Pustakalaya

''पुस्तकालय '',स्कूल -कॉलिज में हो ,या घर में ,

सम्पूर्ण ज्ञान का ,अकूत भंडार छिपा है ,जिनमें ,

 लघु पुस्तकालय बनाया था ,मैंने भी अपने घर में ,

 सभी को ,अपने पसंद का ज्ञान मिलेगा , जिनमें ,


लोग बदले ,परिवेश बदला ,बदल गयी सोच जिसमे ,

ऐसा वातावरण बदला ,फोन पर मिली किताबें इसमें ,

धूल चढ़ी ,किताबें तकती मायूस नजरों से ,यूँ  मुझे 

प्रतिदिन धूल झाड़ी जाती ,पुनः धूल चढ़ जाती जिनमें ,

पुस्तकों ने लिया रूप नया ,डिजिटल बन गयी किताबें इसमें। 

लगता है , फोन ही , पुस्तकालय बन गया हो ,जैसे इसमें।


जीवन एक पुस्तकालय -


जीवन ही बना ,एक पुस्तकालय है ,

जीवन के पुस्तकालय में ,

पुस्तकें बनती हैं , दिलों पर छपती हैं । 

कुछ अधूरी रह जाती हैं। 

कुछ पुरानी ,स्मृतियों में रह जाती हैं। 

कुछ कसमसाती सी ,

पुरानेपन का पीलापन लिए जूझती हैं। 

इसकी  किताब में रहस्य ,

हर्ष है , प्रेम है ,दुःख है ,दर्द की भरमार है।

अकल्पनीय यात्रायें !

रोचक पुस्तकालय है ,अनहोनी घटनाएं हैं।

इस पुस्तकालय की प्रत्येक झलक,

फोन जैसे डिब्बे में बंद है ,जो हँसता रुलाता है।  

  

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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