Khushiyon ke karn...

 खुशियों , का वज़ूद हमसे है ,

हमसे ही नहीं ,हमारे व्यक्तित्व से है। 


किसी को खुश देखकर, मिलती है ख़ुशी !

किसी के साथ रहकर , मिलती है ख़ुशी !

किसी को साथ रखकर, मिलती है ,ख़ुशी !

अपना स्वार्थ पूर्ण होने पर ,मिलती है ,ख़ुशी !

किसी का साथ निभाकर  मिलती है ,ख़ुशी !

किसी के जख्मों को कुरेदकर मिलती है , ख़ुशी !

 मुस्कुराहटों में इजाफ़ा करके ,मिलती है ,ख़ुशी !

सितमग़र को, सितम करके ,मिलती है ,ख़ुशी !

कलाकार को अपनी कला में मिलती है ख़ुशी !


वजह -


तुझमें खुश रहने की वजह ढूंढता हूँ। 

तेरे अश्कों में ,तेरी ख़ुशियाँ ढूंढता हूँ। 

जुल्फों की छाँव में , साया ढूंढता हूँ।

तेरे दिल में , अपनी जगह ढूंढता हूँ।

 

ज़िंदगी में तेरे आने की वजह ढूंढता हूँ। 

तेरी रूह में समाने की जगह ढूंढता हूँ।

तेरे लिए  खुशियों की वजह ढूंढता हूँ। 

तुझमें अपना हमसफ़र दोस्त ढूंढता हूँ। 


अपने जीवन में तेरा वज़ूद ढूंढता हूँ।

तुझमे अपने इश्क़ का नूर ढूंढता हूँ।   

तेरे ख्वाबों की ताबीर ढूंढता हूँ। 

तुझमें इश्क़ का इल्म ढूंढता हूँ। 


 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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