Shrapit kahaniyan [part 65]

बाबा ब्रह्मानंद जी ने , अवतार के सामने और उसकी मकान मालकिन के सामने शेफाली को बहुत सारी बातें बतलाईं , जिनको सुनकर शेफाली को लग रहा था -कि वह कोई काल्पनिक कहानी सुन रही है ,इसका हकीकत से कोई लेना देना नहीं है, किंतु वर्तमान में 'अवतार 'और 'बाबा ब्रह्मानंद जी' तो उसके सामने ही थे ,उन्हें तो नहीं झूठलाया जा सकता ,हो सकता है ,जो वह कह रहे हैं ,सही हो , अभी वह यह बातें सोच ही रही थी, कि बाबा ब्रह्मानंद जी ने उसकी सोच को पकड़ लिया। तब वह आश्चर्य से पूछती है- क्या ?बाबा जी !आप मन की बात भी पढ़ लेते हैं। 


तब उन्होंने कहा- यदि तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है, तो तुम स्वयं जाकर ,    यह सब देख सकती हो , यह कहकर उन्होंने उससे आंखें बंद करने के लिए कहा और बाबा ने उसके मस्तक  के मध्य में अपना अंगूठा लगाया , जिसके कारण वह एक प्रकाश की किरण के सहारे बढ़ती चली गई , जहां वह गई कुछ चीजें ,उसे  देखी हुई सी लग रही थी अनजानी होते हुए भी, जानी पहचानी सी लग रही थीं। तभी उसे छम छम की आवाज सुनाई देती है, वह दीवार से छुपी हुई ,उस छम छम की आवाज का ध्यान करती है, कि किधर से आ रही है ? अपने चारों तरफ घूम कर देखती है ,तब उसे एक लड़की आती दिखलाई पड़ती है , अभी वह उसे देख ही रही थी, तभी दूसरी तरफ से ,एक लड़का उसे नजर आता है , उसे देख कर वह खुश हो जाती है , दोनों आपस में मिलते हैं और बातचीत करते हैं , कुछ दूरी होने के कारण शेफाली इनकी बात नहीं सुन पा रही थी, किंतु उसने उनके नाम अवश्य सुने थे , उस लड़के को देखकर उस लड़की ने कहा था - शेखर! तुम आ गए। 

हां, चंद्रा !मैं आ गया। उनके हाव भाव देखकर लग रहा था ,दोनों एक दूसरे को जानते हैं , और एक दूसरे से प्यार भी करते हैं। उसकी पायल की छम छम ही , उस सुनसान जगह  की , खामोशी को दूर कर रही थी। जिस दीवार के पीछे शेफाली छुपी हुई थी , उसके एक तरफ कुछ लोग आ जा रहे थे तो दूसरी तरफ दो प्रेमी दुनिया से अंजान, एक दूसरे से मिल रहे थे, अपनी बातों में व्यस्त थे। शेफाली को यहां इसीलिए तो भेजा गया है ,ताकि वह अपने पिछले जन्म की जानकारी हासिल कर सके , यह बात वह किससे पूछे ?यही समझ में नहीं आ रहा था। तब वह दीवार से हटकर , धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए ,एक पेड़ के पीछे चली गई ताकि उन लोगों की बात को ध्यान से सुन सके, कि वे दोनों  क्या कह रहे हैं ?

जिस लड़की को उसने चंद्रा नाम से पुकारा था वह उससे कह रही थी -शेखर तुम यह सब छोड़ दो , मेरे माता-पिता को तुम्हारा इस तरह से ,गलत कामों के पीछे भागना अच्छा नहीं लगता वरना वह हमारा रिश्ता तोड़ देंगे।

 मैं ऐसा क्या गलत कर रहा हूं ?वह झुंझलाते हुए बोला -थोड़ा सा दोस्तों के साथ मौज मस्ती हो जाती है, क्या यह कोई गलत बात है ?

नहीं ,यह कोई गलत तो नहीं है, किंतु तुम्हें अब जिम्मेदार होना होगा ,हमारा ब्याह होने वाला है, कुछ कमाई धमाई भी कर लो! ताकि आने वाली जिम्मेदारियों को ठीक से निभा सको। 

मेरी ''चंद्रिका'' तुम मेरे घर आओ तो सही ,मैं तुम्हारे सम्पूर्ण  उत्तरदायित्व उठा लूंगा, उस पर लाड़ लड़ाते हुए शेखर बोला। 

नहीं, अपने परिवार के व्यवहार को देखते हुए तो मुझे लगता है कि वह हमारे विवाह के लिए इंकार कर देंगे क्योंकि ना ही तुम अपनी  जिम्मेदारी समझोगे ,ना ही वे विवाह के लिए तैयार होंगे ,बाद में मुझसे मत कहना कि मैंने तुम्हें समझाया नहीं। 

चंद्रिका की बात सुनकर शेखर को क्रोध आ गया और बोला-'' किस माई के लाल में हिम्मत है ,जो मेरी चंद्रिका को मुझसे जुदा कर दे।'' 

यही तो......  यही तुम्हारा व्यवहार ,तुम्हारा क्रोध ,तुम्हारा गैर जिम्मेदाराना ,होना ही हमें एक दूसरे से दूर कर देगा चंद्रिका ने उसे समझाने का पुनः प्रयास किया। 

यह तुम क्या कह रही हो? मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा ,मैंने कौन सा ,गैर जिम्मेदाराना व्यवहार किया है ?

 तब तुम कुछ कमाते -धमाते क्यों नहीं ? कोई काम धंधा क्यों नहीं करते? यही बात मेरे परिवार वालों को खाए जा रही है। कैसे एक नाकारा लड़के को अपनी बेटी का हाथ दे दें ? तुम  सब जानते हो ,तुम भी मुझसे प्यार करते हो, मैं भी तुमसे प्यार करती हूं ,लेकिन कुछ सामाजिक और पारिवारिक उत्तरदायित्व भी होते हैं जिन्हें निभाना पड़ता है , मैं तुम्हें बैठ कर खिलाऊंगा ,तुम्हें रानी बनाकर रखूंगा और क्या चाहिए ?चाहे उसके लिए मुझे चोरी करना पड़े या  फिर डांका डालना पड़े ,कुछ भी करूंगा। 



तुम्हारे यही विचार तो, देख सुनकर मेरा भी कभी-कभी दिल घबरा जाता है , अपने आचार- विचार ठीक करो, यहीं पर हम दोनों के रास्ते अलग-अलग नजर आते हैं , तुम मेहनत नहीं करना चाहते, बस बैठे-बिठाए अमीर होना चाहते हो ,कहते हुए ,चंद्रिका गुस्से से तमतमा गई। जब शेफाली ने  चंद्रिका का चेहरा देखा तो आश्चर्यचकित रह गई , चंद्रिका का चेहरा हुबहू शेफाली से मिल रहा था, तब उसकी जिज्ञासा बढ़ी कि यह शेखर कौन है ? यह भी देख लिया जाए किंतु शेखर का चेहरा दूसरी तरफ था। चंद्रिका उठकर जा रही थी उसके पीछे पीछे ही शेखर भी जा रहा था। इसका अर्थ है, वर्तमान में जो मेरा दुश्मन बना हुआ है , वह पिछले जन्म का शेखर ही होगा। शेफाली मन ही मन सोच रही थी -यदि मैं शेखर को देख लूं तो मुझे भविष्य के अपने दुश्मन का या अपने प्रेमी का, पहले ही पता चल जाएगा। 

किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ , पायल की छनछन दूर तक जाती हुई ,शेफाली उसे देख रही थी , अचानक जैसे दृश्य बदला , जैसे हम चलचित्र देखते हैं ,और उसमें दृश्य बदल जाते हैं उसी तरीके से, यहां भी दृश्य बदल गया , मन ही मन सोचा -शायद बाबा , मुझे वह चीज दिखाना चाहते हैं ,जो मेरे लिए आवश्यक है। तब दूर कहीं शेफाली ने देखा, एक लड़का है जो कुछ हवन इत्यादि कर रहा है, उसके साथ एक तांत्रिक भी बैठा  है ,शायद वह उसी से तंत्र क्रिया सीख रहा है , शेफाली ने अंदाजा लगाया हो ना हो ,यह शेखर ही है।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post