Shrapit kahaniyan [part 31]

आज रात्रि को ,सही बात की जानकारी लेने के लिए ,कुंभर्क की माँ ने दूध नही  पीया ,जो उसके पति बनाकर देते थे ,उसको पीते ही उन्हें रात्रि में पता ही नहीं चलता था, क्या हो रहा है ?क्योंकि उनके पति उसमें  दवाई जो मिला देते थे। आज उनके दूध न पीने के कारण ,थोड़ी आहट से ही  उनकी नींद खुल गयी। उन्होंने देखा , कुंभर्क के शरीर में बदलाव हो रहा है ,उसका इंसानी रूप कुरूप हो गया है ,जितना बड़ा वो दिन में दीखता है ,उससे उसका शरीर दूना बड़ा हो गया है। वो बाहर निकल जाता है ,तब उसकी माँ भी उसके पीछे -पीछे जाती है ,ये देखने के लिए कि बाहर जाकर कुंभर्क क्या करता है ?ये तो वो जान चुकी थीं ,इस समय वो शैतान के वश में है उसके बाहर निकलते ही ,जैसे ही वो भी बाहर निकलतीं हैं ,तभी पीछे से कोई उनका हाथ पकड़ लेता है। वो तो पहले से ही डरी हुई थीं ,इस तरह हाथ पकडने से ,उनकी चीख़ निकलने ही वाली थी ,तभी किसी ने पीछे से उनके मुँह पर हाथ रख दिया।


 

वो फटी -फटी आँखों से अपने बेटे को दरवाज़े से बाहर जाते देख रहीं थीं ,उसके ओझल होते ही ,तभी उनके मुँह से हाथ हट गया। उन्होंने पलटकर देखा ,और बोलीं -जमींदार साहब आप...... तभी हकलाती सी बोलीं -आपने देखा ,हमारा बेटा..... 

हाँ ,मैं जानता हूँ ,हताश होकर वो बैठे और बोले -मैं अपने बेटे को पल -पल बढ़ते भी देखता हूँ और उसे शैतान बनते भी देखता हूँ। तुम तो सो जाती हो ,किन्तु मैं उसके लिए जागता हूँ ,ये देखने के लिए कि हमारे पालने पर भी वो ,कैसे अपने असली रूप को भूल जाता है ?इसीलिए रात्रि को इस घर में हम दोनों के सिवा इस घर में और कोई नहीं होता। तुम पूछती थीं न....... तुम रात्रि में सभी नौकरों की छुट्टी क्यों कर देते हो ? मैं सोचता हूँ ,उसका जबाब तुम्हे मिल ही गया होगा।अभी ये बात, मैं बाहर किसी को भी जानने देना नहीं चाहता। पता नहीं ,लोग हमारे बच्चे के साथ क्या करेंगे ?सोचकर ही सिहर उठता हूँ। जैसे -जैसे ये बड़ा होता जा रहा है ,वैसे -वैसे हमसे बिछुड़ने का समय भी करीब आता जा रहा है। 

नहीं ,इतने वर्षों पश्चात ,हमने क्या उससे बिछुडने के लिए ही ,इतनी मेहनत की थी ,अपने रक्त का  एक -एक कतरा  तक हम देने को तैयार थे और ये दिन भी देखने को मिलेगा ये नहीं सोचा था ,कुंभर्क की माँ गिड़गिड़ाते हुए बोली। 

तुम सही कह रही हो ,असल में धोखा तो हमें उस क्रूर तांत्रिक ने दिया ,हमारे अंदर उम्मीद की लौ जलाकर वो उस आग में अपने हाथ तापना चाहता था किन्तु उसका भी भला नहीं हुआ। हो सकता है ,आगे कोई परेशानी आये अब हमें  हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना होगा। वो तो भला हो पंडित जी का उन्होंने हमें उस तांत्रिक के मंसूबों से अवगत करा दिया। ये सब हम उस तांत्रिक के कहने पर ,चुपचाप ही कर रहे थे। एक औलाद पाने के मोह को हम त्याग जो नहीं सके ,उसी मोह का उस तांत्रिक ने लाभ उठाया। कहते  हैं ,न..... हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है। हो सकता है ,हमें भी औलाद के मोह की क़ीमत चुकानी पड़ जाये ,कभी अपनी जान देकर भी.......  कहते हुए , विवशता से अपनी पत्नी की तरफ देखा।

 फिर बोले - तुमने जो उस दिन ,उसे छत पर चलते ,दीवार पर चढ़ते देखा था ,वो सब सही था किन्तु मैं नहीं चाहता था , अभी तुम अपने बच्चे का ये रूप भी देखो और जो ममता तुम्हारे अंदर हिचकोले खा रही है। वो दहशत में बदल जाये।तुम नहीं जानती ,वो बाहर जाकर मांस भक्षण करने लगा है। 

क्या?????वो आश्चर्य से बोलीं। 

हाँ ,एक दिन मैंने उसे एक पंछी खाते देखा ,वो अपने आप ही छत पर चला जाता है और जो भी उसे खाना होता है खाता  है। 

आपने उसे डांटा नहीं ,आखिर वो हमारा बेटा है ,उसको किसी भी गलत कार्य करने पर ,उसे रोकने -टोकने का हमारा अधिकार हैं ,आख़िर तुम उसके पिता हो। 

उस समय कोई भी ,उसका अपना नहीं है , हम भी नहीं ,दिन में ही हम उसके माता -पिता हैं ,रात्रि में शायद पहचानेगा भी नहीं ,बस मुझे एक ही फिक्र है ,अभी वो छोटे पंछी या जीव खाता है ,उसके मुँह कहीं इंसानी खून न लग जाये। तब यहाँ रहना ही मुश्किल हो जायेगा ,तब शायद ये हमें भी न पहचाने दोनों पति -पत्नी चिंतित अपने बच्चे की प्रतीक्षा में वहीँ बैठे -बैठे सो गए। 

अगले दिन ,उन्होंने अपने ईश्वर की पूजा की और और गंगा जल पूरे घर में छिड़का। उसके कुछ छींटे उस बालक पर भी पड़े ,उनके पड़ते ही वो बुरी तरह से चीखा और उसके शरीर में ,जहाँ भी वो जल गिरा वहीं उस बच्चे के तन पर जख्म हो गए। दोनों पति -पत्नी परेशान होकर डॉक्टर के पास गए ,जब उन्होंने बताया -गंगाजल से उसको ये परेशानी हो गयी है । 


डॉक्टर भी उसकी बीमारी नहीं समझ पाया ,बल्कि उन दोनों पति -पत्नी की बात पर हंसा और कहने लगा ,भला गंगाजल से भी कहीं छाले या जख़्म होते हैं।  अंदाजे से ही ,उस बच्चे को  दवाई दे दी। तब दोनों पंडित जी से मिलने, उनके मंदिर में गए ,उन्हें देखते ही पंडितजी स्वयं ही मंदिर से  बाहर आ गए। ये बात जमींदार साहब को बहुत बुरी लगी और इसका कारण जानना चाहा ,पंडितजी से बोले -आप हमसे  मंदिर में क्यों नहीं मिलना चाहते थे ?  

पंडित जी ,ने कहा - मैं तो बुला लेता किन्तु  तुम्हारा ये बच्चा मंदिर के अंदर नहीं आ सकता था।

क्यों ?ये क्यों नहीं आ सकता ?जमींदार साहब नाराज होते हुए बोले। 

आप जानते हुए भी ,क्यों ,नादान  बन रहे हैं  ?

अभी तो दिन निकला है , अब रात्रि नहीं है ,जमींदार जी ने पंडित जी की बात को समझते हुए ,अपना पक्ष रखा। 

कोई बात नहीं ,दिन हो या रात्रि इसका मंदिर में आना वर्जित है ,पंडित जी ने दृढ़ता से जबाब दिया यदि आपको मेरी बात पर विश्वास न हो तो इसे अंदर लेकर देख लीजिये। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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