Shrapit kahaniyan [ part 51]

पंडित चेतराम से  ,अपने सवालों का जबाब पाने के लिए ,सभी गाँववाले उन्हें 'चौपाल 'पर बुलाते हैं। तब पंडित जी, को लगता है ,अब सभी गांववालों को सच्चाई बता देना ही ,बेहतर रहेगा और वो सम्पूर्ण कहानी उन्हें सुना देते हैं ,किन्तु ठाकुर तेजप्रताप सिंह ,अपने हाथ आई बाज़ी को जाने नहीं देना चाहता था ,तब बोला -पंडित !तुम हमें , कोई भी बेतुकी कहानी सुनाकर बहला नहीं सकते। तब गांववालों से बोला -ये पंडित ,भी उस जमींदार से मिला हुआ है। मारो !इसे मारो ! तभी इसे किसी के दर्द का एहसास होगा ,उस जमींदार को भी यहाँ बुलाओ ! लोगों की जान से खेलकर, कैसे शान से हवेली में बैठा है ?

हाँ ,ठाकुर साहब सही कह रहें हैं -इन्हे भी तो पता चले किसी की मौत का दर्द क्या होता है ? साथ ही उस जमींदार के लड़के को भी लाना ,देखते हैं ,कितना बड़ा शैतान है ?कलुवा ने कहा। 


दो -चार लोग ,जमींदार को पकड़कर लाने  के लिए बढ़ते हैं ,और कुछ पंडितजी की तरफ....... 

पंडित जी अपने स्थान पर अडिग रहे और लोगों की तरफ देखते हुए ,बोले -आप सब मेरे ही गांव के हैं ,मैं इस गांव का हूँ ,सब मेरे अपने हैं , भला मैं ,आप लोगों से झूठ क्यों बोलूंगा ? मैंने ये जो भी बातें बताई हैं ,बिल्कुल सत्य हैं ,किन्तु इसमें भी एक गड़बड़ हो गयी है। 

जो जहाँ था वहीँ रुक गया ,क्या गड़बड़ हैं ? ये जानने के लिए रुक गया ,तब पंडित जी बोले -जब वो दीवार टूटी थी ,तभी से ' कुंभर्क ''गायब है ,हमें उसे शीघ्र अति शीघ्र, दिन ढलने से पहले ,ढूँढना होगा ,वो उन्हीं घने -जंगलों की तरफ गया है ,जहाँ से हरिया की लाश मिली है ,तुम लोगों का ,असली गुनहगार तो वो है ,उसे ढूंढकर लाना होगा ,वो भी रात्रि से पहले ,जमींदार साहब ,उसे ही तो ढूंढने गए थे किन्तु वो नहीं मिला ,मिला भी तो..... जब दिन छिप गया था। 

पंडित जी की बात का, उन लोगों पर प्रभाव पड़ते  देख ,ठाकुर तेजप्रताप बोला -ये पंडित बकवास कर रहा है ,उसने अपने आदमियों से कहा - ,तुम लोग जाओ !और उस जमींदार को बुलाकर लाओ !उसके बेटे को भी उठा लाना। 

ठाकुर साहब !मैंने जो भी शब्द कहें है ,वो पूर्णतः सत्य है ,मेरा विश्वास कीजिये और उस 'कुंभर्क 'का पता लगवाइये ,वो अभी आजाद घूम रहा है। 

कुछ ही देर में ,जमींदार साहब चौपाल पर उपस्थित हो गए ,वो अपराधबोध में सर झुकाये खड़े थे। 

अब देखो ,सारे गांव का नाश करने का षड्यंत्र रचाकर देखो ! कैसे नादान  बन रहा है ? तुम्हारा वो शैतान बेटा किधर है ,उसे किधर छुपाया है ?बताओ !

ठाकुर के आदमियों ने ,पंडित और जमींदार को घेरा हुआ था ,तब पंडित जी बोले -मैं हमेशा ही ,अपने गांववालों का भला चाहूंगा ,रही मौत की बात ,जब मैं दूसरों की कुंडलियां पढ़ सकता हूँ ,तब अपनी कुंडली भी मैंने पढ़ी होगी। अभी मुझे बहुत काम करने हैं ,अभी मेरा समय नहीं आया है। हाँ ,मैं ये अवश्य देख रहा हूँ ,जमींदार साहब ! की तरह आप लोगों ने भी मेरी बात नहीं मानी ,तो बहुत ज्यादा नुकसान हो जायेगा। 

अरे , चुपकर ,तू पंडित ! अब तक बहुत बहका लिया,अब हम अपने तरीके से कार्य करेंगे ,चलो !भई !अब इन दोनों को यहीं बांधकर ,उस जंगल की ओर चलते हैं। 

पंडित जी ,इन्हें  रोकिये !अब दिन ढलने वाला है ,इस कार्य के लिए ,कल दिन में चले जायेंगे ,जमींदार ने पंडित जी से कहा। 

अब मैं क्या कर सकता हूँ  ? सब कहकर तो देख लिया ,इस ठाकुर के सर पर मौत नाच रही है ,तभी इसकी बुद्धि काम नहीं कर रही है ,आप कहते हैं ,तो एक बार रोककर देख लेता हूँ। सुनो !तुम सभी मेरे ही भाई -बंधु हो ,इसीलिए मैं ये कहना चाहता हूँ। कोई भी इस समय जंगल में न जाये ,क्यों जीते जी ,अपनी मौत को दावत  दे रहे हो ? कल जाना ! वो भी ,अपने साथ ,पवित्र और धार्मिक वस्तुएं लेकर जाना। 

कुछ लोगों ने सोचा भी , पंडित जी जब इतना जोर दे रहे हैं ,शायद उनकी बात में कुछ तो सच्चाई होगी ही ,ठाकुर को भी लग रहा था ,यदि ऐसा ही कुछ हुआ तो कहीं हम अपनी जान से न हाथ धो बैठें। कुछ लोग अपने -अपने घर चले गए , दो -चार पंडितजी और जमींदार साहब की देखरेख में वहीँ रह गए। ठाकुर के आदमियों के साथ कलुवा भी जाना चाहता था किन्तु  उसके माता -पिता ने उसे जाने नहीं दिया ,कहने लगे -हमने अपना अभी एक बेटा खोया है ,अब और बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। चौपाल से ,चले तो कई आदमी थे ,किन्तु धीरे -धीरे सिर्फ पांच लोग रह गए ,अब ठाकुर साहब को ,लगने लगा कहीं ज्यादा जोश में आकर ,उन्होंने कोई गलती तो नहीं कर दी। मन ही मन घबराहट होने लगी , इतनी  रात गए ,यदि पंडित की बात सही हुई तो हम लोग ,अपनी जान नहीं बचा पायेंगे। बात तो जबान से निकल चुकी ,अपने लोगों के सामने अपनी घबराहट को दिखने नहीं देना चाहते था। तब बोले - यदि किसी  को डर है ,तो अभी भी जा सकता है। 

नहीं ठाकुर साहब ! हम आपके साथ हैं ,इस तरह हम आपको अकेला छोड़कर कहीं नहीं जायेंगे। 

वैसे इस अँधेरे में हम उसे ढूंढेंगे कैसे ?जंगल में तो छोटे -बड़े कीड़े ,जानवर होते हैं ,रौशनी का कोई साधन नहीं ,मैं इस तरह अपने आदमियों को मौत के मुँह में नहीं धकेल सकता ,तुम्हारे भी बाल -बच्चे हैं ,उन लोगों को लगा ठाकुर साहब ,हमारा कितना ख्याल रखते हैं ?सोचकर खुश हो गए ,अभी वे लोग जंगल से बाहर खड़े होकर ही ये सब बातें कर रहे थे ,तब ठाकुर साहब बोले -आओ ! अब हम लोग वापिस चलते हैं ,कल और भी  लोगों को लेकर आएंगे। गांववाले भी देखो !कितने डरपोक हैं ?सभी धीरे -धीरे अपने घर के लिए खिसक गए। अब हम भी चलते हैं। 

तभी एक बोला -ठाकुर साहब !जब यहाँ तक आये हैं ,तो देख ही लेते हैं। 

ठाकुर साहब मन ही मन बुदबुदाए ,इसे बहुत चुल मच रही है ,जब अपनी मौत को अपने सामने देखेगा सारी हेकड़ी भूल जायेगा। तब बोले -बेटे तेरे घरवाले ,तेरे इंतजार में होंगे ,माना कि तेरी पत्नी नहीं है ,किन्तु माँ -बाप तो हैं ,उनके लिए तो जी सकता है ,कहकर वो वापस हो लिए ,अभी कुछ कदम ही चले होंगे जंगल की तरफ से गुर्राहट की आवाज सुनाई दी। वो बोले -सभी अपनी गति बढ़ा लो ,हो सके तो दौड़ लगा दो !

शमशेर ने पीछे मुड़कर देखा -एक काली बड़ी सी परछाई जंगल से बाहर आ रही है ,हाँ ,साहब मुझे लगता है ,वो शैतान बाहर आ रहा है ,उसके इतना कहते ही ,सबने तेज दौड़ लगा दी ,जैसे उनके पीछे भूत पड़ा हो। किन्तु उस शैतान की चाल उनके कहीं अधिक तेज थी ,जो पीछे रह गया ,सबसे पहले तो उसे ही धर  दबोचा ,और तेज विदारक चीख अंधकार में गुंजी और शांत हो गई ,सबकी सिट्टीपिट्टी गुम थी ,बदहवास दौड़ लगा रहे थे। कौन गया ?किसी को कुछ नही मालूम ,इसी तरह दूसरी चीख सुनाई दी और समाप्त ! दूर तक किसी के खाने की आवाज सुनाई  दे रही थी। एक तो ,पेड़ पर ही चढ़ गया ,दूसरा बदहवास भागे जा रहा था ,जब तक थककर गिर नहीं गया ,ठाकुर साहब !ने उसी खंडहर में शरण ली जिसमें पहले ''कुंभर्क ''रहता था। उनका तन बुरी तरह काँप रहा था ,गला सूख गया था। 


सुबह किसी ने पानी के छींटे उसके मुँह पर मारे ,जो अभी भी अचेत अवस्था में पड़ा था। सभी गांववाले धीरे -धीरे इकट्ठा हो रहे थे ,अरे ये तो ठाकुर साहब का लठैत है ,इसे क्या  हुआ ?

पता नहीं ,होश आएगा तभी तो पता चलेगा ,उसके मुँह पर पानी के छींटे मार रहे थे ,बहुत देर पश्चात वो होश में आया ,वो उन गांववालों को इस तरह देख रहा था ,जैसे उन्हें जानता ही न हो ,उसका तन ऐसे लग रहा था ,जैसे किसी ने उसकी सारी शक्ति निचोड़ ली हो। बहुत देर पश्चात ,उसे महसूस हुआ ,जैसे वो जिन्दा और सही सलामत है। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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