''पुस्तकालय '',स्कूल -कॉलिज में हो ,या घर में ,
सम्पूर्ण ज्ञान का ,अकूत भंडार छिपा है ,जिनमें ,
लघु पुस्तकालय बनाया था ,मैंने भी अपने घर में ,
सभी को ,अपने पसंद का ज्ञान मिलेगा , जिनमें ,
लोग बदले ,परिवेश बदला ,बदल गयी सोच जिसमे ,
ऐसा वातावरण बदला ,फोन पर मिली किताबें इसमें ,
धूल चढ़ी ,किताबें तकती मायूस नजरों से ,यूँ मुझे
प्रतिदिन धूल झाड़ी जाती ,पुनः धूल चढ़ जाती जिनमें ,
पुस्तकों ने लिया रूप नया ,डिजिटल बन गयी किताबें इसमें।
लगता है , फोन ही , पुस्तकालय बन गया हो ,जैसे इसमें।
जीवन एक पुस्तकालय -
जीवन ही बना ,एक पुस्तकालय है ,
जीवन के पुस्तकालय में ,
पुस्तकें बनती हैं , दिलों पर छपती हैं ।
कुछ अधूरी रह जाती हैं।
कुछ पुरानी ,स्मृतियों में रह जाती हैं।
कुछ कसमसाती सी ,
पुरानेपन का पीलापन लिए जूझती हैं।
इसकी किताब में रहस्य ,
हर्ष है , प्रेम है ,दुःख है ,दर्द की भरमार है।
अकल्पनीय यात्रायें !
रोचक पुस्तकालय है ,अनहोनी घटनाएं हैं।
इस पुस्तकालय की प्रत्येक झलक,
फोन जैसे डिब्बे में बंद है ,जो हँसता रुलाता है।
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