Shrapit kahaniyan [part 33]

जमींदार साहब अपने बेटे ''कुंभर्क '' को मेला दिखाने के बहाने ले जाते हैं किन्तु जब वापस लौटते हैं ,तब उनके संग 'कुंभर्क ' नहीं होता। जब उनकी पत्नी इसका कारण पूछती है ,तब वो कह देते हैं ,वो मेले में कहीं खो गया ?बहुत ढूंढा किन्तु मिला नही ,माँ की तो अपने बेटे के कारण हालत खराब हो गयी। 

चहुँ ओर बर्फ ही बर्फ़ ,ठंड में कोई -कोई इंसान ही नजर आ रहा है ,वहाँ रहने वालों को तो निकलना ही पड़ता है। हिमाचल की वादियों में ,एक उजड़ा सा गांव वहाँ कुछ लोग नजर आ रहे हैं। कहते हैं ,एक हजार वर्ष पहले यहाँ एक भरा -पूरा गांव था ,इस गांव के लोग एक से एक शक्तिशाली अद्भुत शक्तियों के मालिक थे किन्तु ये गांव भी एक शाप के कारण जमीन में धंस गया ,अब कुछ घर ही यहाँ बसे हैं कुछ लोग घूमने के उद्देश्य से ,बर्फ देखने के लिए भी यहाँ आ जाते हैं। उन्हीं बर्फीली वादियों में उस गांव से कुछ दूरी पर ,एक लड़का अपने कुछ दोस्तों के साथ खड़ा बातें कर रहा है। यार...... ये तेरा केेसा नाम है ?'' कुंभर्क '' कुछ अलग नहीं है ,आज के समय में ऐसा नाम कौन रखता है ?


मैं भी तो कुछ अलग ही हुँ ,तभी तो मेरा नाम मेरे माता -पिता ने विशिष्ट रखा। विशिष्ट  नहीं ,कुंभर्क है कहकर अमन  हंसने लगा। 

तू नहीं सुधरेगा ,कहकर कुंभर्क ने उसकी कमर में एक मुक्का जमा दिया। 

क्या यार.... ?तू क्या मेरी कमर तोड़ने वाला था ?मैं तो मज़ाक कर रहा था ,तूने तो मेरी कमर ही तोड़ डाली। 

मैंने तो आराम से ही मारा था, प्यार से....... गुस्से से मारा ,तो तू झेल ही नहीं पायेगा। 

हाँ यार.... ये तो है ,तू खाता क्या है ?तुझमें न जाने इतनी ताकत कहाँ से आती है ?कहते हुए ,हिमांशु उसके हाथ अपने हाथों में लेता है और उनका आकार नापने लगता है।  

हिमांशु की बात सुनकर ,कुंभर्क जहरीली मुस्कान से मुस्कुराया अब वो पहले से बहुत ही चालाक और तेज दिमाग़ हो  गया है ,पहले उसे स्मरण ही नहीं रहता था कि रात्रि में उसके साथ क्या हुआ ?या उसने क्या किया ?उसे अब सब स्मरण रहता है ,वो कब क्या कर रहा है ?जब से उससे वही तांत्रिक मिलकर गया जिसने  उसे इस'' भूलोक ''में लाने का षड़यंत्र रचाया था । 

जी हाँ ,ये वही ''कुंभर्क ''है ,जो जमींदार साहब से बीस बरस पहले मेले में छूट गया था ,आज ये कुंभर्क तेईस वर्ष का हो गया है। उसकी कद -काठी ,बहुत ही मजबूत है ,अपने साथ के लड़कों से उसका कद ,उनसे अधिक ऊँचा था। पहले से कहीं अधिक आकर्षक और गठीला बदन हो गया है। चेहरा इतना आकर्षक की लड़कियां देखते ही मर मिटें ,ताकत इतनी कि अपने  साथ के आठ -दस लड़कों को तो चुटकियों में ही गिरा दे। इसीलिए तो दसवीं कक्षा से ही, कुश्तियों में आज तक अव्वल आता रहा है। ऐसी कुश्तियां भी उसने लड़ी हैं जिसने भी उससे दुश्मनी की है। उसे जान से भी हाथ धोने पड़े ,वो दुश्मन न जाने रातों -रात कहाँ गायब हो गया ?आज तक किसी को सुराग नहीं मिला।आज अपने जीवन में पढ़ाई में मस्त है। 

आज से बीस बरस पहले जब उसके पिता यानि जमींदार साहब उसे मेले में भूल आये या फिर जानबूझ कर छोड़ आये किन्तु उनकी पत्नी के लिए तो वो उनका लाल था ,ये जानते  हुए भी, कि वो कभी अपना सगा नहीं होगा, फिर भी पुत्र मोह के कारण वो रोती हैं। दरअसल हुआ यूँ था ,जब पंडित जी ने ,जमींदार साहब से उसे मारने के लिए कहा तो ,उनकी रातों की नींद उड़ गयी। जिस पुत्र को अपने रक्त से सींचा ,उस पुत्र को कैसे मार दें ? तब उन्होंने एक उपाय सोचा ,इसे मेले में लेजाकर किसी  निर्जन स्थान पर छोड़ आता हूँ। कम से कम ये जिन्दा तो रहेगा ,किन्तु वो ये बात भूल गए ,कहीं उसे इंसानी खून मुँह न लग जाये। जब उन्हें ये बात स्मरण हुई ,तो बेहद घबरा गए। तुरंत बाहर जाने का साहस तो नहीं हुआ किन्तु अगले दिन प्रातःकाल ही उसे ढूंढने उसी स्थान पर पहुंच गए किन्तु कुंभर्क कहीं नहीं मिला। 

उदास और निराश मन से वो वापस आ गए ,तीन दिन हो गए किन्तु कुंभर्क का किसी को कुछ भी नहीं पता चला ,एक दिन खबर सुनने में आई ,गांव से दूर एक जंगल में एक इंसान की दर्दनाक मौत ! न जाने किस जानवर ने उसे खाया है ? बड़ी ही दर्दनाक मौत हुई है। 

इस खबर से ,वो बेहद चिंतित हो गए और सोचने लगे ,उस इंसान की मौत का कारण मैं ही हूँ किन्तु कुंभर्क का अभी भी , कुछ पता नहीं चला। घर में आने पर ,अब तो उन लोगों को भी उससे खतरा हो सकता है। उनके अंदर अंतर्द्व्द चल रहा था ,एक मन कहता ,कि अपने बच्चे को ढूँढ़े और अपने पास ले आएं ,तभी मन बदल जाता और कहता ,जो भी हुआ अच्छा ही हुआ ,जितना जल्दी हो सके मुसीबत टली ,गांववालों को पता चल जाता ,वे तो ,उसे वैसे ही मार डालते। 

सात दिन हो गए ,अब जमींदार साहब ने उसके आने की उम्मीद भी छोड़ दी थी ,तभी एक दिन शाम को घर के दरवाजे पर किसी की परछाई दिखलाई दी। जमींदार साहब ,जैसे ही दरवाजे पर गए तो यह देखकर दंग रह गए ,दरवाजे पर ''कुंभर्क ''बैठा है। उन्हें देखते ही ,वो उन्हें जलती नजरों से देखने लगा क्योंकि वो जानता था -'उसे जमींदार साहब जानबूझकर उस जंगल में अकेला छोड़ आये थे।' रात्रि में तो उसे कोई दिक्क्त नहीं हुई ,रात्रि में उसने भरपेट भोजन किया किन्तु दिन निकलने पर उसे परेशानी हो रही थी। उस घने जंगल में , वहाँ  के पंछियों को भी उसके रहने का आभास हो गया ,वे भी वहां से उड़ गए। दो दिन वो ,ऐसे ही उस जंगल में भटकता रहा ,रात्रि में न जाने किसकी मौत आई थी ,जब उस पर शैतान का साया था ,तभी वो इंसान उसके सामने आ गया ,आज पहली बार उसने वो इंसानी लहु चखा था। उसके चखते ही ,उसमें एक और शक्ति जाग्रत हुई ,उसकी याददाश्त और  तीव्र हो गयी और उसे सब कुछ स्मरण हो  गया ,उसे पता चल चुका था ,उसके पिता ने ही ,उसको जानबूझकर इस जंगल में छोड़ा है किन्तु उस रात्रि के पश्चात , उसका उस जंगल में रहना भी मुश्किल हो गया। दिन की रौशनी और धूप उसके तन में जलन पैदा कर रहीं थीं।


 

पुलिस भी उस लाश के कारण ,उधर खोजबीन में लगी थी। उसे छुपना मुश्किल हो रहा था ,घर का रास्ता तो उसे स्मरण था किन्तु दिन में कैसे जाये ?रात्रि में ,गांव में घुसे तो उसका अलग ही रूप होता। छुपते -छुपाते किसी तरह अपने घर के करीब आ भी गया किन्तु घर के अंदर नहीं जा पा रहा था। अब वो नरभक्षी हो चुका था ,पूरा शैतान बन चुका था ,घर के मंदिर का सकारात्मक प्रकाश का घेरा बढ़ गया था ,जो अब उसे अंदर नहीं आने दे रहा था। जिसके कारण वो अपने ही घर में नहीं घुस पा रहा था। अपने पिता को देखकर  उसे क्रोध  तो आया किन्तु तभी माँ के आने पर वो शांत हुआ ,रात्रि बढ़ने वाली थी  पिता को जब मालूम हुआ कि अब वो घर के अंदर नहीं रह पायेगा ,तब उसके लिए , घर के पीछे ही ,उसके रहने के लिए स्थान बनवा दिया और उससे मना किया कि अपनी भावनाओं को वश में रखे।अपने शैतानी रूप को हावी मत होने देना।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post