सुबोध ,प्रभा को '' शेेफाली ''की कहानी सुना रहा था ,शैफाली से जुडी ''कुंभर्क ''की कहानी सुनाने लगा वो किस तरह एक -दूसरे को मिले। ''कुंभर्क'' के नाम का अर्थ के साथ -साथ क्या रहस्य है ?''कुंभर्क '''कुम्भ यानि घड़े में ही पैदा हुआ , अपनी माँ की कोख से नहीं वरन अपने माता -पिता के रक्त से उसके जीवन की उत्तपत्ति हुई। बाक़ी कार्य उन तांत्रिक बाबा ने किया। आधी रात्रि को ,जब उसका जन्म हो रहा था ,तब उन बाबा ने अपने मंत्रों से 'पूर्णिमा 'के चाँद को ढक कर अँधेरा करना चाहा किन्तु इस कार्य में वे विफ़ल हो गए क्योंकि कुछ पल के लिए ही वो ,चाँद को ढ़क पाए। इस बात से वे बाबा नाराज होकर चले गए। उन्होंने घर में किसी भी भगवान की पूजा अर्चना करने के लिए ,मना किया था किन्तु वे दम्पत्ति बहुत समय से भगवान की पूजा अर्चना करते चले आ रहे थे। बाबा के कहने पर ,पुत्र मोह के कारण ,कुछ दिनों के लिए घर में भगवान की आराधना बंद तो कर दी किन्तु कुंभर्क के पिता का मन नहीं माना इसीलिए बाहर जाकर पूजा करते।
उसी अर्चना का प्रताप था ,जो उन बाबा की तंत्र साधना से ''कुंभर्क ''ने जन्म तो ले लिया किन्तु पूरी तरह ,शैतान न बन सका। अभी वो बच्चा था ,उसके अंदर कुछ विचित्र शक्तियां थीं जो अभी तक जाग्रत नहीं हुई थीं। उसकी सुंदरता उसका सम्मोहन ही काफी था। बाबा तो नाराज होकर चले गए किन्तु उन्होंने उन दम्पत्ति को कुछ भी नहीं बतलाया ,कि वो एक शैतान का अंश है। उनके गांव में यह चर्चा 'जंगल में आग की तरह फैल गयी।' जो बरसों से संतान का मुख देखने को तरस रहे थे ,उनके यहाँ ईश्वर की कृपा से बहुत ही चमत्कारिक तरीक़े से पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है। एक दिन तय किया गया ,उस दिन हम अपने भगवान का स्वागत करेंगे और उन्हें उनके स्थान पर स्थापित करेंगे और अपने पुत्र का ''नामकरण संस्कार ''भी करेंगे।
यह सूचना उन पंडितजी के कानों तक भी पहुंची ,जिन्होंने भविष्यवाणी की थी -'' उनके भाग्य में , इस जन्म में ,संतान सुख है ही नहीं। ''इस बात से पंडितजी चिंतित भी हुए और सोच में पड़ गए।ये उन लोगों ने क्या अनर्थ कर डाला ? उन दम्पत्ति ने ,ये सूचना उन पंडित जी को भी दी और उन्हें अपने बच्चे के'' नामकरण संस्कार '' का निमंत्रण भी भेजा। पंडित जी ने यह निमंत्रण स्वीकार भी किया। नियत समय पर पहुंचकर ,पंडित जी ने उस बालक को देखा ,उसकी आँखों की क़शिश को देखा ,एक पल को तो वो स्वयं भी अपनी सुध -बुध सी खो गए ,वो भूल ही गए थे कि वो यहाँ किस उद्देश्य से आये हैं ?
उन दम्पत्ति को देखकर , पंडित जी ,कुछ कहते उससे पहले ही ,वो बोल उठे -पंडित जी !आपके कहेनुसार हमने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी ,कि हम कभी अपने पुत्र का मुख देख सकेंगे किन्तु भला हो उन बाबा जी का ,उन्होंने जो प्रक्रिया बताई ,वो थोड़ी कठिन प्रक्रिया तो थी किन्तु उसके आधार पर हमने इसका मुख देखा ,कहकर उन्होंने सारा किस्सा सुना दिया। बालक उनकी गोद में मुस्कुरा रहा था ,पंडित जी बोले -तुमने उस धूर्त की बात मानकर बहुत बुरा किया। वो तंत्र -मन्त्र करता है ,अपना लाभ देखता है। ये तो अच्छा हुआ इस पर पूर्णिमा के चाँद की सीधी रौशनी पड़ी ,उससे तुम लोग बच गए ,हो सकता है ,तुम उस श्मशान से वापिस ही न आते।
पंडित जी की बात सुनकर ,एक बारगी दोनों पति -पत्नी घबरा गए ,और बोले -क्या मतलब ??तब वे महाशय बोले -पंडित जी !इसमें भला ,उन बाबा का क्या स्वार्थ हो सकता है ?
अब मैं ,तुम्हें जो बतलाऊंगा ,तुम उस पर विश्वास नहीं करोगे ,''आदमी जब तक अपनी आँखों से नहीं देख लेता ,तब तक किसी भी बात पर उसका विश्वास करना मुश्किल होता है।'' जब तुम भी अपनी आँखों से देख लोगे तो विश्वास हो जायेगा। कहते हुए ,पंडित जी ने पूजन सामग्री मंगवाई और मंत्रों का जप करते हुए ,अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया। जैसे -जैसे पंडितजी मंत्र जप करते जा रहे थे ,वैसे -वैसे उस बच्चे की आँखों का तेज कमजोर होता जा रहा था। अब तो धीरे -धीरे वो रोने लगा। जैसे -जैसे पूजा आगे बढ़ती जाती उसका रुदन बढ़ता जाता। वो उस बच्चे को जितना चुप कराते ,उसका रुदन बढ़ता ही जाता। जैसे ही पूजा अपनी चरम सीमा पर थी ,उसके कर्ण लहुलूहान हो गए ,दोनों कानों से रक्त की धार बह निकली। ये देखकर ,वहां उपस्थित सभी लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ ,कैसा विचित्र बालक है ?मंत्रों के जाप से उसके कान रक्त -रंजीत हो गए। दोनों पति -पत्नी भी परेशान हो उठे और पंडित जी का चेहरा देखने लगे।
पंडित जी ने उन्हें ,शांत रहने को कहा ,पूजा समाप्त होने पर उन्होंने एक कच्चे सूत के धागे में कुछ गांठे बाँधी और उन्होंने उस बच्चे के हाथ में ,बाँधी ,बच्चे के धागा बंधते ही ,एकबारगी वो एकदम निश्चल हो गया। दोनों पति -पत्नी घबराकर पंडित जी का मुँह देखने लगे ,उन्होंने इशारे से उन्हें सांत्वना दिया। वो दोनों अपने बच्चे को लिए बैठे रहे किन्तु बच्चे में चेतना नहीं आई। उसकी माँ से रहा नहीं गया और रोने लगी ,पंडितजी !आपने अब इसे क्या कर दिया ? हमने कितने यत्नों से इसका मुख देखा था ?अभी उन्होंने इतना ही कहा ,बच्चे ने अपनी आँखें खोल दीं। उसके कानों से जो रक्त बह रहा था ,वो भी रुक गया। दोनों पति -पत्नी ने ,प्रसन्न होकर ,पंडित जी के चरण छू लिए.......
पंडित जी ,अब इसका ''नामकरण संस्कार ''आप ही कीजिये।
''कुंभर्क ''जी हाँ ,जैसे आपने इसके जीवन की अजीब गाथा मुझे सुनाई ,उस आधार पर इसका नाम भी ,अजीब ही होगा। ये विशिष्ट बच्चा है ,नाम भी विशिष्ट ही होगा।
कुंभर्क के माता -पिता ,अब संतुष्ट होकर ,पंडितजी से बोले -पंडित जी ,इसके भविष्य के विषय में कुछ बताइये !
तुम पहले इस बच्चे को इसके कमरे में सुलाकर ,आओ ! और इन मेहमानों को प्रसाद देकर भेजिए ,उससे पहले ,अपने मंदिर में अपने भगवान को स्थापित कीजिये ,आज उन्हीं की कृपा से ही तुम लोग ,ये सब देख पा रहे हो।

