ख़ुशी ! या ग़म! ,पहले किसको सुनाऊँ ?
ग़म का तो वर्चस्व नजर आता है ,इस जहाँ में !
ख़ुशियाँ क्षणभर को, दिल बहलाकर चली जाती हैं।
पीछे रह जाता है ग़म ,ग़म ! ही तो साथ निभाता है।
खुशियां ! ख़्वाबों और ख्यालों में भी, लुभा जाती हैं।
आँखें खुलते ही ,अपना साथी तो ग़म नजर आता है।
उलझनों में फंसा इंसान ,सोचता रह जाता है।
खुशियों की तलाश में , अपना जीवन बिताता है।
लुका -छुपी खेलती खुशियाँ ,क्षणभर में फ़ुर्र हो जाती हैं।
ग़म कभी साथ नहीं छोड़ता ,लिपट जाता है ,ज़िंदगी से ....
ग़म से मिलती हैं ,तन्हाईयाँ ,रुसवाइयाँ ! इनके जाल में फंस जाता है।
ख़ुशियों की चाह में ,बस एक क़दम ,एक क़दम, ज़िंदगी बीताता है।
