न पूछ ,दिल की आरजू !
न जाने ,किस कोने में ,
कब से ,छिपी बैठी हैं ?
मत उकसा उसको ,
न छेड़ दबी तरंगों को,
मुश्किलों से दबी हैं ,
ये चाहतें !
कभी खेलती थीं ,
इरादों होसलों से ,
भरती थी उड़ान ,
मारती थी कुलांचे !
किसी शावक की तरह ,
अभी अभी सोई हैं ,
ये दिल की चाहतें !
बिन पंख उड़ने लगती थीं ,
पहुँच जातीं ,तेरे क़रीब ,
दिल की उमंगों सी ,
नेक इरादों सीं ,
मासूम ,ये चाहतें !
