''मीडिल क्लास ''कहने से भी ,थोड़ा स्तर बढ़ा सा लगता है किन्तु ''मध्यमवर्गीय'' कहने मात्र से ही एक तस्वीर उभर कर सामने आती है -''एक साधारण सा परिवार ,अपनी इच्छा और आवश्यकताओं से जूझता परिवार !जो ''हाई क्लास ''को देखकर उनकी बराबरी करने का प्रयास करता है किन्तु कर कुछ नहीं पाता। सम्पूर्ण जीवन आगे बढ़ने की होड़ में गंवा देता है ,किन्तु सीमित साधन उसे उस दलदल से निकलने नहीं देते। वो भी सपने देखना नहीं छोड़ता। एक ऐसा इंसान जिसके सर पर सम्पूर्ण घर की ज़िम्मेदारी हैं।
सभी की इच्छाओ का बोझ भार भी उसके कंधों पर है ,कभी -कभी पत्नी भी उसका सहारा बनने का प्रयास करती है किन्तु उस छत का स्वरूप बदल नहीं पाती। ''जुगाड़ ''करना भी शायद ,मध्यवर्गीय परिवार की ही देन है।'' जुगाड़ ''करके कुछ आवश्यक्ताओं को पूर्ण करने का प्रयास करता है। समय पर बिल ,किस्तें ,किराया और कर भी वही देता है किन्तु अभावों की गहरी होती खाई को पाट नहीं पाता ,प्रयासरत अवश्य रहता है। ये उसके संघर्ष और सहनशीलता की परीक्षा होती रहती है।
वो चक्की के दो पाटों की तरह होती है ,''दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय। ''भीख मांग नहीं सकता ,चोरी -चकारी उसके संस्कारों में नहीं। किसी का भला नहीं कर पाता तो बुरा भी नहीं सोचता किन्तु पत्नी और बच्चों के लिए वो बेहतर इंसान नहीं। ऐसे में न जाने कैसे ?उस पर ईमानदारी का भूत जो सवार रहता है।
मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चे भी जुगाड़ से ,या परिस्थितिवश आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं और पत्नी भी कम से कम में बेहतर ,करने का प्रयास करती है। जब कुछ अच्छा हो जाता है ,तब यही लोग खुश होकर एक गहरी नींद भी ले लेते हैं। ''
