अब अपने , रहे ही कहाँ ?
रिश्ते भी अब, बचे कहां?
गिले-शिकवे ,करें किससे ?
रिश्ते वे खो गए ,जाने कहां?
जो रिश्ते नजर आते हैं ,
उनमें भी, अपनापन रहा कहां?
धोखा ये , जिंदगी सारी ,
कभी, नजर का धोखा ,
कभी, समझ का धोखा,
तुम कब ,किसके हुए ?
गिरेबान में झांको जरा,
गैर तो फिर भी, गैर हैं।
अपनों से ही धोखा, मिला यहां ,
जीवन यूँ ही , चलता है ,यहाँ
याद रहे ,तुम भी किसी के अपने हो।
किसी का धोखा, किसी का प्यार !
