धीरे -धीरे ये खबर ,सम्पूर्ण गांव में फेेल गयी ,हरिया अब दुनिया में नहीं रहा ,सारा गांव गम के सागर में डूबा हुआ था। कल पांच -छह लोग गए ,आज हरिया नहीं रहा। पता नहीं ,गांव पर कैसी अनहोनी छाई है ?किस काल का साया मंडरा रहा है। ऐसा लग रहा है ,जैसे -साक्षात् यमराज इस गांव के भृमण पर निकले हैं। जहाँ देखो, 'मौत ही मौत' नजर आ रही है। एक घर में शांति होती नहीं दूसरे घर से ,रुदन की आवाजें आने लगती हैं। कुछ महिलायें गांव के पंडितजी के पास गयी -पंडितजी ! ये हमारे गांव में कैसा 'मौत का तांडव' हो रहा है ? कुछ तो उपाय बतलाइये !मेरे घर में तो एक ही कमाने वाला था वो ही नहीं रहा सरस्वती बोली।
मेरी बहु को तो आये अभी छह माह ही हुए हैं और आज उसे विधवा की साडी में देखती हूँ तो कलेजा मुँह को आता है। कुछ तो उपाय बतलाइये ,जिससे इस मौत का तांडव समाप्त हो।
पंडित चेतराम ,थोड़े लालची तो थे किन्तु गांववालों का बुरा नहीं चाहते थे , इतना तो समझते ही थे ,ये गांववाले ही न रहे ,तो पूजा -पाठ करने कौन आएगा ? लोगों की ईश्वर से आस्था हट गयी ,तब इंसान का इंसान पर भी विश्वास नहीं रहेगा। जिस आस्था और विश्वास के सहारे मुझसे उम्मीद लगाते हैं ,वो उम्मीद भी न रही तो इस मंदिर में कोई प्रवेश नहीं करेगा। कब तक ,उस शैतान को छिपाकर रखा जायेगा ? अब मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकता ,मुझे कुछ न कुछ तो करना ही होगा। आखिर ये गांव मेरा भी है ,और इस गांव के लोग भी मेरे हैं। आज ही ज़मीनदार साहब से बात कर लूंगा।
देखिये !मैं जानता हूँ ,हमारे गांव पर विपदा आन पड़ी है ,किसी का भाई ,किसी का बेटा गया है ,कुछ शनि का कोप चल रहा है , मैं कुछ उपाय करता हूँ ,पूजा करनी होगी। ईश्वर ने चाहा ,तो ये बुरा समय शीघ्र ही समाप्त हो जायेगा। शाम को ,मंदिर में पूजा -पाठ करके पंडितजी ने अपने दो आदमी संग लिए और निकल पड़े ,जमींदार साहब ,के घर की ओर ......
पंडितजी को जमींदार साहब के घर की तरफ जाते हुए ,समीर ने उन्हें देख लिया। समीर को तो जमींदार साहब पर पहले से ही शक़ था ,वो भी छुपते -छुपाते उनका पीछा करने लगा।उसे लगा - हो न हो ये पंडित भी शायद, उस जमींदार से मिला हुआ है। पंडित जी ,घर के अंदर चले गए और वो उस घर की एक खिड़की के पीछे खड़े होकर ,उनकी बातें सुनने लगा।
आओ !पंडित जी आओ !
क्या आएं ? सारे गांव में ,'मातम' बना हुआ है ,और आप लोगों ने ,कुछ समझना ही नहीं चाहा ,मैंने पहले ही कहा था -उसे गांववालों के हवाले कर दो ,या उसे लेकर कहीं चले जाओ !समीर को अब अपने शक़ पर पूर्णतः विश्वास हो गया ,ये जमींदार साहब में ही ,कुछ न कुछ गड़बड़ है ,मुझे लगता है ,ये पंडित भी ,उस बात को जानता है ,हो सकता है ,ये दोनों मिले हुए हों ,तभी वो अपने दोस्तों और कलुवा को बुलाने चला जाता है।
मैं तो पंडितजी वैसे ही परेशान हूँ ,न जाने किस तरह से अपनी जान बचाकर भागा हूँ ?
ये नौबत भी तो तुम्हारी अपनी लाई हुई है , किन्तु हरिया की बलि तो चढ़ गयी न....
मैंने तो उसे बचाने का बहुत ही प्रयास किया था ,इस कारण मैने उस पर गोली भी चला दी किन्तु उस पर गोली का भी असर नहीं हुआ ,वो तो आपने ये सुरक्षा कवच और ये रुद्राक्ष की माला दे रखी है इसीलिए मैं शायद ,बच गया।
तुम तो बच गए किन्तु एक घर का बच्चा नहीं रहा ,एक औरत भरी जवानी में विधवा हो गई।
इस बात का तो मुझे भी दुःख है किन्तु अब मैं क्या कर सकता हूँ ?
अब तुम्हें गांववालों को बताना होगा -कि ये सब तुम्हारी उस औलाद के कारण हो रहा है ,जिसे तुम जबरदस्ती तांत्रिक विधि से ,इस दुनिया में लाये ,जो आज शैतान बन गया है ,जिसने इस गांव में मातम मचाया हुआ है ,ये बात समीर के साथ आये ,सभी लड़कों ने सुन ली ,जो अभी उस खिड़की के पास आकर खड़े हुए थे। देखा ,मैं कह रहा था ,न..... जरूर जमींदार साहब के घर में ही कुछ न कुछ गड़बड़ है।
इसका अर्थ है ,इस पंडित को भी सब मालूम था और चुपचाप जमींदार के साथ मिलकर, हम गांववालों की मौत होते देख रहा था कलुवा क्रोध में आकर बोला -अब आओ ,चलो ! सभी गांववालों को इकट्ठा करते हैं और इन दोनों की पोल खोलते हैं ,कहते हुए ,गांव की तरफ बढ़ते हैं और गांववालों इकट्ठा करते हैं।
गांववालों !क्या तुम लोग ये जानना नहीं चाहोगे ,ये मौतें जो इस गांव में हो रहीं हैं ,उनका जिम्मेदार कौन है ? मेरे भाई का हत्यारा कौन है ?
ठाकुर तेजप्रताप ,तो पहले ही जमींदार से खार खाये बैठा था , जमींदार के विरुद्ध बातों में तो वो भी दिलचस्पी लेने लगा ,अपनी मूछों पर ताव देते हुए ,तब वो भी बोला -अब इतनी पहेलियाँ क्यों बुझा रहे हो ?बताते क्यों नहीं ? उस जमींदार ने क्या किया है ?
किया -विया कुछ नहीं ,बल्कि वो ही इन हत्याओं का सूत्रधार है ,उसी का बेटा है ,जो राक्षस बन गया है ,वो ही ये हत्याएं करता है ,उन हत्याओं के बाद ,वो उन शवों का क्या करता है ?ये सब तो पंडितजी ही बतायेंगे ,वो पंडित भी ये सब जानता है ,औलाद तो, पंडित के भी है ,अब हम उस पंडित की औलाद को ही उस राक्षस का निवाला बनायेगें ,तब उस पंडित को पता चलेगा कि जब अपनी औलाद !अपना भाई ,अपना बेटा मरता है तब कैसा लगता है ?कितना दुःख होता है ?कहते हुए कलुवा रोने लगा।
सही तो ,कह रहा है ,उस पंडित पर हम कितना भरोसा करते रहे ?और वो ही हमारी पीठ में छुरा घोंप रहा था ,उस पंडित को भी यहीं चौपाल पर लाकर ,उससे पूछा जाये ,उसने ये सब ,ऐसा क्यों किया ?ठाकुर ने उन लड़कों की बातों का समर्थन किया। अब कहाँ है ?वो पंडित और कहाँ है ?वो जमींदार ! उन्हें बुलाओ यहाँ भरी सभा में ,हम अपने लोगों की मौत का जबाब मांगेंगे और उनकी मौत का बदला भी लेंगे।
ठाकुर की तो जैसे चल निकली ,जैसा वो चाहता था ,वही क्रोध अब लोगों में जमींदार के विरुद्ध फूट रहा था ,हाँ ,हम उन्हें छोड़ेंगे नहीं ,हम उनसे जबाब मांगेंगे ,उस क्रोध में ठाकुर ''आग में घी डालने ''का कार्य कर रहा था।

