Shrapit kahaniyan [part 29 ]

सुबोध , कुंभर्क के होने का सम्पूर्ण वृतान्त प्रभा को सुनाता है ,कुंभर्क के ''नामकरण संस्कार ''में बड़ी विचित्र घटना होती है ,पंडित जी जैसे -जैसे मंत्रोच्चारण करते हैं , वैसे ही ''कुंभर्क ''का रुदन बढ़ने लगता है ,रोते -रोते वो अपनी माँ की  गोद  से लुढ़क जाता है ,जैसे वो उस स्थान से बाहर जाना चाहता है किन्तु उसकी माँ अपनी लापरवाही समझ ,उसे पुनः अपनी गोद में उठाती है ,तब उसके कानों से रक्त बहने लगता है। तब पंडित जी ने उसके माता -पिता को सांत्वना दिया और धीरे -धीरे कुंभर्क के कानों से रक्त बहना बँद  हो गया। तब पंडित जी ने उसको अलग कमरे में सुलाने के लिए कहा भगवान की मूर्ति की स्थापना के लिए उनसे कहा। 


कुंभर्क को एक अलग कमरे में  सुलाकर ,आने वाले सभी मेहमानों को प्रसाद वितरण करने के पश्चात ,जब घर में सिर्फ पंडित जी रह जाते  हैं ,तब वो उनसे बताते हैं -तुमने इस बच्चे को बुलाकर आफ़त मौल ले ली है। 

मतलब ,हम कुछ समझे नहीं। 

जब मैंने तुम लोगो से पहले ही ,बता दिया था कि तुम लोगों के भाग्य में औलाद का सुख है ही नहीं ,किन्तु तुम लोगों ने मेरा कहा नहीं माना ,तुम लोगों ने सुख तो नहीं ,दुःख को अवश्य गले लगा लिया। इस तरीक़े से कहीं संतान होती है। उस धूर्त तांत्रिक ने तुम लोगो की इसी कमजोरी , लाभ उठाया और उसने एक शैतान को तुम्हारे बच्चे के रूप में पैदा किया। 

क्या ??

हाँ ,इसका प्रत्यक्ष परिणाम तुमने देखा नहीं ,मैंने जैसे ही घर की सुख शांति के लिए मंत्र जाप किया ,वो किस तरह रोने लगा क्योंकि ईश्वर के आवाहन के लिए किये गए ,मंत्रों के उच्चारण से उसको कष्ट हो रहा था। वो तो अच्छा हुआ तुम्हारे ईश्वर पर विश्वास के कारण ,पूर्णिमा के चाँद को वो अपने मंत्रों से पूरी तरह ढक नहीं सका जिसके कारण उस बच्चे पर शैतान का पूरी तरह असर नहीं हुआ है। यदि वो तांत्रिक ,अपने कार्य में पूरी तरह सफल हो जाता तो तुम अपने घर में एक बच्चे को नहीं ,एक शैतान को लेकर आते। 

इसका मतलब अब ये शैतान नहीं रहा ,अब सब ठीक है ,कुंभर्क की माँ ने खुश होते हुए पूछा -अब सब ठीक है। 

नहीं ,उसमें अभी भी शैतान का अंश है ,तुम लोगों ने देखा नहीं था कैसे ,उसके कानों से रक्त बह रहा था ?उस पर ईश्वर के नाम से असर पड़ रहा था ,उसके कानों में मंत्रोच्चरण से कष्ट हो रहा था। मेरे उस अभिमन्त्रित धागे को बांधते ही ,वो कैसे अचेत हो गया ?उस धागे को हमेशा बंधे रहने देना। उस धागे के कारण वो काली शक्ति उससे दूर रहेगी। ईश्वर का नाम लेने से ,उसके तन में जलन होगी इसीलिए मैंने तुम लोगों से मूर्ति स्थापना से पहले  उसे सुलाने को कहा। जहाँ भी आपका ईश्वर का कमरा है वो नहीं आ पायेगा ,वो उससे दूर ही रहेगा। काली शक्तियाँ उसके आस -पास तो रहेगीं किन्तु इस धागे के कारण उसके अंदर नहीं आ पायेंगी , जब तक ये छोटा है ,जैसे -जैसे ये बड़ा होगा इसे धीरे -धीरे अपनी शक्तियों का आभास होगा। अब इसके दो रूप होंगे ,दिन में इंसानी रूप में रहेगा किन्तु रात्रि में शैतानी रूप अपना  असर दिखलायेगा ही....... 

ईश्वर ने हमें बच्चा भी दिया ,वो भी ऐसा.......  जिसके दो रूप होंगे ,कहते हुए उसकी माँ रोने लगी। 

ये ईश्वर की देन  नहीं है ,उस आधार पर तो तुम्हें औलाद का सुख ही नहीं था ,ये तो उस तांत्रिक की साजिश का नतीजा है ,तुम्हारे द्वारा वो शैतान को पृथ्वी पर लाना चाहता था। जिस तरह से शैतान आता उस तरह से तुम्हें उस पर शक हो जाता इसीलिए उसने ये तरीका अपनाया ,पंडित जी ने स्पष्ट रूप से जबाब दिया। 

दोनों दम्पत्ति ,अपने किये पर शर्मिंदा थे किन्तु पुत्र मोह को त्याग नहीं पा रहे थे ,जब पंडित जी ने कहा -इसे चुपचाप किसी जंगल में छोड़ आओ !''

कहने लगे -ये आप क्या कह रहे हैं ?इसे हमने अपने खून से सींचा है। माना  कि उन बाबा ने हमें धोखा दिया ,हमारी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया किन्तु अब इस नन्हें बालक को ऐसे कैसे ?जंगल  में जानवरों के बीच छोड़ दें ?हम इसे अच्छे संस्कार देंगे ,तब ये क्यों शैतान बनेगा ?

उनकी बात सुनकर पंडित जी मुस्कुराये ,सोच रहे थे -ये कितने भोले हैं ?संतान सुख के लिए शैतान को भी पालने को तैयार हैं। ख़ैर जो होगा , ईश्वर सम्भाल लेंगे ,कहकर पंडित जी ने उनसे विदा ली किन्तु वे जानते थे ,इन्हें शीघ्र ही मेरी आवश्यकता पड़ने वाली है। तब वो बोले -इसको संस्कार तो दे सकते हैं ,किन्तु इसकी प्रकृति को नहीं बदल सकते। ख़ैर !अभी के लिए मैंने इसे धागा बांध दिया है। आगे जो भी बात हो ,मुझे बता सकते हो कहकर पंडित जी ने उनसे विदा ली। 


पंडित जी के चले जाने पर दोनों पति -पत्नी बैठे सोच रहे थे ,ये कैसी विडंबना है ?पुत्र है किन्तु एक ड़र हमारे अंदर समा गया है। वे अपने पुत्र को देखने अंदर  गए ,देखा तो वो आराम से लेटा खेल रहा था। दोनों ही उसकी बाल क्रियाओं को देखकर ,पंडित जी की बताई बातों को भूलकर उसके साथ खेलने लगे। अब तुम्हीं बताओ जी , हमारा ये बालक क्या किसी का अहित कर सकता है  ?या शैतान का अंश हो सकता  है।

जो भी है ,अब ये हमारा पुत्र है ,हम इसको पालेंगे भी और अच्छे से अच्छी परवरिश भी देंगे।इस विचार के साथ दोनों पति -पत्नी अपने पुत्र कुंभर्क को पालने लगे।   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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