मन से ही स्वर्ग है ,मन से ही नर्क !
स्वर्ग बनता अपने कर्म से ,
बनाता ,स्वयं इंसान !
तंगी में, एक दूजे के संग रह ,
प्रेम से करता... सब कुर्बान !
धन के लालच में पड़ ,
छीना -झपटी कर.... ,
मात -पिता दुश्मन बने ,
जीवन अपना जटिल बना ,
घर में बैठा , जब शैतान !
कोई ,रिश्तों को रोता ,
कोई ,भूखा सोता ,
बच्चे करें ,तकरार ,
तब पूछे ,वो उससे !
कैसा ?तेरा ये संसार !
'समभाव' में जीना सीख़ ले ,
जीवन का यही है ,सार !
यही जीवन का है ,आधार !
नजर आता है......
बड़े प्रेम से ,तेरे आग़ोश में ,
तेरी बांहों के झूले में ,
मुझे ,स्वर्ग नजर आता है....
भुला दूँ ,मैं इस जहाँ को ,
तेरे संग रहना है , मुझे ,
तुझमें मेरा, चाँद नजर आता है।
बीते संग तेरे, ज़िंदगानी मेरी ,
तेरे प्रेम में ही मुझे ,
अपना ,स्वर्ग नजर आता है.....
इन धड़कनों से कह दूँ ,
धड़कती रहना तुम..... !
तेरे संग ही ,जीवन नजर आता है।

