दिन हो ,या रात्रि !न जाने कितनी बनती है ?योजना !
कुछ भी सही नहीं लगता या होता विफ़ल होती हैं ,योजना !
पंचवर्षीय हो, सामाजिक व फिर हो पारिवारिक योजना !
पूर्ण कभी होती नहीं ,बन जाती है ,धारावाहिक ये योजना !
एक पूर्ण होती नहीं ,दूसरी आ धमकती है ,नई कोई योजना !
बनती है ,बिगड़ती है ,टूटने के लिए ही बनती है ,नई योजना !
जीवन भर बनती हैं ,अपने लिए बेहतर , देश की नई योजना !
कभी-कभीआर्थिक और कुदरत की मार भी झेलती हैं ,योजना !
बहुत सारी बनती हैं ,कागजों पर सरकारी योजना !
बरसात की बाढ़ में बह जाती हैं ,वे कागज़ी योजना !
हम भी ,अपने जीवन में बनाते हैं ,न जाने कितनी ?योजना !
बिना स्वार्थ ,अटल विश्वास के ,कभी पूर्ण नहीं होती ,योजना !
