Jail 2 [part 7]

पुलिस वाली ,सत्तो  को , अमृता से बात करते हुए देखकर, बोली -ऐ ,तुम वहां क्या कर रही हो ?चलो ,अपने काम पर लग जाओ ! सत्तो , उस समय तो वहां से निकल गई किंतु अमृता जी ,को चौकन्ना रहने के लिए कह कर गई।

 अमृता जी को विश्वास नहीं हो रहा था कि यहां ऐसा भी कुछ हो सकता है जब से आए हैं ,तब से उनका इन्हीं चार पांच लड़कियों से परिचय हुआ है, उन्हीं के विषय में जानकारी मिली है उनकी  परिस्थितियों को देखते हुए लग रहा था ,कि लड़कियां बेचारी वक्त की मारी हैं , जिस कारण' जेल 'में आ गई हैं। किंतु जेल का वह दूसरा रूप उन्होंने आज तक नहीं देखा ,न ही कभी जानना चाहा। क्या इस जेल के जेलर ''प्रताप सिंह चौहान '' को इस बात की जानकारी नहीं है उन्होंने अपने ही मन में प्रश्न किया।' जेलर साहब' तो अच्छे इंसान नजर आते हैं , तभी तो उन्होंने अपने दोस्त 'भूदेव 'को मुझसे मिलने भेजा  होगा। व्यक्तिगत रूप से तो मैं, किसी को भी नहीं जानती । पता नहीं ,कौन कैसे  स्वभाव का है ?दूर से तो सभी अच्छे लगते हैं। कहां, वो अपनी फिल्म के बारे में सोच कर, लिखकर प्रसन्न हो रही थी ,उनकी जिंदगी में 'हिमांशु' नाम का दूसरा पड़ाव जो आया था। कहां ,एकदम जेल का यह दहशत भरा वातावरण ! ऐसा लग रहा था जैसे वह फूलों की सेज पर थी और अचानक ही अंगारों पर आ गई हैं या कांटो पर चलने लगी हैं। 


यह बात तो सही है, एक ही बैरक में तीन -तीन ,चार -चार लड़कियां रखी गई हैं ,मैं कभी उनके कमरों में तो नहीं गई, किंतु हो सकता है , वहां उनका रहन-सहन सही ना हो ,खानपान ठीक-ठाक......  हां, खाना तो यहां अच्छा नहीं मिलता है लेकिन यह जेल है ,कोई होटल तो है नहीं, जो मिलता है वह बर्दाश्त करना ही होगा। जब सजा मिली है ,सजा के तौर पर इनाम तो कोई नहीं देगा। इसलिए सब सहन करना है, कार्य भी करना है ,यहीं से तो हमें अपनी गलतियों का एहसास होगा , कि हम जीवन में कितनी गलतियां कर देते हैं ? लेकिन आगे बढ़ जाते हैं ,सोचकर या कभी पीछे मुड़कर देखा ही नहीं ,हम जीवन में कितनी गलतियां कर चुके हैं ?क्योंकि समय ही नहीं मिलता और एक यह जेल है जो समय देती है और कर्मों का हिसाब- किताब भी करती है ,कर्मों का हिसाब -किताब यहीं  जीवन में हो जाता है ,कोई जेल में रहकर काटता है ,कोई बाहर रहकर काटता है ,दंड सभी को भुगतना होता है। 

अब तो लिखने में भी ,मन नहीं लग रहा ,न जाने , कौन सा नया आदेश हमें मिल जाए ? यह सत्तो  इतनी सीधी कैसे बनी हुई है ? आज तक इतने मुझसे कभी सीधे मुंह बात भी नहीं की ,फिर भी यह क्या कहना चाहती है ? कौन हो सकता है ,या हो सकती है, जो इन लड़कियों को बाहर भेज रही है उनकी भलाई के लिए या फिर उनसे कुछ गलत कार्य करा रही है ,या करा रहा है ? अनेक प्रश्न मन में किसी कीड़े की तरह कुलबुलाने लगे।

 दोपहर के खाने का समय हो गया ,अमृता जी खाना खाने के लिए बाहर आती हैं ,देखती हैं  कुछ ज्यादा ही भीड़ है। जेल  में रहकर भी न जाने महिलाएं ,कैसी हो जाती हैं ? कुछ तो देखने में ही इतनी क्रूर लगने लगी हैं जैसे वह पैदाइशी गुनाहगार हैं। यह बात तो सही है, इस जेल का कठोर जीवन ,उनके मन की कोमलता को छीन लेता है। तन भी  कहाँ  कोमल रह पाता है। अब तो जैसे जीवन ही काटना रह गया है , पता नहीं कौन कितने वर्षों से इस' जेल 'में कैद है ? अमृता जी ,एक कोने में बैठी दो सूखी रोटी लेकर और पतली सी दाल लेकर खाना खा रही थी ,दाल में  डूबा कर खा रही थीं। तभी कुछ महिलाएं ,आपस में लड़ने लगीं  काफी शोर हो रहा था। कुछ लंबी -तगड़ी सी महिलाएं ,जो दादागिरी में थी उन्होंने उस लड़की  की पिटाई करनी आरंभ कर दी। पता नहीं ,क्यों लड़ रही है ? अभी अमृता इतनी बूढी भी नहीं हुई किंतु उसे ,इन चीजों में पड़ना अच्छा नहीं लगता। जो भी है ,पुलिस वाली  खुद सुल्टा लेंगी। मन में सोचकर ,चुपचाप अपना भोजन करती रहीं। 

तभी उनके पास निर्मला आकर बैठ गई, निर्मला को वो जानती थीं , उससे पूछा -यह क्या हो रहा है ?

एक रोटी के लिए लड़ाई हो रही है , सभी को दो दो रोटी दी गई हैं ,किंतु वो जो दुबली सी लड़की खड़ी रो रही है ,वो तीन रोटी खाना चाहती थी। यह जो लंबी तगड़ी, महिलायें  दिख रही है ,ना, यह जेल की ,सबसे  बड़ी गुंडी हैं , नाजिया और सुल्ताना ! हमसे भी बहुत पहले आई हुई हैं , जो जितना पुराना होता है उसकी दादागिरी उतनी ही चलती है , यह तुम क्या कह रही हो ?

 जी मैम जी! इस जेल की सच्चाई यही है , वह पुलिस वाली तो नहीं , नई आई है ना तो......  अभी तेवर दिखा रही है किंतु कुछ दिन बाद इन्हीं की चलेगी , जितनी भी जेल में नई लड़कियां -औरतें आती हैं , सभी पर यह राज करती हैं। इनसे पहले भी थी , पहले उसका राज चलता था ,किंतु कोरोना के चलते ,वह बची  नहीं तो उस का कार्यभार इन्होंने संभाल लिया। इनको कोई भी रोकेगा टोकेगा नहीं ,जो यह कहेंगी , वही होगा। 

इन दोनों ने मिलकर, इस बेचारी बच्ची को एक रोटी के लिए कितना पीटा है ? अब उस पुलिस वाले को बुलाना चाहिए , ताकि वह इनकी दादागिरी निकाल सके। 

ना ,ना ,मैडम जी !यह तो भूल कर भी मत सोचना, यह आपका भी यहां रहना मुश्किल कर देंगी। 

क्यों, अभी कुछ दिन देर पहले वह पुलिस वाली कहकर तो गई थी, कि कानून नाम की भी कोई चीज होती है। हां कहने के लिए ही होती है, निभाने के लिए नहीं , यदि आपको यहां ठीक ठाक रहना है और सही से अपना काम करना है ,तो इन से पंगा ना लेना , निर्मला ने चेतावनी दी। अभी आपको आए हुए दिन ही कितने हुए हैं ? इसलिए धीरे -धीरे यहां जैसे-जैसे रहती रहोगी ,आपको पता चलता रहेगा , कि इस जेल में कैसे-कैसे कांड होते हैं ? कहकर निर्मला वहां से उठकर चली  गई। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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