Kiski dulhan [part 32]

केतकी ने जैसे ही आईने को छुआ ,तब उसे कुछ दिखलाई दिया। तब उससे भानु ने पूछा -तुमने क्या देखा ?

 एक बहुत छोटी बच्ची और उसे गोद में उठाए हुए ,कोई आदमी भाग रहा था,पीछे हवेली में आग लगी हुई थी। आग की रोशनी में, मोहिनी ने, उस आदमी का चेहरा देखने की कोशिश की लेकिन चेहरा धुएँ में छिपा हुआ था किन्तु तभी किसी ने पीछे से चिल्लाकर कहा—"उसे हवेली से बाहर ले जाओ! उस आदमी ने बच्ची को और कसकर पकड़ लिया और दृश्य समाप्त हो गया।

मोहिनी ने झटके से अपने हाथ पीछे खींच लिये ,यह सब देखकर ऐसा लग रहा था जैसे मोहिनी ने  उस जीवन को स्वयं जिया है ,मोहिनी हाँफ रही थी।


भानु ने, उसे संभाला और पूछा -तुमने और क्या देखा ?"

मोहिनी ने काँपती आवाज़ में कहा—"एक बच्ची ! वो और कोई नहीं ,'मैं 'थी।"

भानु  की आँखें आश्चर्य से फैल गईं "क्या? ये तुम क्या कह रही हो ?

"हाँ ,मैंने आईने में खुद को देखा ,जब बहुत छोटी थी ,मेरा बालपन !"

भानु कुछ न ही बोल पाया और न ही उसे कुछ समझ आया, उसी समय दरवाज़े के बाहर से आवाज़ आई—अब तुमने देख लिया।"यह सुनकर दोनों जैसे वहीं जम गए , ये उसी महिला की आवाज़ थी।

मोहिनी धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर बढ़ी ,इस बार भानु ने उसे नहीं रोका ,दरवाज़ा आधा खुला था ,बाहर कोई नहीं था।सिर्फ़ लंबा ख़ाली गलियारा और फर्श पर...एक सफेद कपड़ा पड़ा था।मोहिनी ने ,उसे उठाया। उस कपड़े में एक पुरानी तस्वीर लिपटी थी ,उसने तस्वीर खोली, उस तस्वीर में चार लोग थे -रत्न प्रताप ...विक्रम..और एक युवा महिला...और एक छोटा बच्चा ! मोहिनी की नज़र उस महिला पर टिक गई।वह चेहरा...उसने पहले कभी नहीं देखा था ,लेकिन न जाने क्यों ? उसे देखते ही उसकी आँखों में आँसू आ गए।

भानु ने वो तस्वीर मोहिनी के हाथ से लेकर देखी, तो उसके चेहरे का भाव बदल गया ,एकदम से बोल उठा "ये तो ..."

क्या तुम, इन्हें पहचानते हो ?"

भानु ने सिर हिलाया -"नहीं ,तब उसने तस्वीर के पीछे लिखा हुआ देखा।सिर्फ़ एक तारीख 25 वर्ष पहले ,और नीचे—"मृणाल के जाने के बाद।"

उसी समय गलियारे के दूसरे छोर से आवाज़ आई -भानु ! इस बार आवाज़ स्पष्ट रूप से रत्न प्रताप की थी।

भानु ने राहत की साँस ली ,और बोला -"चाचा! कहते हुए ,वो उस कक्ष से बाहर निकलने लगा। मोहिनी  ने वो तस्वीर संभालकर अपने कपड़ों में रख ली ,तब दोनों गलियारे में आए।

रत्न प्रताप तेज़ी से उनकी ओर बढ़ रहे थे ,उनके पीछे विक्रम भी थे। रत्न प्रताप ने मोहिनी को देखते ही पूछा—"तुम ठीक हो ?

"हाँ" फिर उनकी नज़र मोहिनी के हाथ में पकड़ी पायल पर पड़ी ,अचानक उनका चेहरा गंभीर हो गया ,तब उन्होंने पूछा -"यह तुम्हें कहाँ मिली?"

मोहिनी  ने कहा—"यहीं ,उस कक्ष में 

रत्न प्रताप ने पायल को छूने की कोशिश की लेकिन मोहिनी ने हाथ पीछे कर लिया और बोली - पहले यह  बताइए ! उसकी आवाज़ सख्त थी। यह पायल किसकी है ?"

रत्न प्रताप कुछ क्षण चुप रहे, विक्रम ने उनकी ओर देखा ,दोनों के मध्य एक मौन संवाद हुआ ,आख़िरकार रत्न प्रताप ने कहा—मृणाल की "कहते हुए उन्होंने एक गहरी स्वांस ली। 

मोहिनी का दिल तेजी से धड़कने लगा ,उसने कांपते शब्दों में वो नाम दोहराया -"मृणाल की "

रत्न प्रताप  ने हाँ सिर हिलाया।

और अब वह कहाँ है ? मोहिनी ने प्रश्न किया। 

रत्न प्रताप ने उत्तर देने में कुछ समय लिया और बोले - हमें ,नहीं पता।

मोहिनी की आँखें सिकुड़ गईं और उसने पूछा -"पच्चीस साल से आपके उसके विषय में कुछ नहीं जानते।

"हाँ।"

और आप सबको यकीन है ,कि वह मर चुकी है?"

रत्न प्रताप चुप रहे ,विक्रम ने धीमे स्वर में कहा—हमें कभी उसकी लाश नहीं मिली।"

मोहिनी  के' पैरों तले ज़मीन जैसे खिसक गई ,''मृणाल' मरी ही नहीं थी। कम-से-कम...किसी के पास इसका प्रमाण नहीं था।

तभी पीछे से एक धीमी आवाज़ आई—क्योंकि वह मरी नहीं है।"

सबने एक साथ पीछे मुड़कर देखा,गलियारे के दूसरे छोर पर...वही रहस्यमयी महिला खड़ी थीं। घबराहट के कारण ,मोहिनी की साँस जैसे अटक गई।

भानु ने तलवार निकाल ली,"आप?"

महिला ने उसकी ओर देखा ,और दृढ़ता से बोली -"तलवार नीचे करो !"

"पहले आप बताइए ! आप कौन हैं ?"

महिला ने उत्तर नहीं दिया ,उनकी नज़र सीधे मोहिनी पर थी।

फिर उन्होंने कहा—"तुम्हें वह कमरा नहीं खोलना चाहिए था।"

मोहिनी  ने पूछा—"क्यों?"

महिला की आँखों में दर्द उभर आया ,"क्योंकि अब...वह धीरे-धीरे मोहिनी की ओर बढ़ीं। अब वह जान गई है,' कि तुम लौट आई हो।"

मोहिनी ठिठक गई ,"कौन?"

महिला ने कोई उत्तर नहीं दिया ,बस उसकी गर्दन के पीछे बने निशान को देखा ,फिर फुसफुसाईं—"मृणाल !"उसी क्षण...हवेली के किसी बहुत दूर हिस्से में घड़ी ने दो बार घंटी बजाई।टन... टन...रात के ठीक...दो बजे। मोहिनी की आँखों के सामने सब धुँधला होने लगा ,उसके हाथ से पायल गिर गई।

भानु ने, उसे संभालने के लिए आगे हाथ बढ़ाया ,लेकिन मोहिनी पहले ही अचेत होकर उसकी बाँहों में गिर चुकी थी और उसी क्षण...हवेली की सारी रोशनियाँ बुझ गईं।अंधेरे में सिर्फ़ एक आवाज़ सुनाई दी—"अब दूसरी रात शुरू हो गई है।

टन... टन...हवेली की घड़ी ने दो बजने का संकेत दिया और उसी क्षण पूरा गलियारा अंधेरे में डूब गया।भानु ने मोहिनी को पुकारा -मोहिनी !

वो भानु की बांहों में झूल रही थी ,उसका शरीर बिल्कुल ढीला पड़ चुका था। मोहिनी ! आँखें खोलो!"किन्तु मोहिनी अचेत हो गयी थी ,उसका कोई जवाब नहीं मिला। 

रत्न प्रताप ने, तुरंत मशाल जलाई, लेकिन लौ जलते ही काँपने लगी , जैसे वहां की हवा सामान्य न हो।विक्रम ने मोहिनी की नब्ज़ देखी और बोला -"धड़कन चल रही है।"

भानु ने राहत की साँस ली ,तो फिर यह हो क्या रहा है ?"

रत्न प्रताप ने,मोहिनी की गर्दन के पीछे देखा ,वह निशान अब पहले से अधिक स्पष्ट था।एक छोटा-सा गोल चिन्ह...जिसके बीच एक पतली रेखा थी।

रत्न प्रताप की आँखों में चिंता उतर आई वो बुदबुदाया -"यह शुरू हो गया।"

किन्तु भानु से सुन लिया ,उसने तुरंत पूछा—"क्या शुरू हो गया?"

रत्न ने कोई  उत्तर नहीं दिया। 

रहस्यमयी महिला ने धीमे स्वर में कहा—"दूसरी रात।"

भानु  उनकी ओर मुड़ा और उससे पूछा -"आप बार-बार यही क्यों कह रही हैं?

महिला ने मोहिनी  की ओर देखा और बोली -क्योंकि पहली रात उसने सिर्फ़ रास्ता देखा था..आज रात रास्ता उसे अपने साथ ले जाएगा।"

भानु का चेहरा सख्त हो गया ,और क्रोध से बोला -"मैं ऐसा कदापि नहीं होने दूँगा।"

महिला ने उसकी आँखों में देखा और बोली -"तुम रोक नहीं पाओगे।"

"क्यों?"

"क्योंकि इस बार..."उन्होंने, मोहिनी की बंद आँखों की ओर देखा और बोली - वह स्वयं जाएगी।"

कुछ ही क्षण पश्चात मोहिनी  की उँगलियाँ हल्की-सी हिलीं।

भानु ,थोड़ा झुक गया और बोला -मोहिनी ! उसकी पलकों में कंपन हुआ ,फिर उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं ,लेकिन...उसकी आँखों में वह पहचान नहीं थी।वह सीधे सामने देख रही थी।जैसे किसी और जगह को देख रही हो। मोहिनी ! भानु ने फिर पुकारा।

मोहिनी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी ,किन्तु वह अचानक उठ बैठी।उसकी नज़र गलियारे के अंतिम छोर पर टिक गई ,वहाँ...जहाँ कुछ भी नहीं था लेकिन मोहिनी ने धीमे स्वर में कहा—"मुझे जाना है।"


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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