Jail 2 [part 11]

 अमृता के बालों में फूल लगाकर ,हिमांशु बोला- देखो ! इस जंगली फूल  को तुम्हारे बालों में लगाने से ,ये और भी खिल उठा ,अपनी किस्मत को सराह रहा होगा। जिस अभिनेत्री से मिलने  के लिए ,अच्छे -अच्छे लोग तरसते हैं ,मैं उसकी जुल्फों की शोभा बढ़ा रहा हूँ।कहते हुए ,वहीं पास ही समतल जमीन पर , लेट कर अमृता को देखने लगा। 

 उसके इस तरह देखने से अमृता शर्मा गई और बोली-बस बस रहने भी दो ! कहने से पहले सोचते नहीं हो और अब मक्खन बाजी कर रहे हो।

नहीं ,इसमें मक्खन बाजी कैसी ? जो चीज जैसी है ,वैसी ही तो बता रहा हूं , यहां आईना नहीं है ,नहीं तो दिखला देता ,तुम कितनी सुंदर लग रही हो ? इन वादियों की कोई सोन चिरैया ! लग रही हो। 


वह तो हूं , अमृता इठलाकर बोली , तभी वह गंभीर हो गई और बोली - सच में मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई , मैंने तुम्हें तुम्हारे घर वालों के , उनकी बीमारी के विषय में ,तुम्हें कुछ नहीं बताया।

नहीं ,तुम सही थीं , मैं कुछ ज्यादा ही' रिएक्ट' कर बैठा , तुमने मेरी परेशानियों को समझा, मेरे माता-पिता का ख्याल रखा, इससे बड़ी बात ,मेरे लिए और क्या हो सकती है ? कोई और होता तो ,इस तरह ध्यान नहीं देता। हो सकता है ,मुझे बीच में ही फिल्म छोड़ कर आ जाना पड़ता , हो सकता है , मेरे पास पैसे पूरे ना हो पाते , तब भी वह पिता का कैसे ख्याल रख लेता ? अचानक ही न जाने कैसे तैश में आ गया था ? जब मैंने शांति पूर्वक इन चीजों पर ध्यान दिया तब मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ, तुम गलत नहीं थीं  तुम अपनी जगह सही थीं। 

तब तुम अपनी गलती मानते हो, अपनी गलती का एहसास है, तब तुम्हें सजा मिलेगी, बराबर सजा मिलेगी, अमृता गब्बर सिंह की तरह संवाद बोलते हुए और अपनी जुल्फों से अपनी मूँछ बनाते हुए बोली। 

क्या सजा है ?मालिक ! नहीं-नहीं मालकिन ! हंसते हुए हिमांशु बोला। 

यही कि,अब तुम्हें मुझे यहां पर एक  सप्ताह खूब घूमाना होगा , अकड़ते हुए अमृता बोली।

जी मालकिन साहिबा ! कहते हुए हिमांशु बड़े अदब से उठ खड़ा हुआ , और बोला- आपकी इजाजत हो तो अब घर चलें , हमारे पूजनीय माता पिता हमारी प्रतीक्षा में होंगे। हिमांशु की इस, अदा पर अमृता खिलखिला कर हंसने लगी। 

जब वह दोनों घर पर पहुंचे , दोनों के चेहरों  पर मुस्कुराहट थी , माता-पिता समझ गए , कि इनमें सुलह  हो गई है। दोनों सुबह ही घूमने निकल जाते और शाम तक घर लौटते , अभी उन्हें यहां रहते हुए चार दिन ही हुए थे , उनकी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट हो चुकी थी किंतु ऐसे में उनका बाहर निकलने का अर्थ था लोग उन्हें पहचानने लगे थे , अमृता को तो पहले ही पहचानते थे किंतु एक पहाड़ी लड़के के साथ नहीं पहचान पाए , हिमांशु तो अपने वही कपड़े पहनता था जो पहले से पहनता आया था। किंतु अब उन दोनों को देखकर लोग , ऑटोग्राफ लेने के लिए,उनकी तरफ भागने लगे, तब उन्होंने निश्चय किया कि अब हम यहां नहीं घूमेंगे वरन  हम वापस मुंबई जाएंगे। 

फिल्म हिट होने के कारण, वहां उनका खूब  स्वागत हुआ और दावतें  होने लगीं , कई फिल्मों के ऑफर भी आए और उन्होंने 'साइन 'भी की। जो अमृता ,यश के आने पर फिल्मों से नाता तोड़ चुकी थी और गुमनामी की गलियों में कहीं खोती जा रही थी , वही अमृता अब पूरे जोर-शोर से , एक बार फिर अपना जलवा दिखा चुकी थी। वही रातों को जगना, होटलों में रुकना , और शूट पर जाना , दोनों ही अपनी -अपनी जिंदगी में व्यस्त हो चुके थे। किसी फिल्म में एक साथ काम कर रहे होते तो मिल जाते थे या फिर कोई विदेश में तो कोई भारत में , अब हिमांशु ने भी ,अपना फ्लैट ले लिया था। वह बार-बार जाकर अपने माता-पिता का वहां ख्याल नहीं रख सकता था इसलिए अपने माता-पिता को भी ,उसने अपने पास ही बुला लिया। अमृता का भी उन लोगों से मिलना जुलना रहता। 

एक  दिन हिमांशु की मम्मी ने कहा -मैं सोच रही हूं ,अब हिमांशु को शादी कर लेनी चाहिए , कब तक हमें इंतजार करवाएगा ? अब तीस  बरस का हो गया है। हिमांशु अमृता को मन ही मन चाहता था अब उसके पास पैसा भी था। किंतु उसने कभी दर्शाया नहीं , उसे देख कर कभी-कभी भावुक भी हो जाता , अब तो मन ही मन अमृता भी उसे चाहने लगी थी, दोनों ही आंखों ही आंखों में एक दूसरे को देखते , एक दूसरे का साथ पाने के लिए , कभी साथ में कॉफी पीते, कभी कहीं घूमने निकल जाते किंतु अब एक दूसरे से अपने दिल की बात नहीं कह पा रहे थे। 

अमृता अभी यश के धोखे को , भूल नहीं पाई थी , डरती थी , विवाह के बाद  ,ये भी  ,ऐसा ना निकल जाए , किंतु हिमांशु के सपने देखने लगी थी। हिमांशु के जीवन में भी अनेक अभिनेत्रियाँ  आ रही थीं , किन्तु  एक भरे पूरे परिवार में वह अपने साथ अमृता को ही देखता था। 

एक  दिन अमृता , हिमांशु के घर गई थी तभी उसकी मम्मी ने यह बात छेड़ी थी , उनकी बात सुनते ही वह मुस्कुराई और गंभीर हो गई , अच्छा ,आंटी जी ! मैं चलती हूं।  कहते हुए ,बाहर निकल गई। पता नहीं ,क्यों ?हिमाशुं के विवाह की बात सुनकर उसे अच्छा नहीं लगा।  

हिमांशु के सामने ,उसकी मम्मी ने अपनी बात रखी , वह भी कहने लगा -अभी इतनी जल्दी क्या है ?

 हिमांशु के पापा ने कहा -यह दोनों ही, एक दूसरे को चाहते हैं किंतु पहल कौन करे ? अभी इसी कशमकश में हैं। हिमांशु की मम्मी ने अमृता को फोन किया , कहने लगीं -तुम मुझे अपनी मां की तरह मानती हो ?

जी आंटी जी , अमृता ने जवाब दिया। 

तब अपनी मां का कहना मानोगी , उन्होंने पूछा। 

जी कहिए !क्या कहना चाहती हैं ?आप !

हिमांशु तो मेरी सुनता ही नहीं , किंतु शादी की उम्र तो तुम्हारी भी हो गई है , क्यों ना , तुम ही शादी कर लो ? बेटे की नहीं तो, बेटी की शादी देख लेते हैं , उनकी बात से अमृता सिर्फ मुस्कुरा कर रह गई उसे कुछ समझ नहीं आया, कि वह क्या कहें ? उस समय उन्हें टरकाने के लिए बोली -मेरे लिए आप कोई अच्छा सा लड़का देख लीजिए ,मैं तैयार हूं। किंतु मन ही मन सोच रही थी न जाने इन्हें मेरी शादी की क्या सूझी ?

हैलो ! तुम सुन रही हो न...... उन्हें लगा, अमृता ने फोन कट कर दिया है। 


जी.....  सुन रही हूं।

मैं यह कहना चाहती थी ,कि मैंने लड़का देख लिया है , बस तुम से मिलवाना बाकी है। अब तुमने' हां 'कह दी है तो मैं उससे बात करती हूं।  

क्या?? अमृता अचंभित होते  हुए बोली। अमृता तो सोच रही थी , न जाने आंटी को भी क्या सूझा ? उसने तो बात टालने के लिए ऐसे ही बहाना बना दिया था, किंतु लगता है -''वह तो मुझे लेकर कुछ ज्यादा ही  गंभीर  हो गई है। पता नहीं , वो कौन है ,कैसा है ? अमृता ने पूछना चाहा किंतु उन्होंने तो पहले ही फोन काट कर दिया। अपनी परेशानी अमृता को देकर वह निश्चिंत हो गईं। चिंतित होते हुए अमृता सोच रही थी ना जाने आज इन्हें  क्या सूझा  है ? माना कि मैं इनका सम्मान करती हूं , किंतु अभी अपनी जिंदगी के लिए फैसला लेने का मैंने इन्हें कोई अधिकार नहीं दिया है। मैं पहले से ही इतने धोखे खाए बैठी हूं ,एकाएक  किसी पर विश्वास नहीं कर सकती। ख़ैर ! गहरी सांस लेते हुए सोचती है ,देखते हैं , उन्होंने मेरे लिए क्या देखा और सोचा है ? मेरे मम्मी पापा तो रहे नहीं , कम से कम इन्होंने मुझे ,अपना तो समझा , अब तक अपनी इच्छा   से  ही ,अपनी जिंदगी जी है , उनकी पसंद भी देख लेते हैं , यह सोचकर वह सोफे में धस गई। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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