी थे। कीर्ति को घर पर छोड़ कर , सबसे पहले वह वकील से मिलती है। हर तरह से संतुष्ट होकर वह घर आती है। तब वो देखती है ,कीर्ति और यश आपस में बातें कर रहे हैं, किन्तु अमृता को देखकर अलग हो जाते हैं ,अमृता , कीर्ति से पूछती है -तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? ये सब कब से चल रहा है ?
कीर्ति कुछ भी नहीं समझ पाती है , कि अमृता के मन में क्या चल रहा है? किसी भी बात से अनजान कीर्ति पूछती है - मैंने क्या किया ? क्या चल रहा है ?
तुम झूठ क्यों बोल रही हो ? वही तो मैं जानना चाहती हूं।
मैंने क्या झूठ बोला ? अचंभित सी कीर्ति उससे प्रश्न करती है।
क्या तुम नहीं जानती, कि यह 'यश 'कौन है ?
अबकी बार अमृता के इस प्रश्न से कीर्ति का चेहरा सफेद पड़ गया और बोली -आप क्या जानती हैं ?
यही कि' यश' मेरा पति है ,और तुम मेरे पीछे ,मेरे पति पर, 'डोरे डाल रही हो'।
ये आप क्या कह रहीं हैं ? मैं ऐसा सोच भी नहीं सकती।
सोच नहीं ,सकतीं ,कर सकती हो ,जो औरत तुम्हें काम दिलवाने के लिए ,रात -दिन धक्के खा रही है ,उसी औरत को तुम धोखा देकर, उसके पीठ पीछे ,उसके पति के साथ ,गुलछर्रे उड़ा रही हो।
कीर्ति खिसियाई सी हो गयी ,और बोली -मैं ऐसा सोच भी नहीं सकती।
क्यों ?नहीं सोच सकतीं ,तुम तो उस स्टूडियों में ,उस जज ,के साथ....... भूल गयीं कि याद दिलवाऊं ,मैंने ही तुम्हें बचाया था ,वरना अब तक न जाने कितनी बार उसका बिस्तर गर्म कर चुकी होतीं ?
अमृता के तेवर देखकर वो रुआंसी हो गयी ,क्या आपने मुझे यहाँ ,ये इल्ज़ाम लगाने के लिए बुलाया है ?मेरी बेइज्जती करनी थी ,तो मुझ पर क्यों एहसान दिखाने का नाटक रच रहीं थीं।
नाटक मैंने नहीं ,तुमने मेरे साथ किया है ,मुझसे झूठ बोला है और अभी भी तुम झूठ बोल रही हो , अमृता के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आई।
नहीं ,मैं कोई झूठ नहीं बोल रही ,वो लगभग चिल्लाते हुए बोली -क्या झूठ बोला ?मैंने !
अमृता उसके करीब आई ,उसकी आँखों में झांकते हुए बोली -यही कि यश तुम्हारा मौसा है , क्यों ,आज तक तुमने लोगों ने मुझसे यह रिश्ता छुपा के रखा ?इतनी बात हो जाने पर भी ,तुमने वो इल्जाम सहन किया किन्तु ये नहीं बताया , इसके पीछे तुम लोगों की क्या चाल हैं ?मुझे बताओ !तुम लोग क्या चाहते हो ?
जब आप यह सब जानती हैं तो मुझसे क्यों पूछ रही हैं ?मौसा जी से ही पूछ लीजिए।
क्या तुम नहीं जानती ?उसने मुझसे क्यों शादी की ? किस बात का बदला लेने के लिए ,वह मेरी जिंदगी में आया था।
कैसा बदला, कौन सा बदला ? मैं कुछ नहीं जानती।
अमृता नहीं जानती थी ,कि यह दीवार के पीछे खड़ा उनकी सारी बातें सुन रहा है ,अब वह बाहर आ गया और बोला- इससे मिलने का तुम ढकोसला क्यों कर रही थी? इसे फिल्मों में काम दिलवाने का भी कोई बहाना तो नहीं था।
ताली बजाते हुए ,अमृता कहती है -क्या तुम लोग अभिनय नहीं कर रहे थे ? यह चार माह से ,यहां रह रही है किंतु दोनों इस तरह अनजान बने हुए हैं जैसे कुछ जानते ही नहीं ,एक-दूसरे को पहचानते ही नहीं। यह सब ड्रामा क्यों कर रहे थे? मैं यह जानना चाहती हूं। तुम मेरी जिंदगी में आए और मुझे धोखा देकर चले गए, किंतु मैंने उसकी परवाह नहीं की, जैसे भी तुमने समझाया मैंने मान लिया। तुम दोबारा मेरी जिंदगी में आए , फिर से धोखा देने के लिए, अरे मैंने ऐसा कौन सा बुरा कर दिया कि जो तुम मेरी जिंदगी में जब भी आते हो ,धोखा देने के लिए ही आते हो। अब तुम्हारी पोल खुल चुकी है,चुटकी बजाकर इशारा करते हुए निकलो ! मेरे घर से बाहर...... कोई और दिन होता तो शायद, अमृता रो देती किंतु आज वह सख्त हो गई थी , उसके मन में जो इतने दिनों से क्रोध पनप रहा था आज वह बाहर निकल कर आ रहा था।
अमृता के इतना कहने पर भी, यश ढीठ की तरह खड़ा रहा और बोला -तुम क्या समझती हो ? मैं तुमसे प्रेम करने लगा हूं , तुम्हारे प्यार के लिए इधर आया हूं , और वह जो हुआ था, वह तो तुम्हारी फितरत जानकर ही, मैं तुम्हारे करीब आया था, क्या मैं नहीं जानता ? तुमने वहां कितने गुल खिलाए हैं ? अपने को'' दूध की धुली'' मत , समझो ! उस शहर के लड़कों में तुम प्रसिद्ध थीं ,तुम क्या किसी को प्यार करोगी ?तुमने किसी एक का होकर रहना सीखा ही नहीं, मैंने भी मौके का लाभ उठाया।
तब तुम यहां दुबारा क्यों आए ?मेरी जिंदगी में ,उसे धक्का देते हुए क्रोधित होकर अमृता बोली।
यश थोड़ा ढीला खड़ा था कुछ दूर जाकर , संभलकर बोला -बद्तमीज ! तेरा इतना साहस ! तेरी इतनी हिम्मत कैसे हुई ?कहते हुए ,उसकी तरफ थप्पड़ दिखाते हुए बढ़ा।
अमृता भी सतर्क थी ,वो तो बहुत पहले ही सतर्क हो चुकी थी ,दूर से ही गुर्राकर बोली -सोचना भी मत ! मैंने पूरी ज़िंदगी संघर्ष किया है ,तुम जैसे न जाने कितनों को धूल चटाई है ?आज जो मैं यहाँ खड़ी हूँ ,अपनी मेहनत के बल पर हूँ ,मुझे कमजोर समझने की भूल भी मत करना ,अमृता का रौद्र रूप देखकर ,यश वहीँ का वहीं ठहर गया। अब तुम मुझे बताओ ! जब तुम मुझसे प्यार नहीं करते थे ,तब दुबारा मेरे तलवे चाटने क्यों आये ?
अपनी भांजी के सामने ,अमृता की ऐसी बोली सुनकर ,यश बोला -तुम अपनी जबान को लगाम दो !

