Haunted [part 27]

रोहित ,तन्मय ,निम्मी ,सूरज ,टॉम और अफ़रोज़ ,किताब की सहायता से ,''भूतों के इतिहास ''की जानकारी लेने चले जाते हैं। वहाँ ,उन्हें भूतों के विषय ,बहुत सारी जानकारी ,उन्हें मिलती है। पुस्तक बच्चों को बताती है, भूतों के लड़ने  पर ,भूतों के राजा , वहां आकर फैसला करते हैं , कि यहां ना ही कोई बड़ा है ना ही कोई छोटा है सब समान हैं। 

तब  निम्मी उससे प्रश्न करती है ,कि भूतों के राजा कौन हैं ?

अरे इतना भी नहीं जानती, कि 'भूतों के राजा 'हमारे 'महाकाल ' हैं ,उन्हें ''भूतनाथ ''भी कहते हैं , वह  हमेशा हमारे साथ रहते हैं , हम सभी भूत उनकी छत्रछाया में सुरक्षित रहते हैं।

तब टॉम पुस्तक से पूछता है, मैंने सुना है भूतों के पास बहुत धन होता है , उनके पास गड़े खजाने भी होते हैं , इस तरह से तो उन्हें ,भूतों को प्रसन्न करके, धन के बारे में जानकारी ली जा सकती है।


 पुस्तक मुस्कुराती है,और बताती है - हां बहुत से अमीर जो मर जाते हैं ,या राजा महाराजा' भूत 'बन जाते हैं ,तब उनका गड़ा खजाना उन्हें पता होता है , किंतु इस' भूत लोक'  में उस खजाने का कोई महत्व नहीं।  तब पुस्तक  बताती है, पूरी जिंदगी इंसान मेहनत करता है और अधिक से अधिक धन इकट्ठा करता है ,जब संभाल नहीं पाता तो उसे जमीन में गाड़ देता है अपने भविष्य के लिए, लेकिन भविष्य किसने देखा है ? और जब वह धन बिना किसी को बताएं ही , मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, तब उस धन की सुरक्षा के लिए स्वयं भूत बनकर उसकी रक्षा करता है ,जब तक कोई सही वारिस ना मिल जाए,'' भूत लोक'' में यह धन नहीं चलता। इसी प्रकार का एक किस्सा मैं तुम्हें सुनाती हूं , एक बार एक जमींदार था, उसके पास बहुत धन था , उसने अपना धन ना ही कहीं बांटा और ना ही किसी को दिया, एक सुरक्षित स्थान पर छुपा दिया। इस बीच उसकी मृत्यु हो गई , अब उस धन के कारण वह भूत बनकर ,उसी धन के आसपास पेड़ पर लटक गया। जब वह भूत लोक में आया तब उसे पता चला कि इस धन  का उसके लिए कोई महत्व नहीं रहा है। तब उसने सोचा -क्यों न अपना धन किसी जरूरतमंद को दे ,दिया जाये , इसी चिंता में वह उस पेड़ पर लटका रहता था, एक बार एक गरीब व्यक्ति, उस  पेड़ के नीचे आ बैठा, वह बड़ा परेशान था। उसे अपने परिवार की खाने की चिंता हो रही थी ,कि जब वह घर जाएगा ,तो क्या लेकर जाएगा ?वो दुःखी होकर रो रहा था , तब उस जमींदार का भूत उसके पास आया और उससे पूछा -क्या तुम्हें कोई परेशानी है ? 

अपनी परेशानी में उस आदमी ने यह भी ध्यान नहीं दिया कि यह कोई इंसान नहीं वरन भूत है। वह आदमी बोला -हां भाई ! मैं बड़ा ही परेशान हूं ,काम चल नहीं रहा है ,ना ही कहीं से काम मिल रहा है खाने पीने की भी बहुत परेशानी है, घर में खर्चे बहुत हैं आमदनी कुछ भी नहीं।

 तब वह जमींदार भूत उससे पूछता है- क्या, मैं तुम्हारी कोई मदद कर सकता हूं ?

भाई , तुम मेरी क्या मदद करोगे ?उस परेशान इंसान ने अविश्वास से कहा। 

 मैं तुम्हारी धन से मदद कर सकता हूं , यदि मैं तुम्हें धन  देता हूं ,तो तुम उसका क्या करोगे ?

क्या ?भाई !क्यों मजाक करते हो ?मुझ  गरीब के साथ। 

नहीं, मैं मजाक नहीं कर रहा, मैं सच में ही ,तुम्हारी सहायता करना चाहता हूं। जमींदार भूत ने गंभीरता से कहा।

जब उस व्यक्ति  ने देखा -कि ये सच में ही उसकी सहायता के लिए तत्पर है ,तब उसने उस जमींदार भूत के हाथ जोड़े और बोला -भाई ,बड़ी मेहरबानी होगी ,यदि कुछ धन मिल जाये ,तो घर की जरूरतों को पूरा करके , मैं कोई व्यापार करूंगा और उससे जो धन प्राप्त होगा ,तब मैं तुम्हारा सम्पूर्ण धन वापस लौटा दूँगा।

तब भूत उसे अपने दबे हुए, खजाने के पास ले जाता है, और उससे कहता है -जितने भी धन की तुम्हें आवश्यकता है, तुम यहां से ले सकते हो , इतना सारा धन देखकर पहले तो उस व्यक्ति के'' होश गुम हो जाते हैं'' और सोचता है, आखिर यह कौन है ? और इसके पास इतना धन आया कहां से ?

क्या सोच रहे हो ?तुम्हें जितना धन चाहिए ,ले जा सकते हो, यह सारा धन मेरा ही है ,किन्तु अब यह मेरे किसी काम का नहीं ,तब ''जमींदार भूत ''ने उसे अपनी असलियत बताई।

तब माधव ने ,अपने कांपते हाथों से, उस धन में से अपनी जरूरत का थोड़ा सा धन ले लिया और बोला-मैं शीघ्र तुम्हारा यह धन तुम्हें वापस कर दूंगा। तुम कहां रहते हो ?मुझे अपना पता बता दो !

नहीं ,तुम्हें धन लौटने की कोई आवश्यकता नहीं , यदि तुम पर अधिक धन हो जाता है तुम अपने जैसों की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहना, भूत उससे वादा लेता है , तब भूत उसे अपना परिचय देता है और बताता है - मैं, इसी पेड़ पर रहता हूं, आगे भी कभी कोई आवश्यकता हो तो, तुम आकर मुझसे मिल सकते हो। 

माधव नाम का व्यक्ति, अपनी आवश्यकतानुसार धन लेकर वहां से चला जाता है। सबसे पहले उस धन से वह अपने घर की आवश्यकताएं पूरी करता है, बाकी बचे धन से व्यापार शुरू कर देता है, धीरे-धीरे, माधव अमीर हो गया ,उसने शानदार घर भी बनाया, वह जरूरतमंदों की सहायता भी करता। 

माधव का पड़ोसी, उसकी उन्नति देखकर आश्चर्यचकित रह गया, कुछ ही दिनों में माधव ने, मकान -दुकान व्यापार बढ़ा लिया था। पड़ोसी की पत्नी ने समझाया -क्या तुम देखते नहीं हो ?या तुम्हें दिख नहीं रहा, तुम्हारा पड़ोसी रात- दिन अमीर होता जा रहा है , जैसे उसके हाथ कोई लॉटरी लगी है, तुम जाकर उससे पूछते क्यों नहीं ? उसके हाथ ऐसा कौन सा खजाना लगा है ?जो वह अमीर होता जा रहा है।

 अपनी पत्नी के कहने पर, माधव का पड़ोसी उसके पास गया और उससे उसकी अमीरी का कारण पूछा,

अपने सरल स्वभाव के कारण माधव ने, उसे सारी बात बता दी कि किस तरह वह जमीदार के भूत से मिला था और उसने गड़ा हुआ खजाना देखा था उसमें से कुछ धन वह अपने लिए लाया था, उसी धन से व्यापार करके वह अब अमीर बन गया है। 

माधव के पड़ोसी ने मन ही मन उसकी भर्त्सना की, और उसे बुद्धिहीन समझा ,कितना मूर्ख है , इतना धन खजाना मिलने पर भी ,उसे क्या आवश्यकता थी व्यापार करने की, सारे धन को भी तो वो ला सकता था बाकी धन वही क्यों छोड़ आया ?अपने आप मन ही मन सोच रहा था यदि मुझे वह धन मिल जाए तो मैं सारा धन अपने घर में ही ले आऊँ ,उसके पश्चात संपूर्ण जिंदगी काम करने की आवश्यकता ही ना पड़े। 

माधव के अच्छे कर्मों के कारण और  जमींदार का धन अच्छे कार्यों में लगाने के कारण ,धीरे-धीरे उसकी मुक्ति का समय भी आ रहा था। तभी माधव का पड़ोसी भी उस पेड़ के नीचे आ गया , और उसने भी इसी तरह अपना दुखड़ा सुनाया, किंतु 'जमींदार का भूत' समझ गया कि यह इंसान लालची है, फिर भी उसने अपना परिचय नहीं दिया उसके रोने पर उसके सामने गया और पूछा - मैं, तुम्हारी  किस तरह से मदद कर सकता हूं। 

 माधव के पड़ोसी ने बिना लाग लपेट के कहा -आप मेरी धन से मदद कर सकते हैं।

 जमींदार के भूत ने कहा -ठीक है ,और उसे भी उसी खजाने के पास ले गया।


इतना खजाना देखकर, माधव के पडोसी की तो हालत ही खराब हो गई , और उसने सारा धन एक बड़े से कपड़े में बांध लिया , उसने उस स्थान पर एक सिक्का तक भी नहीं छोड़ा। ना ही उसने , उसका धन लौटाने का उससे वादा किया , शीघ्र अति शीघ्र वह सारा धन लेकर ,अपने घर पहुंचना चाहता था। उसका लालच देखकर, जमींदार भूत को बहुत गुस्सा आया लेकिन अब किया भी क्या जा सकता था ?वह लालची तो सारा खजाना लेकर जा चुका था। लेकिन यह खजाना भूत का था ,उसकी बिना इच्छा के ले जाना संभव नहीं था। जब वह लालची इंसान अपने घर पहुंचा और बड़ी सी गठरी उठाकर ,उसने अपने घर में रख दी। और अपनी पत्नी को बुलाने के लिए अंदर गया। खुशी के कारण ,जैसे ही वह अपनी पत्नी को लेकर उस गठरी के पास आया और अपनी पत्नी से बोला - तुम जरा इस खजाने को खोलो !

इतनी बड़ी गठरी देखकर तो ,उसकी पत्नी भी खुश हो गई और उसने शीघ्र अति शीघ्र उस गठरी को खोलना प्रारंभ किया, जैसे ही उसने गठरी खोली ,उसके अंदर से सांप और बिच्छू निकल कर बाहर आए , यह  देखकर दोनों आदमी डरकर भागे, सर्प  और बिच्छू भी उनके पीछे चल दिए , दोनों पति-पत्नी को उनसे पीछा  छुड़ाना बहुत मुश्किल हो गया उनके सारे घर में सांप और बिच्छू घूम रहे थे।माधव का पड़ोसी हैरान था ,सारा धन कहाँ गया ? तब पुस्तक कहती है - इस तरह उस जमींदार के भूत ने उस लालची पड़ोसी को सबक सिखाया।

इस कहानी को सुनकर ,सभी बच्चे हंसने लगे।

यह हंसी की बात नहीं है, इस कहानी से हमें सबक सीखना चाहिए , पहला सबक तो यही है ,कि जमींदार की तरह, पैसा तो कमाओ! किंतु अच्छे कामों में भी लगा दो !उसे जमा करके नहीं रखना है, वरना उसी की तरह भूत बन जाओगे !

दूसरा यही है, ज्यादा लालच भी अच्छा नहीं होता , वरना माधव  के पड़ोसी की तरह हालत हो जाती है। 



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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