अगले दिन शिल्पा ने ,अपने और प्रवीण के मध्य हुए वार्तालाप को और समय पर पैसे न दे पाने की असमर्थता को,चतुर से बतलाती है। बाहरी तौर पर तो चतुर ने कह दिया -कोई बात नहीं ,आप भइया को देखिये ! किन्तु अंदर ही अंदर शिल्पा से नाराज़ था,ऐसा शिल्पा को लगा या फिर उसके चरित्र को देखते हुए उसका अभिनय भी हो सकता है।मेरा अनुभव तो यही कहता है ,उर्वशी अपने पति समीर से कहती है।
चतुर ने, उसके पश्चात शिल्पा से बात भी नहीं की ,न ही उससे मिला ,सारा दिन स्कूल में भी दिखलाई नहीं दिया, मन ही मन शिल्पा अपने को दोष दे रही थी। मैंने पहले उन्हें उम्मीद बंधाई और अब पीछे हट गयी ,उनका नाराज़ होना तो बनता है।
किन्तु अब तो शिल्पा को चतुर की याद बहुत सता रही थी ,उसकी कमी बहुत ख़ल रही थी। चतुर का बार -बार उसके करीब आने का प्रयास करना, बातें करते -करते उसके हाथों को छूना ,एकांत मिलते ही प्यार की एक मुहर, उसके होठों का स्पर्श उफ्फ़ आगे सोचा भी नहीं गया। आज' सर' बहुत परेशान हैं, आज शिल्पा को एहसास हुआ ,वो प्रवीण से ज़्यादा चतुर को याद कर रही है जबकि प्रवीण और उसका रिश्ता तो वर्षों पुराना है। इतना तो उसने कभी भी प्रवीण के लिए ,प्रवीण की परेशानियों के लिए भी नहीं सोचा था।
अपने आपको टटोल रही थी ,क्या ये प्यार है ,या फिर महज़ आकर्षण !ऐसा कैसे हो सकता है ?मैं शादीशुदा हूँ, मेरे बच्चे हैं ,पति है। तब मैं ऐसा कैसे सोच और कर सकती हूँ। मैं कोई कमसिन, कुंवारी, कन्या नहीं ,फिर ये आसक्ति क्यों ? क्या सर !अपने परिवार को छोड़कर मुझे अपना लेंगे।
उसके अंतर्मन से तुरंत आवाज आई- नहीं ! फिर मैं ऐसा सोच क्यों रही हूँ ?प्रवीण को मालूम पड़ा तो वे क्या सोचेंगे ? मैंने अपने जीवन में ये तूफान स्वयं बुलाया है। लोग तूफानों से बचते हैं किन्तु ये तूफान ऐसा है ,यदि किसी को भी इसकी भनक लग गयी तो, न जाने क्या होगा ? मुझमें इतनी बेचैनी क्यों है ? कहीं कुछ गलत तो नहीं हो रहा ,चतुर की सहानुभूति को उसका प्यार समझने की गलती तो नहीं कर बैठी। इतनी असुरक्षा क्यों महसूस हो रही है ?
सामने विद्यार्थियों की कॉपियों का बंडल रखा था किन्तु अभी तक एक भी कॉपी जाँच ही नहीं पाई ,अपना ध्यान इन सभी बातों से हटाने का प्रयास किया। तभी उसने अपनी कक्षा की खिड़की से बाहर देखा ,उसे चतुर दिखलाई दिया। उसको देखते ही उसके चेहरे पर अनायास ही मुस्कान आ गयी। अभी कुछ देर पहले जो विचार उसकी कुंठित मति को खोलने का प्रयास कर रहे थे, वे न जाने कहाँ तिरोहित हो गए ?अभी कुछ देर पहले वो उचित -अनुचित के पलड़े में झूल रही थी ,अब वो तराजू ही नहीं रही।
शीघ्र ही कक्षा से बाहर आ गयी किन्तु उसे चतुर कहीं नहीं दिखा। उसे ढूंढते हुए ,'प्रधानाचार्य कक्ष' में पहुंची,चतुर वहीं पर किसी कार्य में व्यस्त था। अरे !सर !आज कहाँ थे ? दिखलाई नहीं दिए।
हाँ, थोड़ा काम था,कहकर वो फिर से अपने कार्य में व्यस्त होने का प्रयास करने लगा। चतुर का शिल्पा को इस तरह नजरअंदाज करते देख ,उसे बुरा लगा। ऐसा व्यवहार तो उसने पहले कभी नहीं किया ,ऐसा भी क्या काम ?जो आज इतना व्यस्त हो गया। शिल्पा को बुरा तो लगा और वो समझ रही थी ,शायद चतुर पैसों के कारण परेशान है ,तब बोली -मुझे आपसे कुछ बात करनी थी।
क्या बात ? आप चलिए ! मैं अभी आता हूँ, कहकर फिर से अपने कार्य में व्यस्त हो गया किन्तु छुट्टी का समय हो गया ,वो शिल्पा से नहीं मिला। शिल्पा सोच रही थी ,कल तो सभी अध्यापिकाओं को उनका वेतन देने का वायदा किया है किन्तु अभी तक चतुर ने मुझसे कुछ भी नहीं कहा। सारा दिन इसी सोच में बीत गया घर पहुंचकर भी वो चतुर के स्कूल और कल के वेतन के विषय में सोचती रही।
परसों चतुर और उसकी बीवी कस्तूरी के मध्य उसने पैसे देने का आश्वासन देकर, अपने आपको उसकी बहुत बड़ी शुभचिंतक समझ रही थी। एक तरीके से देखा जाये तो वो चतुर को प्रभावित करना चाहती थी, किन्तु न जाने अचानक प्रवीण को क्या हुआ ? जो पैसे मांग बैठा , ऐसा तो कभी नहीं हुआ ,क्या वो मुझे परख कर देख रहा था ? मुझे ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए ?क्या किसी से पैसे उधार मांगकर देख लूँ ?
इतनी परेशानी तो शायद चतुर को भी नहीं हो रही थी ,जितनी परेशान इस समय शिल्पा हो रही थी।
वास्तविकता भी यही थी ,चतुर अपनी पत्नी कस्तूरी के संग इत्मीनान से सो रहा था और शिल्पा इसी उधेड़ -बुन में थी। ये मेरी प्रतिष्ठा का प्रश्न है ,मैंने उन अध्यापिकाओं से कहा है -कल उन सबको, उनका वेतन मिलेगा। उसके इसी अंतर्दवंद में एक आवाज धीमे स्वर में आई -'ये चतुर का स्कूल है, तुम्हारा नहीं ,इसकी फ़िक्र उसे होनी चाहिए, तुम उस स्कूल की एक मामूली अध्यापिका हो। ' किन्तु अपने मन के शोर में शिल्पा ने उस स्वर को नजरअंदाज कर दिया।
अगले दिन शिल्पा स्कूल पहुंची,मन में एक आशा थी कि चतुर पहले की तरह मुस्कुराकर उसका स्वागत करेगा। हुआ भी ऐसा ही ,शिल्पा को देखते ही वो मुस्कुराकर बोला - आप आ गयीं।
आती क्यों नहीं ? आज तो आना ही था ,कहते हुए अपने कक्ष में गयी ,चतुर ने उससे कुछ नहीं पूछा ,हालाँकि वो चाहती थी, कि चतुर उससे पूछे ,मैडम ! पैसों का कुछ इंतज़ाम हुआ या नहीं किन्तु उसने कुछ पूछा ही नहीं। तब शिल्पा ने ही उससे पूछा -सर ! कहीं कुछ बात बनी।
कैसी बात ?चतुर ने अनभिग्यता दिखलाई
आप भी कमाल करते हैं ,क्या आप भूल गए ?आज सभी अध्यापिकाओं को वेतन देना है।
हाँ ,मैं जानता हूँ, किन्तु क्या कर सकता हूँ ? मैंने कई लोगों से बात भी की, किन्तु अभी कोई पैसे देने के लिए तैयार नहीं है ,कुछ दिनों के पश्चात देने के लिए कह रहे हैं।
अब क्या करेंगे ?चिंतित स्वर में शिल्पा बोली।
अब आप ही देख लीजिये ! आपने भी तो वायदा किया और निभा न सकीं ,चतुर ने ताना मारा। आपके पति ने आज तक हिसाब नहीं माँगा कल अचानक मांग उठे'। ऐसा ही होता है ,ये पैसे का मामला है ,कहकर निर्लिप्त भाव से कुर्सी पर बैठ गया, उसका उदास चेहरा, शिल्पा को पसंद नहीं आया बोली - सर !मुस्कुराइए ! मैं पैसे लाई हूँ ,कहते हुए उसने अपने पर्स से पैसे निकालकर चतुर के सामने रख दिए।
क्या बात कर रहीं हैं ?चतुर मुस्कुराया और बोला -मैं जानता था ,आप कोई न कोई इंतज़ाम कर ही लेंगी किन्तु भइया का क्या ?उन्होंने मांगे तो....
वो मैं देख लूँगी,शिल्पा को चतुर के चेहरे पर मुस्कान लाकर ऐसा लग रहा था ,जैसे उसने कोई किला जीत लिया हो।उसकी मुस्कान के लिए वो कुछ भी परेशानी उठाने के लिए तैयार थी। सभी अध्यापिकाओं को उनका वेतन मिल चुका था।
