बचपन से लेकर ,आज तक न जाने, कितनी रह गयीं ? ''अनकही ख़्वाहिशें ''
ख़्वाहिशों की इमारत पर चढ़ ,दिखती हैं ,न जाने कितनी ''अनकही ख़्वाहिशें ''
रह -रहकर ,पुनः -पुनः उभर आती हैं ,नई -नई ''ख्वाहिशें !
जीवन छोटा , अनन्त की ओर बढ़ती जाती हैं , ''ख़्वाहिशें !
ख़्वाहिशों का कोई अंत नहीं , दुःख दे जाती हैं ,आज भी ''ख़्वाहिशें !
ख़्वाहिशों की गिनती में ,रह जाती हैं ,कुछ अधूरी अनकही ख्वाहिशें !
पुरज़ोर पूर्ण करनी चाहीं ,दिल -दिमाग से जुड़ी अपनी कुछ ख्वाहिशें !
सीमितता में रहने वाली ,कुछ रह जाती हैं ,आज भी अनकही ख़्वाहिशें !
बचपन की ख़्वाहिशें , कुछ बड़े होने पर रह गयीं ,
उम्र जो पीछे छोड़ आई ,कुछ 'अनकही ख़्वाहिशें !
