Jail [part 86]

अमृता जी ,सलमा की कहानी सुनाती हैं ,कैसे ?सलमा छोटे -छोटे बच्चों को अगवा करती और  तांत्रिक के कहने पर उनकी बलि देती है | इस तरह उसे बच्चे चोरी  करते , कई दिन बीत गए। अब तो बच्चों के माता -पिता भी सतर्क हो गए और पुलिस भी चौकन्नी हो गयी।  सलमा परेशान थी ,उसे एक बच्चे की तलाश और थी ,उस बच्चे की तलाश में वो ,एक बगीचे में जाती है।  संयोग से उस बग़ीचे के नज़दीक एक पुलिसवाली लड़की का घर था ,उसे उस बगीचे में बैठी महिला पर ,शक हो जाता है और उस पर निग़ाह रखती है। तब वो अपने ही घर की एक बच्ची को बाहर बगीचे में खेलने के लिए ,भेज देती है। जैसे -''शेर को पकड़ने के लिए बकरी को चारा बनाया जाता है। ''


सलमा  लगभग पकड़ी जाती ,किन्तु न जाने, किस गली में छुपकर उसने अपनी जान बचाई ? जान  तो बच गयी किन्तु बुरखा न होने के कारण ,उसके चेहरे को पहचाना जा सका। पुलिस हरकत में आ गयी। अब तो पुलिस के हाथ में ,उस ''बच्चा चोर ''के उस चेहरे से मिलते जुलते फोटो थे। आस -पास के थानों में भी भेज दिया गया।

अगले दिन  जब सलमा बाहर खाने -पीने का  सामान लेने बाहर निकली तब उसने अपनी तस्वीर किसी दीवार पर चिपकी देखी। जिस पर लिखा था -''यही बच्चा चोर है ''इसका पता बतानेवाले को इनाम दिया जायेगा। उसे पढ़कर सलमा  बुरी तरह घबरा गयी , सामान लिए बिना ही, अपने घर वापस आ गयी।वो तो अच्छा हुआ ,अब वो बुरखे में ही बाहर निकली है वरना अभी उसकी शिनाख़्त हो गयी होती। तब भी कब तक बचेगी ?कोई न कोई तो उसकी तस्वीर को पहचान ही लेगा।  अब उसने सोचा ,अब वो कई दिनों तक बाहर नहीं निकलेगी। जो कार्य वो कर रही थी ,अपने परिवार की  खुशहाली के लिए ही तो कर रही थी ,वो परिवार, जिसमें चार  बच्चे और शौहर के अलावा उसकी अम्मी भी है। ये कार्य उन्हीं के लिए तो कर रही है किन्तु आज जब उसका चेहरा सबके सामने एक ''बच्चा चोर '' के रूप में आएगा ,तब वो कैसे अपने शौहर और बच्चों से नजर मिलायेंगी ?

जब सभी उससे ये पूछेंगे ,कि उसे क्या जरूरत आन  पड़ी थी ,सभी अपने -अपने हिस्से की मेहनत कर सुकून से रह तो रहे थे। तब उसने ऐसा क्यों किया ? जब पड़ोसन को पता चलेगा ,उसके बेटे की क़ातिल मैं ही हूँ ,वो तो जूतियों से मार -मारकर, मुझे महल्ले से बाहर ही निकाल देगी। अब उसे अपने किये सभी कर्म स्मरण हो रहे थे ,कैसे उसने,बच्चों को बहला -फुसलाकर अपने संग ले गयी और एक -एककर सभी की जान ले ली। वो अब उस दिन को कोस रही थी ,जिस दिन उस मुये तांत्रिक से मिली थी उसी ने ये सब झांसा दिया था ,मुझे रईस होने का।तभी उसके विचारों ने पलटा खाया - ये भी कोई सुकून से रहना है ,जितना कमाओ !उतना ही खर्चा !वो भी हाथ खींचकर करना पड़ता है ।'' एक -एक पैसे को दांतों से काट -काटकर खर्चा करना पड़ता है'' । न ही ढंग का घर है ,न ही ठीक से पहनने को कपड़े...... अब कोई पूछने लगा तो किसी से क्या कहूँगी ?

वैसे एक बच्चे की ही  तो, और बलि देनी थी ,पता नहीं ,कैसे उस औरत को मुझपर शक़ हो गया ?एक क़ुरबानी की तो बात थी ,तब अल्ला की हम पर रहमत होती और इस भुखमरी से छुटकारा तो मिलता। तभी उसमें एक नया  जोश जाग्रत होता है और सोचती है ,-जैसे भी हो जब इतना किया है ,तब एक बच्चा और सही ,जब हम पर पैसे हो जायेंगे ,हम भी सुकून से रह सकेंगे ,मेरे बच्चे बड़े स्कूल में पढ़ने  जा सकेंगे। मन उदासियों के घेरे से बाहर ही आया था। तभी अम्मी की आवाज ने उसे ,ख्यालों से बाहर धरातल पर ला दिया। सलमा ओ.... सलमा ! न जाने कहाँ चली गयी ?घर का काम -धंधा कुछ होता नहीं ,न जाने कहाँ घूमती रहती है ? कुछ बताती भी तो नहीं ,आज कुछ  खाने को मिलेगा भी या नहीं कुछ बनाया है या  नहीं । 

याकूब तेरी बहुरिया के लक्षण ठीक नहीं लगते ,पता नहीं ,कुछ खाने को बनाया भी है या नहीं। 

इस बुढ़िया को भी ,उठते ही खाने को चाहिए ,तनिक भी सब्र नहीं, बड़बड़ाती हुई सलमा ,ख्यालों के पुलिंदे को एक तरफ रख बाहर आकर बोली -अभी दिन निकला नहीं ,खाने को मांगने लगी। घर में कुछ खाने को नहीं है ,बनाने के लिए भी तो सामान चाहिए। अपने बेटे से कहो !अपनी औलाद में से किसी को बाहर भेजकर सामान मंगवा लें। 

याकूब अंदर आते हुए बोला -मैंने तो तुझे बाहर जाते देखा था , मैंने सोचा ,इतनी सुबह सामान लेने ही गयी होगी। 

हाँ ,गयी थी ,दुकानें बंद पड़ी थी वापस आ गयी ,चाय बना दी है ,दो रस रखे हैं ,दोनों माँ -बेटा खा लो !और  सामान जब आ जायेगा ,तब सारे कुनबे के  लिए कुछ न कुछ बना  दूंगी। 

तू देख रहा है ,अपनी औलादों को ,कुनबा बखान रही है ,कितनी बोलने लगी है ? औलादें कितनी मिन्नतों से मिलती हैं ?अभी इसे पता नहीं। 

अम्मी तुम क्यों परेशान होती हो ? ये इसकी भी तो औलादें हैं। 

इसको किसी की फिक्र की कहाँ है ?मैंने कहा था -कई औरतें हैं ,जो घर में रहकर ही ,सिलाई -बुनाई और कढ़ाई का काम करती हैं। मैंने एक से बात भी की थी ,किन्तु इसे न करना कुछ काम धंधा ,न ही घर का कुछ काम होता है ,न ही कमाई का कुछ साधन सोचती है । आजकल तो न जाने बिना बताये ,कहाँ चली जाती है ?किसी से कुछ भी नहीं बताती। 


बेटे को पैसे देते हुए ,याकूब बोला -अब सुबह -सुबह रहने दो ! ये न सुधरने वाली ,वो कुदरत की मैहर से चार बच्चे हो गए ,वो भी नहीं संभाले जाते। उसे देखो !बेचारी रेहाना !अपने शौहर और बच्चों का कितना ख्याल रखती थी  ? उस ''बच्चा चोर ''का  नाश जाये ,बच्चा चोर उसके बालक को उठा ले गया ,इसे अपने बच्चों की भी फिक्र नहीं।

 मेरी शिकायतों से ही पेट भरना है ,या कुछ खाना भी है ,कहते हुए सलमा ने खाना परोस दिया। कोई और दिन होता तो ,ये बुढ़िया जितनी बोल रही है ,उतनी देर में तो सलमा उसकी'' खाट खड़ी कर देती ''किन्तु आज उसके मन में अलग ही परेशानी चल रही है। उसके मन में अंतर्दवंद चल रहा है ,अपने पकड़े जाने का भय और दूसरी तरफ एक बच्चे के बाद उसके घर में ख़ुशहाली होगी। 

तभी उसका बेटा ,जो बाहर जाकर खाने -पीने का सामान लाया था ,अचानक से बोल उठा जैसे उसे कुछ याद आया हो ,अम्मी !मैंने बाहर तुम्हारी फोटो देखी ,उसके इतना कहते ही ,सभी के मुँह का निवाला मुँह में ही रह गया और सलमा की तरफ देखने लगे। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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