भीमा अपनी बीमार पत्नी को बचाने के उद्देश्य से ,जमींदार साहब से उनकी गाड़ी मांगने आता है किन्तु जमींदार साहब उसे अपनी गाड़ी देने से इंकार कर देते हैं। पत्नी के दुःख से दुःखी भीमा ,जमींदार साहब को बिना बताये ही ,गाड़ी ले जाने की योजना बनाता है ,वो नहीं जानता था -कि चोरी के इस ख़्याल से ही ,वो अपने ''काल ''को ही निमंत्रण देने जा रहा है। दरवाजा बाहर से ही बंद था और वो उस दरवाजे को खोल देता है। दरवाजा खोलते ही उसे किसी की गुर्राहट का स्वर सुनाई देता है। उसे लगता है ,शायद यहाँ कोई जंगली जानवर घुस गया है। तब भी वो बिना आहट किये ,चाबी तक जाने का प्रयास करता है क्योंकि चाबी उसी दरवाजे के पीछे दाईं ओर टंगी रहती है। ये बात वो पहले से ही जानता है ,वो चाबी लेने का प्रयास करता है और ले भी लेता है ,तभी अँधेरे में चाबी ,जमीन पर गिर जाती है। तभी एक तेज गुर्राहट उसे सुनाई देती है। जिस कारण वो बुरी तरह घबरा जाता है।
उस स्थान पर ,जमींदार साहब की गाड़ी खड़ी रहती है ,खेती -बाड़ी का कुछ सामान रखा रहता है। एक टीन डली हुई है , जहाँ पर गाड़ी खड़ी रहती है और एक अन्य कमरा भी है बाक़ी तो उस जगह में फूल -फुलवारी और साग -सब्ज़ी बोई हुई है। शायद ,उसी कमरे से वो गुर्राहट आ रही है
पहले तो वो उस गुर्राहट पर ज्यादा ध्यान नहीं देता किन्तु अब उसकी भयानकता का एहसास होते ही घबरा जाता है। वो अनुमान भी नहीं लगा पाता, कि ये कैसा जानवर हो सकता है ?किन्तु अब वो आवाज तेजी से बढ़ती जा रही थी क्योंकि कुंभर्क को उस स्थान पर ,किसी इंसान के होने का एहसास हो जाता है। वायु द्वारा उसके रक्त की महक को वो महसूस कर पा रहा था। भीमा भी अँधेरे में अनुमान लगाने का प्रयास कर रहा था कि कौन सा जानवर हो सकता है ?इसी प्रयास में ,वो अब तक पसीने से लथपथ हो चुका था। गाड़ी अभी उस स्थान से लगभग दो सौ गज की दूरी पर होगी। भीमा सोच रहा था ,अब तो बस , किसी तरह से मैं ये गाड़ी ले जाऊँ ,बाद में जमींदार साहब से क्षमा मांग लूंगा और दिन में यहाँ आकर देखूंगा वो क्या बला है ?
सड़क के खम्बे की रौशनी में उसी कमरे से किसी इंसान की ही परछाई नजर आती है किन्तु वो परछाई ही बड़ी भयानक लग रही थी। भीमा जिस उद्देश्य से आया था ,उसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए वो आगे बढ़ता है किन्तु अब उस परछाई को देखकर ,उसका साहस जबाब दे रहा था। वो गाड़ी में चाबी लगाता है और जैसे ही गाड़ी के स्टार्ट होने की आवाज होती है ,तभी उस कमरे से बाहर कोई आता है ,भीमा घबराहट और जल्दबाज़ी में गाड़ी को बाहर लाने का प्रयास करता है ,तभी उसे लगता है ,जैसे कुछ उसकी गाड़ी टकराया हो और खिंचकर टूटा भी हो।उसके टूटते ही ,वो इंसान जैसा जानवर उस कमरे से बाहर तो पहले ही आ गया था किन्तु एक सीमा से बाहर नहीं आ पा रहा था। अब वो दौड़कर ,भीमा के पीछे आया।
भीमा नहीं जानता था ,अनजाने में ही उसने अभिमंत्रित धागा और वहाँ रखा अभिमंत्रित सामान खंडित कर दिया है। जब जमींदार साहब को पता चला था ,उनका बेटा जंगल से वापिस आ गया। उसके आँखों की ज्वाला देखकर ही वो समझ गए थे कि ये अबकि बार जो आया है विनाश ही लेकर आया है इसीलिए उसको घर के पीछे ,खाली जगह में ठहराया था ,जिसमें गाड़ी और अन्य सामान भरा रहता है ,इंसानों का ज्यादा आना -जाना भी नहीं है। फिर भी सुरक्षा के तोेर पर उन्होंने पंडित जी से अभिमंत्रित धागा और कुछ सामान लेकर यहाँ रख दिया था। ताकि जब भी उस शैतान का प्रभाव तेज़ हो ,तब ये वस्तुएं उसे कुछ देर के लिए ही सही या जितनी देर भी उसे रोक सकें तो रोके रखें किन्तु भीमा ने डरते हुए जैसे ही गाड़ी को बाहर निकाला। वो धागा गाड़ी की चपेट में आकर टूट गया। और वो सामान गाड़ी के पहिये के नीचे आकर खंडित हो गया।
अब भला शैतान को कौन रोक सकता था ? वो तेजी से भीमा की तरफ बढ़ा भीमा ने उसे देख लिया और गाड़ी को बाहर निकालने का प्रयास करने लगा। जब देखा ,वो राक्षस नजदीक आता जा रहा है ,भीमा गाड़ी छोड़कर ,भागने का प्रयास करता है। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। कुंभर्क के तेज़ और लम्बे नाख़ून उसके पेट में गड़ चुके थे। भीमा चीख भी न सका ,तभी उसके दो लम्बे नुकीले दाँत ,उसकी छाती से उसका लहू पीने लगे। भीमा कुछ देर ही छटपटाया और ठंडा हो गया। कुंभर्क तेजी से गुर्राया। शैतान की परछाई देखकर ही गली के कुत्ते भी जो किसी अजनबी को देखकर भौंकते -भौंकते थकते नहीं थे ,वे भी न जाने कहाँ ''दुम दबाकर छुप गए। ''शैतान को देखकर भला कौन ऐसी हिमाकत कर सकता था ?
भीमा का रक्त पीने के पश्चात ,उसने उसका दिल और आतें निकालकर सब खा डाला ,जब वो गाड़ी में बैठा खा रहा था। तभी भीमा को बुलाने उसके घर से ही मतलू आया था। उस गली में ,एकदम सन्नाटा छाया था ,सिर्फ शैतान के खाने की चप -चप की आवाज सुनाई दे रही थी।उस स्थान पर दहशत भरा सन्नाटा छाया था। उसे ड़र लग रहा था ,आगे जाने का साहस नहीं हो रहा था। वो वापस अपने घर की तरफ मुड़ गया।
रास्ते में मंदिर से आते ,पण्डित जी ने उसे देखा और पूछा मतलू ! तू इतनी रात्रि को कैसे घूम रहा है ?
मंदिर तो शीघ्र ही बंद हो जाता है ,आप भी तो इतनी रात्रि में बाहर हैं।
हाँ ,आज सरपंच जी से ,कल के त्यौहार पर बातचीत के सिलसिले में मिलना था ,उसी कारण देरी हो गयी ,तू बता ! तू यहाँ क्यों झांक रहा है ?
पंडित जी ,मैं तो भीमा को ढूंढने यहाँ आया था किंतु मुझे वहां जाने से ड़र लग रहा है ,ऐसा लग रहा है ,जैसे वहाँ कुछ तो गलत हो रहा है ,उसने जमींदार साहब की गली की तरफ इशारा करते हुए कहा।
क्यों ?तू भीमा को ढूंढने क्यों निकला है ?पंडित जी की आवाज में थोड़ा कम्पन था ,क्या उसने बताया था ?कि वो इधर आ रहा है।
हाँ ,वो जमींदार साहब से उनकी गाड़ी मांगने गया
था ,भीमा की पत्नी अंगूरी बहुत बिमार है गांव के वैद्य जी ने कहा ,इसे शहर के अस्पताल में भर्ती कराना होगा किन्तु उसे गए बहुत देर हो गयी ,जब वो घर नहीं पहुंचा तो मैं, देखने आ गया। यहाँ की गली भी कितनी सूनी लग रही है ?अभी मैंने देखा, जैसे गाड़ी में कोई तो है किन्तु भीमा नहीं।
तू उधर गया तो नहीं ,घबराते हुए पंडितजी ने उसे अपने हाथों से अपने और करीब खींच लिया और धीमी आवाज करके बोले -तूने क्या देखा ?
मैं तो भीमा को आवाज लगा रहा था ,तभी मैंने देखा गाड़ी आधी घर के अंदर आधी बाहर है और मुझे किसी की गुर्राहट की आवाज आई ,तब मैं घबराकर पीछे हट गया ,ऐसे लग रहा था ,जैसे कोई जानवर चप -चप करके कुछ खा रहा हो। मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा इसीलिए ध्यान से देखने का प्रयास कर रहा था कि आखिर वो क्या बला है ? इस गली में तो देखो ! कितनी शांति है ?कुत्ते भी नहीं भोंक रहे वरना रात्रि में कोई दूसरे मोेहल्ले का भी घुस जाये वे भौंक -भौंककर उसके पीछे पड़ जाते हैं किन्तु यहाँ इतनी दूर से भी, उस जानवर के खाने की आवाज़ सुनाई पड़ रही है ,तब मुझे थोड़ा ड़र भी और शक़ भी दोनों हुआ। अब आप आ गए ,तो थोड़ी देर के लिए ,मेरे साथ चलिए !भीमा को लेकर आ जाऊंगा।
नहीं रे ,मतलू ! उस स्थान पर अब तेरा जाना भी खतरे से खाली नहीं ,कहते हुए पंडितजी उसका हाथ पकड़कर खींचते और उस स्थान से दूर चल देते हैं।

