तभी पंडित जी ने कहा इसको शैतान बनने से पहले ही जला दो !
लड़कों ने बहुत ही खुशी दिखाई और उन लकड़ियों में आग लगा दी ,जैसे रावण का दहन कर रहें हों ,किंतु शैतान उठ चुका था ,जाग चुका था। अब रात्रि उसकी थी , वह सीधा खड़ा हो गया, उसने रस्सियों को एक ही झटके में तोड़ डाला ,वे उसके इतने बड़े शरीर को बांध नहीं सकीं। इससे पहले कि अग्नि बढ़ती ,उसका शरीर इतना बड़ा आकार ले चुका था कि वह सब उसके सामने छोटा लग रहा था। उसको इस तरह आकृति बदलते देख कर ,सभी बच्चे ,बड़े ,बूढ़े सब घबरा गए और इधर उधर भागने लगे। कुंभर्क की तेज गुर्राहट से सभी भयभीत हो चुके थे। अग्नि भी ,उसका कुछ नहीं कर पाई ,उसने अग्नि को पार किया और गांव के बीच में आ गया ,कुछ लोगों ने , मंदिर में छुप कर अपनी जान बचाई ,कुछ अपने घरों की ओर दौड़े संपूर्ण गांव में ,अफरा-तफरी मच गई।
जमींदार साहब ने जब यह सब सुना ,तो वे परेशान हो , सोचने लगे -अब इस गांव में रहना ,संभव नहीं हो पाएगा, वह चाहते थे -किसी तरह कुंभर्क को अपने साथ लेकर कहीं दूर चले जाएं। अब क्या किया जाए ?वे जानते थे ,उनकी मौत भी निश्चित है ,कब तक ? शैतान को ,अपने साथ रखेंगे ,किंतु पुत्र का मोह उन्हें छोड़ नहीं रहा था। प्रातः काल, चिड़ियों की चहचहाहट के साथ ही , वे दोनों पति -पत्नी अपने घर से निकले गांव में कोई भी ,अभी तक बाहर नहीं निकला था ,सबके अंदर रात्रि के हादसे का भय सताया हुआ था। दोनों पति-पत्नी चुपचाप जंगल की ओर बढ़े ,हाथ में तुलसी और रुद्राक्ष की माला लिए हुए है ,और अपने बचाव के लिए उन्होंने ईश्वर का लॉकेट भी पहना हुआ था जब तक वह जंगल में पहुंचे ,तब तक काफी दिन निकल चुका था। उन्हें उम्मीद थी- कि अब तक शैतान जा चुका होगा तब उन्होंने जंगल के करीब जाकर अपने पुत्र को पुकारा - कुंभर्क.... कुंभर्क यहां आओ बेटा ! बाहर आओ , अपनी माँ की आवाज पर , कुंभर्क किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह अपनी मां का कहना मान कर बाहर आ गया।
मां ने कहा -चलो !शीघ्र ही यहां से चले जाते हैं ,अब यहां रहना उचित नहीं है ,अपने साथ ,अपने बेटे कुंभर्क को लेकर पति-पत्नी चुपचाप उस गांव को छोड़कर निकल जाते हैं।
गांव में आज मौत का मातम मना था ,कुछ लोग जिंदा रह पाए और कुछ लोग मर गए ,श्मशान घाट बन गया था। इसका सिर्फ इसका कारण वह कुंभर्क ही था ,जो कुछ टूटे -फूटे बच गए ,वो कराह रहे थे ,उनका इलाज भी चल रहा था और जो सही थे उन्होंने क्रोध में ,जमींदार साहब के घर पर हमला बोल दिया। आज ही इन सबको ,घर से बाहर निकालो ,सबका समवेत स्वर यही था किंतु वहां तो सारा घर खाली और सुनसान पड़ा था न जाने वे लोग कहां गए ?कोई सोच रहा था- शायद ,कुंभर्क का ही शिकार हो गए ,कोई सोच रहा था -शायद वह चुपचाप गांव छोड़कर चले गए। किसी को कुछ नहीं मालूम ,कहां गए ?और कैसे गए ?
कुंभर्क को साथ लेकर दोनों पति पत्नी गांव से बाहर निकले और एक बस में बैठ गए। एक बस से दूसरी बस बदली, फिर तीसरी रात्रि से पहले गंतव्य तक पहुंचना था, किंतु रास्ते में तो अंधेरा होना स्वाभाविक ही है इतने शीघ्र ही ऐसे , बर्फीले इलाके पर नहीं पहुंच सके जहां पर सुनसान है ,तब वे एक जंगल में रुके अपने बच्चे को वही रोक दिया और स्वयं किसी मंदिर में जा ठहरे ,अगले दिन, फिर से सफर शुरू किया और एक ऐसे इलाके में पहुंच गए जहां चारों तरफ बर्फ ही बर्फ था, बर्फ ही बर्फ !

