Aadat si ho gyi hai

  चाय की चुस्कियाँ और तुम्हारा संग ,

 साथ निभाने की ,आदत सी हो गई है। 

 जब तुम इंकार कर देते हो, लगता है ,

 कोई बात है , जो अधूरी रह गई है।  

 अब तुम्हारी ,आदत सी हो गई है। 


लगता है, तुम बिन,चाहत कहीं खो सी गई है। 

एक कप ,अकेले  पीने का दिल नहीं करता ,

अब तुम्हारे बगैर,पीने की भावना ही खो गई है। 

अब तुम्हारी आदत सी हो गई है।

न छूटे कभी , इन दो कपों का साथ ,

बना रहें  ,इसी तरह हम दोनों का भी साथ  ,

इनको एक साथ देखने की आदत सी हो गयी है ,

 जो बात अधूरी सी थी,तुम्हारे साथ पूरी हो गयी है। 

अब तुम्हारी आदत सी हो गयी है।

चाय और तुम..... मेरी भावनाओं से जुड़े हो ,

चाय की इच्छा होते ही ,प्रफुल्लित मन को ,

आपका साथ पाने की,  चाहत हो गयी है।

अब तुम्हारी आदत सी हो गयी है।   



  बहाना चाहिए -



 बिस्किट साथ में हो या ना हो, तुम्हारा साथ होना, चाहिए। 

 चाय पीने का तभी  मजा ? साथ में साथी भी होना चाहिए।

चाय की चुस्कियों संग , थोड़ी चुहलबाजियां भी होनी चाहिए।

कैसे छोड़ दें ,ऐसी शाम को ,जिसमें तुम्हारी मुस्कान चाहिए। 

उसने मुझे देखा ,आँखों ही आँखों में कुछ इशारे होने चाहिए। 

चाय का तो सिर्फ बहाना है , हमसफर का साथ होना चाहिए।

कुछ शिक़वे ,कुछ शिकायतें ,इज़हार ,इसरार भी होना चाहिए।

कुछ कीमती पल उनके संग , चाय का तो बस बहाना चाहिए।    

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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