विरार अपने घर नहीं पहुंचा ,उसकी तलाश में ,एक लड़की कॉलिज में ,उसका पता पूछती ,घूम रही थी किन्तु किसी के पास ,कोई जबाब नहीं था। वो हताश ,निराश वापस लौट रही थी ,तभी एक लड़के ने उसे पुकारा -सुनिए , वो पतला सा लड़का ,कोई दस -बारह बरस का होगा ,उसके पास ठीक तरह से ,कपड़े भी नहीं थे ,जो इस ठंड के मौसम में अपने तन को ठीक तरह से ढक सके।
हाँ ,कहो !क्या कहना चाहते हो ?
आप किसी लड़के को ढूंढ़ रहीं हैं।
हाँ ,क्या तुम जानते हो ? वो कहाँ है ?
वो लड़का, लम्बा सा ,गोरा -चिट्टा ,उसके घुंघराले बाल थे ,कल उसने काली मोटी जैकेट पहनी थी।
हाँ -हाँ वही ,
वो आपका क्या लगता है ?
मेरा भाई है ,वो ! अब बता भी दो ! या यूँ ही ,पहेलियाँ बुझाते रहोगे।
उसे मैंने उस तरफ जाते देखा ,अपनी अंगुली के इशारे से बताया।
उस तरफ क्या है ? क्या वो किसी के साथ था ?
नहीं ,अकेला था किन्तु मुझे लगता है ,वो किसी का पीछा कर रहा था ,उसने सोचने का अभिनय करते हुए कहा।
किसका पीछा कर रहा था ? उसकी बहन को एक उम्मीद बंधी।
वो तो मैं नहीं देख पाया ,शायद ,इसी कॉलिज का कोई लड़का था।
और क्या देखा ?कुछ तो बताओ !
नहीं ,और कुछ ध्यान नहीं आ रहा ,कहते हुए वो, चला गया ,उसे एक उम्मीद बंधी थी किन्तु तुरंत ही निराश हो गयी। यहाँ कोई किसी से इतना ज्यादा मतलब नहीं रखता ,कैसे पता चलेगा ? मेरा भाई कहाँ गया ? वो रोज कॉलिज के चक्कर लगाती और निराश वापिस लौट जाती। परिवार के नाम पर ,दोनों भाई -बहन ही तो थे ,माता -पिता बचपन में ही चल बसे थे। अब अकेली अपने भाई को ढूंढती फिर रही थी। विरार को गु म हुए लगभग एक माह हो गया। किन्तु विरार नहीं मिला, मिलता भी कैसे ?वो तो शैतान की बलि चढ़ चुका था। जैसे -जैसे कुंभर्क की शक्तियां बढ़ती जा रही थीं ,वैसे ही , कुंभर्क की गुफा का तापमान भी बढ़ता जा रहा था। जिस दिन वो नर्क का द्वार खोल देगा ,उसी दिन सम्पूर्ण शक्तियां ,बाहर आ जाएँगी। तब न जाने ,क्या होगा ?ये कोई नहीं जानता किन्तु अभी तो ,उस कॉलिज के छात्रों के साथ ,पता नहीं ,क्या हो रहा था ?आये दिन ,मौतें हो रहीं थीं।
कुंभर्क रात्रि में ,शैतान बनता किन्तु दिन में ,अपनी तांत्रिक शक्तियों का उपयोग करके ,मौत का ताँडव रच रहा था। जो उसके दोस्त बने हुए थे ,उनको मानसिक रूप से शैतान की पूजा के लिए प्रेरित करता ,धीरे -धीरे कुछ लड़के और लड़की शैतान के पुजारी बन चुके थे किन्तु जो उसके विरोध में थे ,न जाने अचानक ही उनकी मौत हो जाती ये कोई नहीं जान पा रहा था।
दीपक और तरुणा अपने नाटक की रिहर्सल कर रहे थे ,सभी अपनी -अपनी जगह पर बैठे थे और उन्हें देख रहे थे।
मेरी जान !मेरे ख्वाबों की मल्लिका ,मैं तुम्हारी मोहब्बत का पुजारी हूँ ,मुझे अपनी मोहब्बत दान में दे दो।दीपक ने अपना संवाद बोल दिया।
तभी परी उठी और बोली -ये मुझे कुछ ठीक नहीं लगा ,मुझे अपनी मोहब्बत दान में दे दो। ऐसा लग रहा है ,मोहब्बत नहीं ,वरन भीख मांग रहा है।
तब तुम ही ,बतला दो ! क्या बोलूं ?
मुझे तुमसे मोहब्बत है ,मोहब्बत के बदले मोहब्बत की तमन्ना करता हूँ ,ये सही रहेगा ,वो प्यार करता है ,उसे इतना नीचे क्यों पड़ना है ? कि मोहब्बत का दान दे दो !ये रिश्ता तो बराबरी का है ,उसने अपनी बात कह दी ,अब तरुणा की इच्छा है ,उसे प्यार करे या न करे , वो भी तो ,बदले में प्यार ही करेगी या नहीं।
अच्छा, तो लग रहा था ,जब मेरे सामने झुककर गिड़गिड़ा रहा था ,तरुणा ने मस्ती में कहा। वे सभी अपनी बातों में व्यस्त थे किन्तु वहाँ जो भारी -भरकम लाइट रौशनी के लिए लटक रही थी ,वैसे तो वो जंजीर से बंधी थी किन्तु न जाने कैसे ,उसका पेंच खुलता जा रहा था ? इस सबसे अनजान ,परी ,दीपक और तरुणा अपनी रिहर्सल में व्यस्त थे ,वो नहीं जानते थे ,उसी कमरे के एक अँधेरे कोने में कोई है ,जो दीपक की जान लेना चाहता है।
वो तीनों ,अपने -अपने कार्यों में व्यस्त है ,किन्तु दूर कोई काली परछाई ,अपने जादू से उस लाइट के पेंच ढीले कर रही है ,जैसे ही दीपक उस लाइट के ठीक नीचे आता है ,वैसे ही एक हाथ ,हवा में हिला और वो लाईट , दीपक के सिर पर जा गिरी। इससे पहले कि वो लोग ,कुछ समझ पाते ,उसके वजन से दीपक की गर्दन टूटकर ,एक तरफ को लुढ़क चुकी थी। उसकी ऐसी हालत देखकर ,दोनों लड़कियां चीख़कर बाहर की तरफ को भागीं। देखते ही देखते ,सम्पूर्ण कॉलिज में अफरा -तफरी मच गयी ,दीपक की मौत, एक हादसा ही लगी। सभी को बड़ा ही दुःख हुआ ,कॉलिज का एक होनहार विद्यार्थी ,अब इस दुनिया में नहीं रहा।
दीपक की मौत को हुए ,अभी एक माह भी नहीं हुआ था ,तभी कृतिका के साथ एक हादसा हो गया ,उसने तो आईने में किसी शैतान की परछाई भी देखी थी। वो ये देखकर बाहर की तरफ भागी और चिल्लाते हुए कहने लगी -इस कॉलिज में ,पिशाच आ गए हैं ,मैंने उसे अभी खिड़की के शीशे में से देखा। उसकी आवाज सुनकर ,उसके आस -पास भीड़ इकट्ठा हो गयी।
तूने क्या देखा ?कहाँ देखा ?एक लड़की ने उसे संभाला , अचानक कृतिका की आवाज बंद हो गयी ,वो बोलना चाह रही थी किन्तु बोल नहीं पा रही थी ,ज्यादा जोर लगाकर बोलने पर , धीरे -धीरे उसकी , बोलने वाली नस फूलने लगी ,उसने अपना गला पकड़ लिया ,वो दर्द से परेशान हो रही थी ,उसका गला किसी गुब्बारे की तरह फूलता जा रहा था। वो छटपटा रही थी ,किन्तु चिल्ला भी नहीं पा रही थी ,इधर -उधर भागने लगी किन्तु कुछ भी लाभ नहीं हो रहा था। सभी विवशता से खड़े ,उसकी हालत देख रहे थे किन्तु समझ नहीं पा रहे थे , इसे अचानक क्या हो गया ?सबके देखते ही देखते अचानक उसके गले की नस फ़ट गयी ,जो वो फूला हुआ हिस्सा था किसी गुब्बारे की तरह फ़ट गया ,उसकी गर्दन एक तरफ को लटक गयी ,उसके गर्दन की सम्पूर्ण नसें इधर -उधर लटक गयीं। खून का फ़व्वारा फूट निकला ,कुछ देर इसी तरह चलते -चलते गिर गयी। उसकी हालत देखकर ,वहां खड़े हर विद्यार्थी की हालत देखने लायक थी किसी को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि ये कॉलिज में क्या हो रहा है ?जिन्होंने ये सब देखा ,वे उस दृश्य को भुला नहीं पा रहे थे। नींद में भी ,वही दृश्य उभरकर आ जाता।
कॉलिज में हुई ,मौतों का ज़िम्मेदार कौन है ? एक लड़का गायब है ,जो आज तक नहीं मिला ,सभी विद्यार्थियों ने प्रधानाध्यापक के दफ्तर के सामने ,खड़े होकर अपनी बात कही ,लड़के -लड़कियों का हुजूम इकट्ठा हो गया।
मैं आप लोगों का डर समझता हूँ ,किन्तु मैं भी ,आप लोगों की तरह ही विवश हूँ ,मैं स्वयं ही नहीं समझ पा रहा हूँ कि ये कॉलिज आज का नहीं ,बरसों पुराना है ,आज तक ऐसा नहीं हुआ ,जो भी हादसे हो रहें हैं सभी के सामने हैं ,इसमें किसी का कोई हाथ नहीं है ,जो भी हादसे हो रहें हैं ,अपने में विचित्र हैं। आप लोग अनुशासन बनाये रखें ,और हमारे साथ मिलकर हमारा सहयोग करें।

