जमींदार साहब , कुंभर्क को उसकी मौत के भय से उसे जंगल में छोड़ आते हैं ,इस बीच वो एक मानव का मांस और रक्त भक्षण करता है। जिस कारण से उसके अंदर कुछ शक्तियाँ भी आ जाती हैं ,और उसकी बुरी शक्तियां बढ़ने के कारण ही ,अब वो अपने घर में ,अंदर नहीं जा सकता था। उसे जमींदार साहब पर क्रोध भी है क्योकि अब उसे दिन में निकलने से परेशानी और होने लगी है।जब वो अपने घर पहुंचता है ,तब घर के अंदर प्रवेश नहीं कर पाता। तब जमींदार साहब उसे मकान के पीछे स्थान में रात्रि बिताने के लिए जगह ठीक करवाई। वो अब समझ गए थे कि इस पर शैतान हावी हो चुका है इसीलिए उसे समझाया। जैसा वो अब दिख रहा है ,ऐसा ही रहे ,शैतान को अपने पर हावी न होने देना वरना उसका ही नहीं हमारा भी इस गांव में रहना दूभर हो जायेगा।
रात्रि में ,स्वतः ही उसका रूप बदलने लगा वो भी कैसे ?अपने पर नियंत्रण रखता ,जब उसे एक तरह से देखा जाये तो रात्रि में शैतान बन जाने का श्राप मिला हुआ है। माता -पिता भी अपने मकान में बंद हो जाते हैं।आज पूर्णिमा की रात्रि है ,आज ही के दिन तो कुंभर्क का जन्म हुआ था किन्तु अभी चाँद आकाश में नहीं चढ़ा है ,बादल भी ,आज चाँद को घेरे हुए हैं। उस अंधकार में उसका शैतानी रूप बढ़ गया है ,वो बाहर निकलता है किन्तु एक दायरे में ही रह जाता है ,उससे आगे नहीं जा पाता ,वो घर में बंद होने वाली शक्ति नहीं थी। गांव ऐसा तो नहीं कि बिल्कुल ही सुनसान हो इंसानी रक्त की महक उसे अपनी और खींच रही थी। अभी तक गांव में उन पंडितजी के सिवा किसी को भी ,उसके इस रूप की जानकारी नहीं थी। यहाँ तक की उनके नौकरों को भी ,जमींदार साहब इसीलिए उनको रात्रि में अपने घर में रहने ही नहीं देते किन्तु आज 'भीमा 'उनके घर के बाहर ही आ गया।
जमींदार साहब !जमींदार साहब !जरा दरवाजा खोलिये !
उन्होंने खिड़की में से ही ,उसकी समस्या जाननी चाही ,भई ,कौन हो ?इतनी रात गए ,यहाँ क्यों आये हो ?
जमींदार साहब !मैं भीमा !
इतनी रात्रि यहाँ क्या करने आये हो ?मैं रात में किसी को भी यहां आने नहीं देता ,क्या तुम जानते नहीं ?
तब उसने बताया -मेरी पत्नी बहुत बिमार है, उसको लेकर शहर जाना है ,इसीलिए अपनी गाड़ी दे दीजिये।
पूरे गांव में जमींदार साहब के पास ही गाड़ी थी ,जिसे वो देर -सवेर ,जरूरत पड़ने पर, गांववालों को दे दिया करते थे। किन्तु आज समय ऐसा पड़ा है उसका कुछ अच्छा सोचना भी व्यर्थ है ,क्योकि गाड़ी तो ,घर के उसी हिस्से में है ,जहाँ कुंभर्क पहले से ही अपने शैतानी रूप में होगा। इस वक्त वो अपनी उम्र से भी बड़ा हो जाता है। सभी बातें सोचते हुए ,जमींदार साहब ने उसे गाड़ी देने से इंकार कर दिया।
ये आप क्या कह रहे हैं ?मेरी पत्नी की तबियत बहुत ख़राब है ,आज तक आपने किसी को मना नहीं किया ,तब मुझे ही क्यों इंकार कर रहें हैं ?उसने गिड़गिड़ाते हुए पूछा।
अब अपनी बेबसी उसे कैसे बतलायें ?वो भी अपनी जान बचाये और अपने को अपने ही घर में छिपाये बैठे हैं ,उन्हें अपने ही बेटे से, मौत का ख़तरा है ,अपनी ही नहीं ,दूसरों की भी जान की उन्हें परवाह है । तब उन्होंने अपने दिल को कठोर बनाते हुए कहा। अब ये सही समय नहीं है। कल ले जाना ,मैं मना थोड़े ही कर रहा हूँ।
नहीं ,वो तो दर्द से कराह रही है।
जमींदार साहब ! झल्लाकर बोले -आज पूर्णिमा है ,तब भी बादल छाये हैं ,ये शुभ मुहूर्त नहीं है। कल ले जाना। अब गांव के ही वैद्य को दिखला दो !
वैद्य जी ने ही तो , कहा है ,कि अब इसका इलाज बाहर ही होगा ,बाहर के किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाओ ! बिमारी में कौन शुभ मुहूर्त देखता है ? आप मुझे गाड़ी दे दीजिये ताकि मैं अपनी पत्नी को समय पर लेजाकर उसे दिखा सकूँ।
जमींदार साहब तो स्वयं ही परेशान ,उससे कैसे कहें ?यदि वो उधर गया तो पत्नी को बचाने के लिए ,ये ले जाने लायक बचेगा भी या नहीं। नहीं ,अभी नहीं कल ले जाना कहकर उन्होंने अपनी खिड़की बंद कर ली। आज उनकी कठोरता ही उसे बचा सकती है ,सोचते हुए उन्होंने उसके साथ ऐसा व्यवहार किया।
भीमा, उनके इस व्यवहार से बहुत आहत हुआ ,उसे इस समय अपनी पत्नी की सेहत दिख रही थी ,जमींदार साहब से तो वो बाद में भी निपट लेगा। अपनी पत्नी की परेशानी सोचकर ,उसने फिर से दरवाजा खटखटाया किन्तु जमींदार साहब ने दरवाजा नहीं खोला ,उन्होंने सोचा ,कुछ देर पश्चात, निराश होकर चला जायेगा। किन्तु ''जो सोचते हैं ,वो होता नहीं है ,जो नहीं सोचा होता ,या हम सोचना भी नहीं चाहते वही हो जाता है।'' भीमा जानता था -जमींदार साहब ,गाड़ी की चाबी कहाँ रखते हैं ? इतने वर्षों से उनके यहाँ काम कर रहा है। कई बार गाड़ी लेकर शहर भी गया है और शहर से सामान भी लाया है किन्तु आज उसे अपने लिए जरूरत आन पड़ी ,वो इस तरह निराश होकर नहीं बैठ जायेगा।
भीमा घर के पीछे की तरफ जाता है ,अँधेरी रात्रि है ,हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा किन्तु उसे पीछे के दरवाजे की तरफ से कोई आहट सुनाई देती है ,उसे लगता है ,शायद यहाँ कोई है। उसने दरवाजा धीरे -धीरे खटखटाया ताकि कोई हो तो दरवाजा खोल दे। आवाज इसीलिए धीमी थी ,ताकि जमींदार साहब को पता न चल जाये ,मैं उनसे बिना पूछे गाड़ी ले जाने वाला हूँ। अंगूरी को तो बचाना ही होगा , जमींदार साहब को तो पता ही नहीं चलेगा ,मैं गाड़ी लेकर गया था ,वापस लेकर यहीं खड़ी कर दूंगा। यही सोचकर उसने घर के पीछे के हिस्से का दरवाजा खटखटाया किन्तु उधर से कोई जबाब नहीं आया। तब भीमा ने देखा दरवाजा तो बाहर से ही बंद है। उसने आव देखा न ताव और दरवाजा खोल दिया।
जैसे ही वो दरवाजा खोलता है ,उसे किसी के होने का आभास होता है ,दबे कदमों से सतर्कता से आगे बढ़ता है ,वो आवाज की तरफ ध्यान देता है ,जैसे किसी की गुर्राहट हो ,कोई जानवर तो इधर नहीं आ गया जबकि दरवाजा तो बंद था सोचते हुए ,वो चाबी वाले स्थान की तरफ बढ़ता है।

