कहाँ रहा ?बचपन !
कहाँ गए ?बचपन के खेल !
वो बचपन ! जो बीतता था ,
अपने घर की छाया में ,
प्रतिपल ,सीखता था ,रिश्ते ,
खेलता था ,दोस्तों के संग ,
लड़ाता था , पेज पतंगों से ,
कुलांचे भरता था ,उमंगों से ,
आज का बचपन -
पहुंचता है ,'प्ले स्कूल '
अजनबी चेहरों को देख,
सुबकता है ,बचपन !
ढूंढता है ,करता है ,
तलाश अपनों की ,
रिश्तों की पहचान नहीं ,
करता है ,पहचान, रंगों की ,
जो बेरंग बनाती , जिंदगी को ,
रात -दिन की ,मशक्क़त !
अजनबी बन, माता -पिता ,
खर्चों के बोझ तले,
लड़ते रात -दिन।
किससे प्यार मिले ?
केेसा ये बचपन !
वीडियो गेम में ,
बीते ,बचपन ,
आँखें हुई कमजोर ,
कैसे पहचाने ?
रिश्तों की डोर !
न बचपन भीगा प्यार में ,
जवानी डूबी इंतजार में ,
बुढ़ापे में मिला अकेलापन ,
न बचपन ,के खेल निराले ,
न मिला ,दादी -दादा का संग ,
अच्छे जीवन की तलाश में ,
भटके जीवनभर......
