Asi bhi zindgi [ part 98 ]

मम्मा ! कभी -कभी मुझे आपकी कोई बात समझ नहीं आती ,अब आप इस चोर लड़के को अपने साथ क्यों ले आईं ? आप भी न ,  किसी भी ऐरे -गेरे को उठाकर ,चल देती हो। 

ये तुम क्या कह रही हो ?,ये ही तो हमारा काम है ,बेसहारों को सहारा देना ,भटके हुओं को सही राह दिखाना,जो बीमार हैं ,उनकी सेवा करना ,उन्हें हताश न होने देना।  हर आदमी जन्म से ही चोर नहीं होता ,कई बार उसे परिस्थितियां ,वो करने पर विवश कर देतीं हैं ,जो वो करना नहीं चाहता। हो सकता है ,ये सही कह रहा हो ,कहते हुए नीलिमा ने उसकी तरफ देखा। उसका होंठ अब पहले से अधिक सूज चुका था।हाथ में भी थोड़ी चोट है , तभी वो अपनी गाड़ी रोकती है ,और डॉक्टर के क्लीनिक की  तरफ बढ़ जाती है। पहले डॉक्टर से उसकी पट्टी करवाती है। डॉक्टर साहब !आपकी फीस !


आप मुझे क्यों शर्मिंदा कर रही हैं ? जब किसी अनजान के लिए ,आप इतना सोच सकतीं हैं ,तो क्या मैं मुफ़्त में पट्टी भी नहीं बांध सकता ,कहकर डॉक्टर ने हाथ जोड़ दिए। 

क्लीनिक से बाहर निकलकर ,उसने अपनी बेटी को बतलाया ,तुम एक आदमी का सहारा बनते हो ,चार हाथ तुम्हारी ओर स्वतः ही बढ़ जाते हैं किन्तु हमें एक सही और सच्ची राह चुननी होगी। तब उसे लेकर अपनी संस्था की ओर बढ़ चली और वहाँ से उसे कुछ कपड़े भी दिए। उसके पश्चात ,वो उसके घर गयी ,वास्तव में ही ,उसका पिता बिमार था नीलिमा ने उन्हें कुछ भी नहीं बताया किन्तु वो लोग अपने बेटे की चोट देखकर अवश्य परेशान हो गए ,तब नीलिमा ने ,उन्हें थोड़ा खाने का सामान दिया और बच्चे की चिंता न करने के लिए समझाया। भई !इतनी देर से तुम हमारे साथ हो ,हमने तो नाम भी नहीं पूछा। 

दीपक ! दीपक नाम है मेरा। अब तक वो जो भी देखता आया था। उस व्यवहार ने उस पर बहुत असर किया। 

चलते समय नीलिमा ने उससे कहा -दीपक तुमने हमारी संस्था तो देखी  ही है ,  कभी भी किसी भी बात की परेशानी हो तो, निःसंकोच चले आना।

 दोनों माँ -बेटी जब वापस लौट  रहीं थीं ,तब कल्पना बोली -सच में ,मम्मा !आप ग्रेट हो। सच में ही वो लोग कितनी परेशानी में थे ?अपने बेटे की ऐसी हालत देखकर ,कैसे घबरा गए थे ?

मैं ये नहीं कहती- कि सभी सही होते हैं किन्तु विश्वास तो करना ही होगा। मैंने इसीलिए उसकी पट्टी भी बंधवाई और उसके घर भी गयी ताकि उसकी सच्चाई परख सकूं कहीं वो झूठ तो नहीं बोल रहा और तुमने भी देखा ,उसे ही क्या उसके परिवार को भी हमारे सहारे की आवश्यकता थी ?

उधर इंस्पेक्टर टीना के घर ,जाता है ,नौकर दरवाजा खोलता है ,जी कहिये !

वो टीना जी, से मिलना था। तभी पीछे से टीना की आवाज़ आती है ,कौन है ?

जी..... कहते हुए ,उसका नौकर दरवाज़े से हट गया। 

अरे इसंपेक्टर साहब !आप यहाँ !

टीना जी ,आपसे पहले कभी मिला था , तब मैं इतना ही जानता था कि आप ''धीरेन्द्र सक्सैना ''की दोस्त रह चुकीं थीं किन्तु मैं आज आपकी दोस्ती की गहराई और टूटने का कारण जानना चाहता हूँ। 

अब इस तरह'' गड़े मुर्दे खोदने से ''क्या लाभ ?जो था ,वो गया। 

जी मैं ,आपकी बात समझ सकता हूँ ,जिससे कुछ बुरी या अच्छी यादें जुड़ी हों ,वो तो दुःख के सिवा कुछ नहीं देतीं। किन्तु आप ये मेरी उत्सुकता कह लीजिये ,मैं जानना चाहता हूँ कि वो किस तरह का व्यक्ति था ?आपकी दोस्ती उससे टूटी कैसे ? मतलब जो भी आप जानती हैं ,बता दीजिये। 

तब तक टीना का नौकर चाय -नाश्ता ले आया।उसके जाने के पश्चात टीना बोली -वो इंसान शायद अपने आप से ही परेशान सा था ,कोई चीज उसे न मिले ,तब भी परेशान ,मिल जाये तो उसी क़द्र ही नहीं। उसे... एक तरह का जुनून सा सवार था,एक ज़िद थी । दिखने में ,''हैंडसम ''था ,व्यवहारिक था ,क़द -काठी से जंचता था ,पैसा भी था ,कोई भी लड़की ,उस पर मर मिटने को तैयार हो जाती किन्तु उसे तो मेरी ज़िंदगी को नर्क़ बनाना था। 

यानि.... 

यानि क्या ?उसे पूरे कॉलिज में मैं ही दिखी ,जिसे मेरी ज़िंदगी के साथ ही खेलना था। 

क्या ,वो आपको प्यार नहीं करता था ?

ये ही तो, पता नहीं चल पाया। हम दोनों एक कार्यक्रम के दौरान ,एक -दूसरे से मिले। हम दोनों ही एक -दूसरे को दिल दे बैठे। वो सोचता था -वो पैसे से हर किसी पर रौब मार सकता है ,पैसे के कारण ही लड़कियां उससे मिलना चाहती हैं ,कारण जो भी रहा हो, किन्तु मैं भी किसी से कम नहीं थी। तब इसमें हम ये तो कह नहीं सकते कि' पैसा 'हम दोनों के प्यार की कड़ी थी किन्तु हममें कुछ तो था ,जो हमें एक दूसरे से जोड़ रहा था। हम दोनों एक -दूसरे के साथ ,अधिक से अधिक समय व्यतीत करते।उसकी मम्मी को तो मैं पसंद भी आ गयी थी और हमारे माता -पिता भी हमारे इस रिश्ते से प्रसन्न थे ,हम भी ख़ुश थे। हम हमारी शादी का सपना देख रहे थे। 


 एक दिन ,हम दोनों बाहर घूमने के लिए निकले , राह में कुछ गुंडे जैसे या कुछ मनचले लड़के हमारे पीछे  पड़ गए ,कभी हमारे आगे अपनी गाड़ी अड़ा देते ,कभी पीछा करते नजर आते। एक मोड़ पर उसने अपनी बाइक को रोका ,मुझे उतारा ,तभी उसने अपनी बाइक की रफ़्तार तेज़ की और भाग गया। 

ये क्या बात हुई ?उन गुंडों से तुम्हें बचाना चाहिए था और तुम्हें छोड़कर भाग गया। 

वही तो..... मेरा रोम -रोम काँप गया। पहले तो वो लोग भी ,उसका ये व्यवहार देखकर हतप्रभ रह गए ,फिर वो लोग गाड़ी से उतर आये ,मुझे ताना भी मारा -''कितना बहादुर आशिक़ ढूंढा है ? तुझे तो हमारे लिए छोड़ गया। किस कायर से प्यार कर बैठी ?मैंने बताया -वो मेरा होनेवाला पति है , सभी हंसने लगे ,क्या कायर पति ढूंढा है। मुझे उस पर बहुत ही क्रोध आ रहा था और मैं उन लोगों से भी बहुत डरी हुई थी। मैं भगवान से प्रार्थना कर रही थी -''एक बार मैं यहाँ से सही -सलामत निकल जाऊँ, फिर उसका मुँह भी नहीं देखूंगी। मैंने भागने का प्रयास भी किया किन्तु उन्होंने मुझे पकड़ लिया , मैं रो रही थी ,उनसे रहम की भीख मांग रही थी किन्तु वो लोग बुरी तरह हँस रहे थे। 



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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