अमृता ने ,यश को अपने पास बुला तो लिया किन्तु वो उससे अजनबियों की तरह व्यवहार कर रहा था। अमृता ने पूछा -तुम अजनबियों की तरह क्यों व्यवहार कर रहे हो ? क्या मुझे जानते नहीं ? उल्टे तुम्हें तो ,अपने किये पर अफ़सोस होना चाहिए ,आकर ,अपने किये पर माफी मांगनी चाहिए ,जब से तुम गए ,एक बार भी पलटकर नहीं देखा। तुमने जानना भी नहीं चाहा ,अमृता कैसी है ? अमृता शिकायत भरे लहजे में , यश से कह रही थी।
वो तो एक मज़ाक था और तुम उस मजाक में पूरी तरह शामिल थीं ,मैंने तुमसे कोई वायदा नहीं किया था।अभी भी यश उसी तेवर में बोला।
मैंने पहली ही नजर में अपना सब कुछ तुम्हें सौंप दिया , अपना दिल दिया अपना तन दिया और तुम हमें'' दूध में गिरी मक्खी ''की तरह निकालकर चले गए। जाने से पहले मिलकर भी नहीं गए। क्या तुम्हें मुझसे प्यार नहीं था। माना कि तुम हमसे मज़ाक कर रहे थे किन्तु उस रात्रि जो हुआ ,वो तो मजाक नहीं था। यदि तुम्हें हमसे प्यार नहीं था ,तो हमारा साथ क्यों निभाया ? साथ ही हमसे झूठ भी बताया ,उस घर के बेटे हैं। तुम्हारी इतनी गलतियों के बावजूद भी ,मैंने तुम्हारा इंतजार किया ,उसके करीब आते हुए बोली। कम से कम एक फोन तो कर देते ,मुझे तो उससे ही सुकून मिल जाता किन्तु तुमने तो........ अमृता उसकी तरफ देखे बिना ,अपनी शिकायतें बताये जा रही थी। जब उसकी तरफ देखा ,तो वो नजरें नीची किये उसकी शिकायतें सुने जा रहा था। वो उसके करीब पहुंची और यश के कंधे पर हाथ रखकर बोली -ये अमृता आज भी तुम्हारी है ,तुमसे ही प्यार करती है।
कुछ देर पहले तो ,यश उसके प्रश्नो के उल्टे -सीधे जबाब दे रहा था ,पता नहीं ,एकदम से कैसे उसके बात करने का तरीका ही बदल गया ?किस मुँह से ,और कैसे कहुँ ?कुछ समझ नहीं आता ,तुमसे मिलने के पश्चात ,मम्मी का फोन आ गया ,बल्कि सुबह ही चार बजे आया ,कि पापा की तबियत अचानक बिगड़ गयी है। अब तुम ही बताओ ! मैं तुमसे कैसे मिलता ?
अमृता उसकी बात ध्यान से सुन रही थी ,बोली -वहां जाने के पश्चात भी तो ,मुझसे बात कर सकते थे।
कैसे करता ? तुम ही बताओ ! कैसे करता ?उसकी तरफ देखते हुए बोला -तुम्हारे घर में तो फोन नहीं था ,मौसी को फोन करता तो वे पूछतीं ,किसको और क्यों फोन करना चाहते हो ?फिर तुम्हारा हमारा रिश्ता भी पूछतीं।
अमृता मन ही मन सोच रही थी ,ये कह तो सही रहा है। तुमने तो शादी भी कर ली ,कम से कम एक बार तो मिलने ही आ जाते ,अपनी मौसी से मिलने के बहाने ही आ जाते या अपनी मम्मी से मेरी बात तो करते कि मैं अमृता से प्यार करता हूँ ,उससे ही शादी करना चाहता हूँ।
मैं ये सब सोच रहा था -किन्तु पापा ने अपने दोस्त की लड़की से मेरा रिश्ता पहले ही तय कर दिया था ,डॉक्टर के कहने पर ,मैं उनसे ये सच नहीं बता सकता था ,क्योकि डॉक्टर ने कहा था -इन्हें किसी भी प्रकार से मानसिक परेशानी से दूर रखा जाये। ऐसी विपरीत परिस्थितियों के चलते ,मैं तुमसे कैसे सम्पर्क करता ?जब तुम्हें टेलीविजन पर देखता था ,तो मन ही मन आहें भरता था ,मेरी अमृता तुम मुझसे कितना दूर हो गयीं ?
इसी को तो अँधा प्यार कहते हैं - यश ने जैसा कहा , अमृता ने स्वीकार कर लिया ,वो तो आज भी उसके प्यार में अपना सब कुछ लुटाने को बेचैन थी। आज उसका प्यार उसके सामने था ,तब उसने उसके परिवार के विषय में पूछा और बताओ ! तुम्हारा परिवार केेसा है ?
कैसा परिवार ! जब से विवाह हुआ है ,परेशान ही हूँ , मैं उससे प्यार नहीं करता ,जैसी पत्नी मैंने चाही थी ,वो वैसी नहीं है। बहुत ही लड़ाकू है ,एक पल भी चैन से रहने नहीं दिया। बस जीवन काट रहे हैं।
तब तुम मेरे पास क्यों नहीं आये ?अमृता ने दुखी यश के सर पर अपना चेहरा टिका दिया और उसके गले में अपनी बाहें डाल दीं।
किस मुँह से आता ?तुम्हें इतना बड़ा धोखा देकर ,कैसे तुम्हारे पास आता ? फिर एक ड़र भी तो था ,तुम इतनी बड़ी स्टार हो गयी हो ,तुम मिलोगी भी या नहीं ,मिल भी गयीं तो पहचानोगी भी या नहीं।
पहचानती कैसे नहीं ?तुम्हें तो मैं लाखों में पहचान लेती ,तुम आते तो सही ,अमृता ने कहते हुए उसके हाथों को थाम लिया।
दिल भी न कितना बेईमान है ?या इसे नासमझ कहूं। पहले तो किसी पर आया ही नहीं ,आया तो ,अपना अच्छा -बुरा ही भूल गया ,धोखा खाने के पश्चात भी ,मैं उस विवाहित पुरुष में ,अपना खोया प्यार ढूँढ रही थी। मैंने ये भी जानना नहीं चाहा कि उसने इस वक्त जो भी मुझसे कहा है , सच ही कहा है या इसमें कोई झोल तो नहीं ,जो व्यक्ति मेरे साथ एक रात्रि बिताकर ,बिना कुछ कहे ही चला जाये ,वो इतने वर्षों पश्चात अचानक कैसे सामने आ गया ? बस उसने जो कहा ,मेरे लिए तो वही सही था। मेरे लिए तो पुनः मेरी ज़िंदगी में आ गया ,यही बहुत था। इंसान जब कर्म करता है ,तब उसे पता नहीं होता ,कि अगले ही क्षण उसके संग क्या घटना घटने वाली है ?अपने बेहतर के लिए ,अपने अच्छे के लिए ही सोचता है। बुरे की कभी कल्पना भी नहीं कर सकता। किन्तु उस अच्छी सोच के साथ ,एक बुरा विचार या बुराई स्वतः ही प्रवेश कर जाती है। मैं तो अपने मन में खुश थी ,मेरा प्यार मुझे पुनः मिल गया किन्तु ये जानना नहीं चाहा ,क्या वो अब भी मुझसे उतना ही प्रेम करता है।
मैडम जी ओ...... मैडम जी ! क्या आज अंदर ही रहने का इरादा है ,बाहर आइये !
अमृता जी ने अपनी डायरी एक तरफ रखी और बोलीं -आ रही हूँ ,मुझे अपनी जिम्मेदारियों का ख़्याल है। बाहर आकर देखा तो सलमा खड़ी थी।
क्या हुआ ?उन्होंने उसे देखते ही पूछा।
होना क्या है ?अपनी इन चहेतियों को समझा लो !मुझसे न उलझें वरना अच्छा नहीं होगा।
मेरी चहेती ,तो तुम भी हो ,मेरी किसी से कोई दुश्मनी नहीं , दुश्मनी करने से कोई लाभ नहीं दुश्मनी करने में क्या रखा है ?
यही बात तुम उन्हें क्यों नहीं समझातीं ?कहते हुए वो तुनककर चली गयी।

