Shrapit kahaniyan [part 54]

गांव में जब मंदिर के घंटे बजे और आरती हुई ,तब कुंभर्क  को बड़ी परेशानी हुई ,अपनी  वेदना वह सहन नहीं कर पाया , जिसके कारण वह बेहोश हो गया ,ऐसा लोगों को लगा ,उसकी गर्दन एक तरफ को लुढ़क गई। सभी ने समझा ,कि वह शैतान नहीं है ,गांव के लड़के भी ,उसे ध्यान से देखने लगे। तभी एक व्यक्ति ने आकर बताया -ठाकुर साहब! के लठैत को होश आ गया है ,सभी का ध्यान उस ओर गया ,सभी ने सोचा- अभी समय है ,पहले उस लठैत से जाकर मिल लेते हैं ,उस लठैत के समीप भीड़ इकट्ठा हो गई और उससे जानने लगे -कि उस रात क्या हुआ था ? 
लठैत ने बताया -हम सभी डरकर भागे ,मैं पेड़ पर चढ़ गया। मैं पेड़ पर बैठा हुआ था तभी एक बड़ी सी परछाई मैंने देखी, साथ ही देखा, जो  हमारे साथ ही अन्य लठैत थे ,उन पर उसने आक्रमण किया वह अपने पंजों से अपनी दाढ़ों से उन्हें चीर फाड़ कर रहा था ,मैं यह सब देखकर घबरा गया -वे बुरी तरह चीख और   चिल्ला रहे थे , उसने अपने तेज और लम्बे नाखूनों से उनकी अंतड़ियाँ बाहर  निकाल दीं , उनकी टांगों को खींच कर ,दो हिस्सों में कर दिया था, यह सब देख कर मेरा ह्रदय धक से रह गया ,दहशत के कारण ,मेरा गला ही सूख गया ,मुँह से आवाज ही नहीं निकल रही थी। एक का उसने ,एक ही मुक्के  में सिर तोड़ दिया ये सब देखकर मेरी हालत खराब हो गयी और मुझसे देखा नहीं गया।  एकदम मुझे  लगा जैसे मैं ,अपने होश खोता जा रहा हूं ,फिर पता नहीं क्या हुआ ?कहकर वह फिर से चुप हो गया। वो शायद अभी भी उसी ड़र में था। 


उसकी इन बातों को सुनते हुए लोगों को यह भी ध्यान नहीं रहा ,कि मंदिर के पास ,शैतान बंधा हुआ है शाम को चुकी थी ,पंडित जी के कहने पर भी ,लोगों ने लापरवाही की जिसका परिणाम यह हुआ ,जैसे ही, वह लोग मंदिर के समीप पहुंचे और कुंभर्क  को देखने गए। उसकी गर्दन ,एक तरफ को लटकी हुई थी ,तभी एकाएक उसने अपनी आंखें खोलीं , उसकी लाल-लाल आंखें ,बहुत ही ,भयंकर लग रहीं थीं। 

तभी पंडित जी ने कहा इसको शैतान बनने से पहले ही जला दो !

लड़कों ने बहुत ही खुशी दिखाई और उन लकड़ियों में आग लगा दी ,जैसे रावण का दहन कर रहें हों ,किंतु शैतान उठ चुका था ,जाग चुका था। अब  रात्रि उसकी थी , वह सीधा खड़ा हो गया, उसने रस्सियों को एक ही झटके में तोड़ डाला ,वे  उसके इतने बड़े शरीर को बांध नहीं सकीं।  इससे पहले कि अग्नि बढ़ती ,उसका शरीर इतना बड़ा आकार ले  चुका था कि वह सब उसके सामने  छोटा लग रहा था। उसको इस तरह आकृति बदलते देख कर ,सभी बच्चे ,बड़े ,बूढ़े सब घबरा गए और इधर उधर भागने लगे। कुंभर्क  की तेज गुर्राहट  से सभी भयभीत हो चुके थे। अग्नि भी ,उसका कुछ नहीं कर पाई ,उसने अग्नि को पार किया और गांव के बीच में आ गया ,कुछ लोगों ने , मंदिर में छुप कर अपनी जान बचाई ,कुछ अपने घरों की ओर  दौड़े संपूर्ण गांव में ,अफरा-तफरी मच गई। 

जो लोग कुंभर्क  के हाथ में आ गए ,वे  नहीं बच पाए उन्हें अपनी जान से हाथ धोने पड़े। ठाकुर साहब ने भी, जब यह सब सुना ,अपने घर के दोमंजिले से देखने का प्रयत्न किया ,सारे गांव में हाहाकार सा मच गया था।  शैतान का हाहाकार......  जिसे लोग और लड़के ,अभी तक साधारण सा इंसान समझ रहे थे। अब शैतान को किस तरह रोका जाए ?इसका कोई भी उपाय नहीं था ,वह गांव में जो कोई भी दिखता उसे ही मार डालता और जंगल की तरफ बढ़ने लगा।

 जमींदार साहब ने जब यह सब सुना ,तो वे परेशान हो , सोचने लगे -अब इस गांव में रहना ,संभव नहीं हो पाएगा, वह चाहते थे -किसी तरह कुंभर्क  को अपने साथ लेकर कहीं दूर चले जाएं। अब क्या किया जाए ?वे  जानते थे ,उनकी मौत भी निश्चित है ,कब तक ? शैतान को ,अपने साथ रखेंगे ,किंतु पुत्र का मोह  उन्हें छोड़ नहीं रहा था। प्रातः काल,  चिड़ियों की चहचहाहट के साथ ही , वे दोनों पति -पत्नी अपने घर से निकले गांव में कोई भी ,अभी तक बाहर नहीं निकला था ,सबके अंदर रात्रि के हादसे का भय सताया हुआ था। दोनों पति-पत्नी चुपचाप जंगल की ओर बढ़े ,हाथ में तुलसी और रुद्राक्ष की माला लिए हुए है ,और अपने बचाव के लिए उन्होंने ईश्वर का लॉकेट भी पहना हुआ था जब तक वह जंगल में पहुंचे ,तब तक काफी दिन निकल चुका था। उन्हें उम्मीद थी- कि अब तक शैतान जा चुका होगा तब उन्होंने जंगल के करीब जाकर अपने पुत्र को पुकारा - कुंभर्क.... कुंभर्क  यहां आओ बेटा ! बाहर आओ , अपनी माँ की आवाज पर , कुंभर्क  किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह अपनी मां का कहना मान कर बाहर आ गया। 

मां ने कहा -चलो !शीघ्र ही यहां से  चले जाते हैं ,अब यहां रहना उचित नहीं है ,अपने साथ ,अपने बेटे कुंभर्क  को लेकर पति-पत्नी चुपचाप उस गांव को छोड़कर निकल जाते हैं। 

गांव में आज मौत का मातम मना था ,कुछ लोग जिंदा रह पाए और कुछ लोग मर गए ,श्मशान घाट बन गया था। इसका सिर्फ इसका कारण वह कुंभर्क ही था ,जो कुछ टूटे -फूटे बच गए ,वो कराह रहे थे ,उनका इलाज भी चल रहा था और जो  सही थे उन्होंने क्रोध में ,जमींदार साहब  के घर पर हमला बोल दिया।  आज ही इन  सबको ,घर से बाहर निकालो ,सबका समवेत स्वर यही था किंतु वहां तो सारा घर खाली और सुनसान पड़ा था न जाने वे  लोग कहां गए ?कोई सोच रहा था- शायद ,कुंभर्क  का ही  शिकार हो गए ,कोई सोच रहा था -शायद वह चुपचाप गांव छोड़कर चले गए। किसी को कुछ नहीं मालूम ,कहां गए ?और कैसे गए ?


कुंभर्क  को साथ लेकर दोनों पति पत्नी गांव से बाहर निकले और एक बस में बैठ गए। एक बस  से दूसरी बस बदली, फिर तीसरी रात्रि से पहले गंतव्य तक पहुंचना था,  किंतु रास्ते में तो अंधेरा होना स्वाभाविक ही है इतने शीघ्र  ही  ऐसे , बर्फीले इलाके पर नहीं पहुंच सके जहां पर सुनसान है ,तब वे एक जंगल में रुके  अपने बच्चे को वही रोक दिया और स्वयं किसी मंदिर में जा ठहरे ,अगले दिन, फिर से सफर शुरू किया और एक ऐसे इलाके में पहुंच गए जहां चारों तरफ बर्फ ही बर्फ था, बर्फ ही बर्फ !

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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