मन एक ,अँधेरी गली !
जिस ओर राधा चली !
डूबने अपने श्याम के ,
प्रेम की हलचल बड़ी !
बंद आँखों उसे निहारती ,
ढूंढने अपना मोक्ष मोती।
डूब मन की गहराई में ,
उस प्रेम मोती की परख़ ,
हर किसी की नहीं होती।
विरहणी को इक आस है।
जुडी ,मिलन की साँस है।
वही उसकी [रूप]दास है।
उस अंधकार में ही ढूंढ़....
लेती ,रहती जिसकी प्यास है।
[यहाँ राधा आत्मा और श्याम परमात्मा को कहा गया है। ]
अँधेरी गलियाँ -
शबनम चली.... अँधेरी गली ,
लिए आँखों में ,इश्क़ की नमी।
मिलन की लिए आस बैठी उस गली।
वेदना से तप्त नज़रें तकतीं
दुनिया की रंगीनियो से बेज़ार ,
आस का मोती ,परख जिसको
कोई तो पहचान ले ,सुने पुकार !
अब तो कोई आये ,करे उससे प्यार !
आज भी है उसे ,न जाने किसका इंतजार !
उबारे इस जिल्ल्त से , करे इश्क़ बेशुमार !

