Shrapit kahaniyan [part 47 ]

जमींदार साहब ,को जब पता चलता है ,कि ये अनजान आदमी और कोई नहीं ''इंस्पेक्टर कालीचरण '' है ,तब उन्हें लगता है ,उनकी पत्नी ने बैठे -बिठाये ,मुसीबत मोल ले ली है। पत्नी के पूछने पर उसे बताते हैं कि वो कोई सफाई कर्मचारी नहीं वरन एक इंस्पेक्टर हैं , किसी ने हमारे विरुद्ध थाने  में ,रिपोर्ट लिखवाई है ,उसी की तहक़ीक़ात के लिए साधारण वेशभूषा में आया है । अब हमारे बेटे के विषय में पूछ रहा है ,अब हम क्या जबाब दें ?

 ये बात सुनकर वो भी एकदम से सकते में आ जाती हैं ,अब क्या होगा जी..... 

मुझे तो लगता है ,ये सारी कारस्तानी उस पंडित की हो सकती है ,वो तभी से कह रहा है -कुंभर्क को गांववालों के हवाले कर दो ,नहीं तो उसे लेकर गांव से बाहर निकल जाओ !


एक बात है ,जब गांव में इतनी हत्याएं हो रहीं हैं ,तब लोगों का रोष धीरे -धीरे तो बढ़ेगा ही। 

तब हम क्या करें ?अभी तो कुंभर्क भी हमारे पास नहीं है ,बाहर आजाद घूम रहा है ,इससे लोगों की जान को ज्यादा खतरा हो सकता है ,हो सकता है ,अब हमारे नियंत्रण में ही न रहे ,दिन में छुपा रहे ,रात्रि में अपना कार्य करने के लिए ,अपने छुपे स्थान  से बाहर निकले। 

तुम इस इंस्पेक्टर को चलता करो ,उसके पश्चात पंडित जी के पास जाना। 

क्यों ? हमें पंडित को बताना नहीं है ,कि हमें उस पर शक़ हो गया है। 

नहीं ,मैं इसीलिए नहीं कह रही , मैं ये कहना चाह रही हूँ ,उनसे पुछिये ! क्या उनके पास कोई उपाय है ,जिससे कुंभर्क को भी हानि न पहुंचे और लोग भी न मरें। क्या कोई और उपाय नहीं है ? 

अब ऐसा क्या उपाय होगा ?जबकि वो तो पहले ही बता चुके हैं कि वो पूरी तरह से शैतान बन चुका है ,यदि उसने कोई सिद्धि कर ली होगी तो और भी खतरनाक हो जायेगा ,वो गांववालों के लिए ही नहीं ,हमारे लिए भी खतरा है। 

ये सब मैं समझती हूँ किन्तु मैं क्या करूं ?कितनी मिन्नतों से औलाद का चेहरा देखा ?उसे कैसे यूँ ही भटकने के लिए ,छोड़ दें ?कोई  उपाय तो पंडितजी बताएंगे ही,कहते हुए उनके ह्रदय की वेदना , उनके चेहरे पर भी आ गयी। 

जमींदार साहब ,बोले -तुम परेशान न हों , मैं आज ही पंडित जी से कोई जानकारी लेने जाऊंगा , कालीचरण को तो भेजना होगा ,जब वो बाहर आये ,वो अपना नाश्ता कर चुका था। उन्हें देखते ही बोला -जमींदार साहब अब चलता हूँ ,आवश्यकता पड़ी ,तो दुबारा मिलने आ सकता हूँ। 

क्यों नहीं ,क्यों नहीं ? कहते हुए उन्होंने एक ट्रे कालीचरण के आगे सरका दी।

 कालीचरण ने देखा ,उसमें सोने की दस गिन्नियां थीं। ये क्या ?जमींदार साहब !आप मुझे रिश्वत देने का प्रयास कर रहे हैं। 

जी नहीं ,आपने चाहे गरीब ,जरूरतमंद इंसान बनकर कार्य किया ,किन्तु किया तो...... ये उसी का मेहनताना है। एक सिक्के की बात हुई थी ,कहते हुए उसने एक गिन्नी उठाई हंसा और चला गया। अपनी पत्नी से बोले - लगता है ,इंस्पेक्टर ईमानदार है ,रिश्वत से नहीं मानेगा। 

देना भी क्यों है ?इस तरह उसे रिश्वत देने से तो ,उसे हम पर पूर्णतः विश्वास हो जायेगा कि गड़बड़ हम में ही कहीं है ,अब आप शीघ्र ही ,पंडित चेतराम के पास जाइये और कोई उपाय पूछकर बताइये। 

जमींदार साहब मंदिर में प्रवेश करते हैं ,उससे पहले पंडितजी ,जमींदार साहब को बाहर ही ,'गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करते हैं। ये बात जमींदार साहब को अच्छी नहीं लगी ,ये क्या कर  रहे हैं ?पंडित जी ! क्या हम भी अशुद्ध हो गए हैं ?

मैं ये तो नहीं कह ,सकता किन्तु बुरी शक्ति का घर में होने से ,उसका असर तो आ ही सकता है ,कहते हुए ,पंडित ने उन्हें अंदर आने दिया ,कहिये !कैसे आना हुआ ?

अब क्या बताएं ,पंडित जी !गांव में इतनी मौतें हो गयीं हैं ,मन व्यथित है ,ग्लानि से भर गया है ,उन्होंने जानबूझकर ,थाने की रिपोर्ट और कालीचरण के गांव में आने की बात नहीं बताई। 

वो तो होना ही था ,जितनी भी हत्याएं हो रहीं हैं ,उनका ख़ामियाजा तुम्हें भी भुगतना पड़ सकता है ,पंडितजी ,ने जैसे उन्हें चेतावनी दे डाली। तुम हत्यारे को छुपाकर ,उसके पाप को बढ़ावा दे रहे हो ,जिसमें तुम लोग भी शामिल हो,उसके दुष्परिणाम तुम्हें भी तो भुगतने पड़ सकते हैं।   

तभी तो मैं इन परेशानियों का आपसे ,हल पूछने आया हूँ। 

इसका कोई हल नहीं है ,अब तो पंडितजी नाराजगी और लापरवाही से बोले। 

कोई तो उपाय होगा ,जिससे ये शैतान भी समाप्त हो जाये और हमारा बेटा भी हमें वापस मिला जाये ,कहते हुए ,उन्होंने कुंभर्क की कुंडली ,उनके आगे रख दी। 

पंडितजी ने पहले तो उन्हें ,क्रोध की दृष्टि से देखा , उसके पश्चात ,अनमने मन से उस कुंडली की तरफ देखा , कुछ देर अध्ययन करने के पश्चात , अँगुलियों पर कुछ गणना की ,जिसके कारण उनके चेहरे पर भाव आ जा रहे रहे थे ,कभी पंडितजी को उम्मीद लगती ,कभी..... उनके चेहरे को देखते हुए जमींदार साहब की भी ऐसी ही हालत हो रही थी। उतावले होकर ,जमींदार साहब ने ,पंडित जी से पूछा -कुछ उम्मीद लग रही है। 

हाँ ,इसका शैतानी स्वरूप थोड़ा शांत होगा ,इसे किसी शीत प्रदेश में ले जाएँ ,जहाँ बर्फ ही बर्फ नजर आती है। इसमें तामसिक शक्तियां हैं ,जो अग्नि से पैदा होती हैं ,अग्नि को जल से शांत किया जाता है किन्तु इसकी अग्नि की शक्ति अनंत है इसके ताप को कम करने की शक्ति जल यानि उसका ठोस स्वरूप ,इसको समाप्त तो नहीं कर पायेगा किन्तु शांत होगा। वहीँ इसका उपाय भी मिलेगा। एक समय पर इसके जीवन में एक नारी का प्रवेश होगा ,जिसमें अद्भुत शक्तियां होंगी। दोनों ही एक -दूसरे के विरोधी तत्व होंगे किन्तु उनका आकर्षण एक -दूसरे को अपनी ओर खींचेगा। तभी ,बुराई पर अच्छाई का प्रभाव पड़ेगा ,यानि बुराई उसके सामने कुछ नहीं कर पायेगी। 


यानि एक उम्मीद अभी बाक़ी है ,ये कुंडली तो यही बतला रही है ,बाकि जो हरि इच्छा !कहकर उन्होंने वो कुंडली ,वापस जमींदार साहब को थमा दी। एक आशा की उम्मीद से जमींदार साहब !घर वापस आ गए ,उनके चेहरे की प्रसन्नता देखकर ,उनकी पत्नी समझ गयी ,शायद कोई शुभ समाचार ही है। 

  अब मुझे ये चिंता सता रही है ,इस समय कुंभर्क न जाने कहाँ होगा ? रात्रि में फिर से कोई न कोई अशुभ समाचार सुनने को न मिले ,कहते हुए ,उन्होंने पंडितजी द्वारा बताये उपाय को अपनी पत्नी को बताया। 

अभी वो ये सब ही ,कह पाए थे ,तभी एक आदमी बाहर हरिया को आवाज लगते हुए आया -हरिया ओ हरिया...... !

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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