Kiski dulhan [part 20]

'रक्षक मंडल 'का नेता मोहिनी की परीक्षा के लिए कहता है ,मोहिनी और भानु कुछ भी नहीं समझ पा रहे थे आखिर ये कैसी परीक्षा है ?जैसे ही मोहिनी को उस कलश को छूने के लिए कहता है ,तभी में 'सभा कक्ष' में 'विक्रम राजवीर प्रवेश करता है और कठोर शब्दों में मोहिनी को परीक्षा देने से इंकार करता है। 

विक्रम के ऐसे आदेश से उस कक्ष में ऐसा सन्नाटा छा गया था, कि मशालों की लपटों की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी। दरवाज़े पर खड़े विक्रम राजवीर की नज़र सीधे 'रक्षक मंडल' के नेता पर टिकी थी।कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। 


फिर नेता ने धीरे-धीरे विक्रम के सम्मान में अपना सिर झुकाया और बोला - आपको यहाँ नहीं आना चाहिए था... विक्रम जी।"

विक्रम की आवाज़ पहले से शांत थी,उस नेता की बात सुनकर बोला - और तुम्हें मेरे परिवार के सामने यह परीक्षा का नाटक नहीं करना चाहिए था।"

रत्न प्रताप ने पहली बार ध्यान से अपने छोटे भाई को देखा ,अट्ठाईस साल...इतने वर्षों पश्चात अपने छोटे भाई को देख रहा था,' अब विक्रम के चेहरे पर उम्र की लकीरें आ गई थीं, बालों में भी चांदी झलक रही थी  लेकिन उसकी आँखों में ,आज भी वही दृढ़ता थी। फर्क सिर्फ़ इतना था...पहले उन आँखों में मासूमियत थी।आज उनमें एक ऐसा बोझ था, जिसे शायद वर्षों से कोई नहीं समझ अथवा पढ़ नहीं पाया था।

अपने पिता को साथ में खड़े देखकर भानु ने राहत की साँस ली और बोला -"पापा... कहते हुए ,वह आगे बढ़ ही रहा था। 

तभी विक्रम ने हाथ उठाकर उसे, वहीं रुकने का इशारा किया।अपनी जगह से एक कदम भी आगे मत बढ़ाना !

अपने पिता के इस तरह रोके जाने पर भानु चौंक गया ,लेकिन पापा !"

भानु इससे पहले कि अपना वाक्य पूर्ण कर पाता ,विक्रम बोला - मैंने जो कहा है ,उतना ही करो !"विक्रम की आवाज़ इस बार आदेश था ।

मोहिनी  ने पहली बार महसूस किया, कि जो भानु,  हर किसी के सामने बेखौफ़ खड़ा रहता था...आज अपने पिता के सामने एकदम शांत खड़ा हो गया था।

'रक्षक मंडल' का नेता धीरे-धीरे चलकर विक्रम के पास आया और बोला -आज की सभा अधूरी रह गयी  ।"आठवीं कुर्सी अभी भी खाली है ।"हमें सिर्फ़ अपना कर्त्तव्य निभाना था।"

विक्रम ने उसकी बात बीच में ही काट दी।"कर्त्तव्य ?"या फिर...तीस साल पुरानी गलती दोहराने की तैयारी?"

नेता कुछ क्षण चुप रहा,फिर बोला—गलती, उस दिन गलती ''रत्न प्रताप राजवीर '' के नियम तोड़े जाने के कारण हुई थी। और आज...उनका बेटा, वही गलती दोहराने जा रहा था।"कमरे में अचानक खामोशी छा गई।

भानु की भौंहें सिकुड़ गईं ,उनका बेटा?'उसने तुरंत रत्न प्रताप की ओर देखा। उन शब्दों से अब तक  रत्न प्रताप के चेहरे के भाव भी बदल चुके थे।

उन्होंने धीमे लेकिन सख्त स्वर में नेता की तरफ देखते हुए कहा—अपनी ज़ुबान संभालकर बात करो !

नेता मुस्कुराया,मैंने किसी का नाम नहीं लिया ,कहते हुए उसने अपना बचाव किया। 

भानु का मन बेचैन हो उठा,उसे पहली बार लगा...जैसे हर व्यक्ति आधा सच बोल रहा है। कोई भी पूरी बात नहीं बता रहा है। वह ऊँची आवाज़ में बोला—"बस !"अब बहुत हो चुका,"कोई मुझे साफ़-साफ़ बताएगा कि आखिर यहाँ हो क्या रहा है ?"रत्न प्रताप  कौन हैं ?"रक्षक मंडल क्या है ?और हर कोई मोहिनी  के पीछे क्यों पड़ा है?"उसकी आवाज़ सभा कक्ष में गूँज गई ,लेकिन जवाब फिर भी किसी ने नहीं दिया।

विक्रम धीरे-धीरे गोल मेज़ के पास पहुँचे ,उन्होंने उस लोहे के संदूक को देखा, जिसे कुछ देर पहले भी उस  नकाबपोश आदमी ने बाहर निकालकर देखा था। विक्रम ने ढक्कन खोला ,उसके अंदर अब सिर्फ़ सात लिफ़ाफ़े बचे थे ,आठवाँ गायब था।

विक्रम की आँखों में एक पल के लिए चिंता चमकी,उन्होंने बिना किसी को बताए,एक गहरी साँस ली और मन ही मन सोचा -"तो इसका मतलब है ,उसने सचमुच भानु तक वह लिफ़ाफ़ा पहुँचा दिया...."यह बात किसी और ने नहीं सुनी।

उधर भानु, अनजाने में अपनी जैकेट की जेब पर हाथ रख बैठा ,उसे तभी याद आया...भागते समय वो  नकाबपोश आदमी उससे टकराया था।क्या उसी समय...उसने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा था? भानु  ने चुपचाप धीरे से अपनी जेब टटोली ,लिफ़ाफ़ा अब भी वहीं था किन्तु भानु ने, किसी को कुछ नहीं बताया।

मोहिनी अब तक शांत रहकर सब कुछ ध्यान से देख रही थी ,उसे महसूस हुआ...विक्रम की नज़र बार-बार भानु  की जेब पर जा रही थी ,लेकिन वे जानबूझकर उस विषय को छेड़ नहीं रहे थे ,क्यों?यही सवाल उसके मन में घूमने लगा।

रत्न प्रताप अचानक आगे बढ़े और बोले "विक्रम ! आज बीसियों साल बाद उन्होंने, अपने छोटे भाई का नाम लिया था।सभा कक्ष में मौजूद सभी लोग उनकी ओर देखने लगे। तब वो बोले - अगर तुम्हारे भीतर अभी भी थोड़ा-सा भी, वही पुराना विक्रम ज़िंदा है ...तो आज सबको सब कुछ सच -सच बता दो !"

विक्रम की आँखें धीरे-धीरे रत्न प्रताप से मिलीं ,उनमें दर्द भी था...और पछतावा भी ,उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा—"काश..."...सच बोलना ,इतना आसान होता।"

इतने में' सभा कक्ष' की एक मशाल अपने-आप बुझ गई ,फिर दूसरी ,फिर तीसरी इस तरह पूरा कमरा धीरे-धीरे अँधेरे में डूबने लगा।

नेता तुरंत सतर्क हो गया और बोला -"सभी लोग, अपनी जगह पर रहें! उसने आदेश दिया ,लगता है ,कोई बाहर से अंदर आया है। सातों नकाबपोशों ने तुरंत अपने-अपने हथियार निकाल लिए।

विक्रम ने भानु और मोहिनी को अपने पीछे कर लिया।

रत्न प्रताप ने, भी दीवार की ओर पीठ लगा ली।अब कमरे में सिर्फ़ दो मशालें जल रही थीं ,उनकी  धुंधली रोशनी में...'सभा कक्ष' के ऊपर बने पुराने झरोखे से एक काला साया तेजी से नीचे कूदा -धप्प! 

वह इतनी फुर्ती से उतरा कि किसी को संभलने का मौका ही नहीं मिला। उसके चेहरे पर भी मुखौटा था ,लेकिन यह मुखौटा बाकी सबसे अलग था।पूरी तरह काला ! बिना किसी निशान के किन्तु उसने किसी पर भी हमला नहीं किया। सीधे गोल मेज़ तक पहुँचा...और वहाँ रखी एक पुरानी चमड़े की डायरी फुर्ती से उठा ली।

आश्चर्य मिश्रित परेशानी से रत्न प्रताप की आँखें फैल गईं और चिल्लाया - नहीं!"वह डायरी नहीं! तुम इसे नहीं ले जा सकते। 

काले मुखौटे वाले ने एक पल के लिए रत्न प्रताप  की ओर देखा और फिर बहुत धीमी आवाज़ में सिर्फ़ एक वाक्य कहा—अगर यह डायरी किसी भी गलत हाथों में पड़ गई... तो पूरा राजवीर वंश मिट जाएगा।"

यह कहकर उसने अपनी कमर से धुएँ का एक छोटा-सा गोला ज़मीन पर फेंक दिया। फुस्स्स्स...की आवाज के साथ कुछ ही सेकंड में, पूरा सभा कक्ष घने धुएँ से भर गया। धुएं ने अपना असर दिखाया ,किसी को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।

मोहिनी  ने, अनायास भानु का हाथ कसकर पकड़ लिया ,लेकिन अगले ही पल...उसे एहसास हुआ...जिस हाथ को वह पकड़े हुए थी...वह भानु का नहीं था ,वह किसी और का हाथ था और उसी अजनबी हाथवाले  ने उसके कान के पास झुककर बहुत धीमी आवाज़ में कहा—"अगर ज़िंदा रहना चाहती हो... तो आज रात अपने पति पर भी भरोसा मत करना।"उसकी ये चेतावनी सुनकर मोहिनी का पूरा शरीर सिहर उठा।


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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