Ankahi khavahishen

बचपन से लेकर ,आज तक न जाने, कितनी रह गयीं ? ''अनकही ख़्वाहिशें '' 

ख़्वाहिशों की इमारत पर चढ़ ,दिखती हैं ,न जाने कितनी ''अनकही ख़्वाहिशें ''


रह -रहकर ,पुनः -पुनः उभर आती हैं ,नई -नई ''ख्वाहिशें !

जीवन छोटा , अनन्त की ओर बढ़ती जाती हैं , ''ख़्वाहिशें !

ख़्वाहिशों का कोई अंत नहीं , दुःख दे जाती हैं ,आज भी ''ख़्वाहिशें !

ख़्वाहिशों की गिनती में ,रह जाती हैं ,कुछ अधूरी अनकही ख्वाहिशें !

पुरज़ोर पूर्ण करनी चाहीं ,दिल -दिमाग से जुड़ी अपनी कुछ ख्वाहिशें !

सीमितता में रहने वाली ,कुछ रह जाती हैं ,आज भी अनकही ख़्वाहिशें ! 

बचपन की ख़्वाहिशें , कुछ बड़े होने पर रह गयीं , 

उम्र जो पीछे छोड़ आई ,कुछ 'अनकही ख़्वाहिशें !


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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