Shrapit kahaniyan [part 48]

एक उम्मीद  जगती है तो दूसरी तरफ निराशा या परेशानी ,बाहें फैलाये खड़ी दिखती है ,अभी दोनों पति -पत्नी मन ही मन प्रसन्न थे ,उन्हें पंडित चेतराम की बातों से एक उम्मीद जगी थी ,शायद सब ठीक हो जाये किन्तु तभी उनका ये सपना कहो  या भ्र्म टूटा ,बाहर कोई हरिया  पुकार रहा था -हरिया.... ओ हरिया !

इस आवाज से जमींदार साहब का अंतर्मन हिल गया ,कौन हो सकता है ?उनकी पत्नी ने प्रश्न किया। 

कौन हो सकता है ?उसका भाई या उसका कोई रिश्तेदार ही होगा, किन्तु परेशानी ये नहीं कि कौन है ?बल्कि परेशानी ये है ,कि मैं उसे क्या जबाब दूंगा ?'दीनदयाल 'की पूर्ति तो मैं नहीं कर सकता किन्तु उसके परिवार से मैंने कह दिया है ,कि वो बाहर कमाने गया है।उसके परिवार को तो ,परिवार चलाने के लिए खर्चा चाहिए ,जो मैं हर माह भेजता रहूंगा किन्तु हरिया के परिवार को क्या जबाब दूंगा ?मन ही मन सोचते  हुए ,बाहर आते हैं।


 बाहर हरिया का भाई ही खड़ा था ,उन्हें देखते ही बोला -जमींदार साहब ,हरिया रात्रि को भी घर नहीं आया ,हमने सोचा ,शायद ,यहीं रह गया हो ,कोई विशेष कार्य होगा किन्तु वो सुबह से अभी तक घर नहीं पहुंचा ।भाई की प्रतीक्षा करते जब बहुत देर हो गयी ,तब मैं देखने चला आया ,ऐसा क्या काम हो रहा हैं ? 

वो तो कल रात्रि को ही चला गया था ,मैंने उससे कहा था -भाई !समय से अपने घर जाओ !आजकल माहौल ऐसा ही चल रहा है। खतरनाक जानवर घूम रहे हैं ,क्या अभी तक घर नहीं पहुंचा ?अनजान बनते हुए जमींदार साहब बोले -कहीं पी पाकर ,इधर -उधर तो नहीं लुढ़क गया।  

नहीं ,जमींदार साहब ,वो तो घर पहुंचा ही नहीं ,कहते हुए उसकी आवाज में घबराहट थी ,चलिए देखता हूँ ,कहाँ है ?भाई !कहकर वो चला गया। 

शायद ,अपने भाई को खोजने के लिए निकला है । अब इससे क्या कहें ?कि कल उन्होंने उसकी दर्दनाक मौत अपनी इन्हीं आँखों से देखी है। 

अरे कलुवा ! कहाँ घूम रहा है ?

कुछ नहीं ,चच्चा ! कल से हरिया भाई घर नहीं पहुंचा ,उसे ही खोजने निकला हूँ।  

क्या कह रहा है ?  उसने आश्चर्य से पूछा ,वो तो जमींदार साहब के यहाँ ड्राइवर हैं ,न.... 

हाँ ,वहीँ काम करता है किन्तु कल रात्रि से घर नहीं आया ,भाभी कल से परेशान है ,हमने सोचा -शायद ,उनके ही किसी कार्य से वहाँ रुक गया हो ,किन्तु जमींदार साहब कह रहे हैं ,वो तो कल ही चला गया था। 

चला गया था ,तो किधर गया ?

तभी तो उसे खोजने निकला हूँ ,मुझे तो उसकी फिक्र हो रही है , कल गांव में इतने लोगों की मौत हो गयी अब भइया नहीं मिल रहे। आजा ,तू भी मेरे संग चल ,तभी दो और लड़के उधर से गुजरे ,उन्होंने पूछा -कलुवा कहाँ घुमा जा रहा है ?

क्या बताऊं ?कल से हरिया भाई घर नहीं पहुंचे ,घरवालों को बड़ी चिंता हो रही है ,हमने तो सोचा था ,भाई जमींदार  साहब ,के यहाँ होंगे किन्तु उन्होंने बताया ,वो तो कल ही चले गए ,किन्तु अभी तक घर नहीं पहुंचे  तो कहाँ गए ?

कहीं उस जानवर ने ही तो नहीं ,इस तरह से तो....... इस तरह तो  इस गांव में रहना मुश्किल हो जायेगा ,पता नहीं ,कब ,कहाँ ?वो जानवर घात लगाए बैठा हो। 

तभी उन चार -पांच लड़कों की भीड़ में से एक लड़का बोला -यार ! एक बात कहूं ,जो मुझे कई दिनों से खटक रही है किन्तु कह नहीं सका  किन्तु आज कहने का मन कर रहा है। 

क्या ???सभी चलते -चलते ,उसकी तरफ देखने लगे ,मुझे तो लगता है ,ये जमींदार साहब के ही यहाँ कुछ न कुछ तो गड़बड़ है। इनके यहाँ जो भी काम कर रहे थे ,सभी ग़ायब हुए हैं। 

ये तू क्या कह रहा है ?

पूरे विश्वास से तो नहीं कह सकता किन्तु इतना अवश्य बता रहा हूँ ,क्या तुम लोगों ने इस विषय पर ध्यान नहीं दिया। 

क्या ध्यान देना है ?

यही कि जमींदार साहब के ,अब तक जितने भी ड्राइवर और काम करने वाले थे ,गायब हो गए ,या फिर मार दिए गए , भीमा ,वो जमींदार साहब की गाड़ी में टुकड़ों में बरामद हुआ। दीनदयाल जो उनके घर में किसी की देखभाल करता था ,एक दिन गायब हो गया। कुछ ऐसे नौकर जिनका पता ही नहीं चला क्योंकि उनके खोजने वाले भी जिन्दा नहीं थे और अब हरिया भाई.... उसकी बात सुनते ही कलुवा का पूरा बदन सिहर उठा ,भाई के साथ कहीं कुछ गलत तो नहीं...... उससे आगे सोचने का साहस ही नहीं हुआ। 

सभी लड़के एक साथ कलुवा के भइया हरिया को खोज रहे थे ,खोजते हुए गांव के पीछे के हिस्से में पहुंच गये जिधर की तरफ जंगल पड़ता है ,तभी उनमे से एक को ,कुछ स्थान पर चील ,कौवे उड़ते दिखे ,अरे यार.... उधर देख ! उधर कितने सारे पंछी उड़ रहे हैं ?कहीं कोई जानवर तो नहीं मर गया ,आओ !चलो देखते हैं ,कहते हुए वो लोग ,उस और बढ़ चले ,अरे ये क्या ?शायद किसी जानवर को इन्होंने मार कर खाया है। इतनी जल्दी खा गए। 

अरे नहीं ,यार...... ये कंकाल किसी इंसान का लग रहा है। 

सभी थोडा और करीब गए , हाँ ,कंकाल तो इंसान का ही लग रहा है ,तब ये मांस के टुकड़े भी किसी इंसान के ही हो सकते हैं। ये पंछी ,इतनी जल्दी तो एक इंसान को खा नहीं सकते ,इसका मतलब ,ये है ,कि इसे मारा किसी ओर ने है ,खाया भी किसी ओर ने है ,ये बस बचे -खुचे माल पर हाथ साफ कर रहे हैं। 

कहीं ये ,उसी राक्षस या शैतान का काम तो नहीं ,जिसने हमारे गांव में महाभारत किया था किन्तु ये तो पता लगाना होगा ,ये किसके घर का सदस्य था ?

अब चलो  भाई !हो सकता है ,वो यहीं कहीं ,इन्हीं जंगलों में घात लगाए बैठा हो। 

हाँ ,चलो !हरिया भाई को भी तो ढूँढना है ,कहते हुए वो आगे बढ़ जाते हैं। 

कुछ आगे चले ही थे ,तभी एक नीले रंग का कपड़ा झाड़ियों में उलझा दिखा ,समीर भागकर उस झाड़ी के करीब गया और उन लड़कों से बोला -ये जो भी इंसान था शायद उसने इस तरह के कपड़े पहने होंगे क्योंकि ये टुकड़ा भी किसी ,कमीज का ही लग रहा है। सभी उसके करीब आ गए और उस कपड़े को देखने लगे ,है तो ,किसी  आदमी के ही कपड़े यानि मरने वाला कोई आदमी ही होगा। तभी कलुवा उस कपड़े को हाथ में ले लेता है और रोने लगता है ,ये कमीज हरिया भाई की ही है ,और जोर -जोर से रोने लगता है। उसके साथ के सभी लड़के एकदम से जो मस्ती कर रहे थे ,सकते में आ गए। उन्हें अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ। कलुवा से बोले -हो सकता है ,कोई ओर का हो ,तुम्हारा भाई ,भला इस जंगल में आकर क्या करेगा ? वो इधर क्यों आया होगा ?


लड़कों का टोला , रोते  हुए ,कलुवा के साथ गांव के अंदर पहुंचते हैं ,धीरे -धीरे ये खबर ,सम्पूर्ण गांव में ''आग की तरह फैल '' जाती है ,हरिया नहीं रहा। घर जाकर जब कलुवा घर में ,भाभी और माँ को वो कपड़ा दिखाता है ,वे भी स्वीकार कर लेती हैं कि ये कपड़े का टुकड़ा हरिया की कमीज का ही है। अब तो हरिया के घर में ही नहीं ,पूरे गांव में फिर से मातम पसर गया। सभी ,एक ही नाव में सवार थे ,वो दर्द की नाव में सवार थे ,उसका नाविक कौन है ? कौन उस दर्द की नाव को चला रहा है ? कोई नहीं जानता। जमींदार साहब ,अपने घर में ही हरिया के जाने का मातम मना रहे थे किन्तु इस बात से भी पछता रहे थे कि इन सभी मौतों के लिए ,वे स्वयं जिम्मेदार है। शुरू की मौतों से उन्हें इतना दुःख नहीं था किन्तु अब तो उन्हें भी लगने लगा, जैसे उन मौतों का भार ,उनके सर पर चढ़ता जा रहा है। उनके परिवार के बहते आंसू पोंछ तो न सके किन्तु उन आंसुओं के बहने का कारण अवश्य बन गए। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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